उच्छिष्ट को त्यागें, देह को देवालय बनाएँ

उच्छिष्ट को त्यागें, देह को देवालय बनाएँ

मनुष्य की देह भगवान प्रदत्त अमूल्य और दुर्लभ वरदान है जो ईश्वरीय दिव्यता के साथ दैवत्व की प्राप्ति तक कराने का सहज, सुलभ और सरल माध्यम है लेकिन तब जबकि उसे हम दिव्य और दैवीय मानें और ताजिन्दगी पवित्र एवं शुद्ध बनाए रखें।

मन की निर्मलता, मस्तिष्क की पावनता और शरीर की सर्वांग शुद्धता यदि हम बनाए रख सकें तो जिन्दगी भर भगवदीय कृपा और ईश्वरीय विभूतियों का आनंद अनुभव कर सकते हैं।

इस शुद्धता और शुचिता में किसी भी सूक्ष्म या स्थूल परिमाण में अशुद्धि आ जाने पर हमारी सभी प्रकार की पवित्रता भंग हो जाती है जो जिन्दगी भर बनी रहती है।

एक बार दिल और दिमाग में किसी भी प्रकार का पाप आ जाने पर वह इन दोनों के साथ ही देह में विभिन्न स्थानों पर किसी न किसी अनावश्यक लोथड़े के रूप में स्थान बना लेता है जिसे हम सामान्य भाषा में चर्बी कहते हैं।

कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो चर्बी हमारे दिल-दिमाग के प्रदूषण और खान-पान तथा लोक व्यवहार से आयी अशुद्धता का रूपान्तरित स्वरूप ही है।

सूक्ष्मीकरण दिव्य और पवित्र भावों का प्रतीक है जबकि स्थूलीकरण अशुद्ध और पाप संग्रह का संकेतक है। कुछ मामलों में आनुवंशिक, शारीरिक अथवा और किसी कारण से स्थूलता का होना संभव है लेकिन अधिकांश मामलों में स्थूलता पाप या अशुद्ध खान-पान को ही संकेतित करता है।

भोजन और पानी का संबंध हमारे शरीर के निर्माण से ही नहीं बल्कि मन और मस्तिष्क तक से गहरा नाता रखता है। इसीलिए कहा गया है कि खान-पान और व्यवहार सब कुछ शुद्ध होना चाहिए। यह शुद्ध नहीं होगा, अपवित्र होगा तो मन-मस्तिष्क और शरीर को हर तरह से बिगाड़ेगा ही।

सीधी और सरल भाषा में कहा जाए तो शुचिताहीन खान-पान और पापियों, रिश्वतखोरों,  चोर-उचक्कों और भ्रष्ट-दुष्टों का साथ और इनके साथ किसी भी प्रकार का व्यवहार आसुरी भावों को परिपुष्ट करता चला जाता है और ऎसे इंसान का दिल, दिमाग और शरीर आवारा हो जाता है। एक समय बाद इन पर खुद का नियंत्रण भी नहीं रहता।

अपवित्र, दूषित और बासी खान-पान तथा दुष्टों और पापियों के संग के कारण हमारे भीतर से मानवीय संवेदनाएं, धर्म, सत्य, संस्कार, ईमानदारी, निष्ठा, कर्तव्यपरायणता, दया, करुणा,  ममत्व, वात्सल्य, प्रेम, सौहार्द और आत्मीयता की सारी भावनाएं एक-एक कर बाहर निकल जाती हैं और उनकी खाली की हुई जगह पर निर्ममता, क्रूरता, राक्षसी व्यवहार और तमाम प्रकार की हिंसक वृत्तियाँ घर करने लगती हैं।

इसका परिणाम ये होता है कि हम चाहे मनुष्य के खोल में घूमते-फिरते रहें मगर हमें स्वयं को तथा दूसरे सभी लोगों को हमारे आकार-प्रकार, स्वभाव और व्यवहार से यह पक्का अहसास होता है कि हम या तो हिंसक पशु हैं अथवा कोई राक्षस।

बहुत से लोगों को हम देखते हैं जो कहे तो इंसान जाते हैं लेकिन इंसान का कोई सा गुण उनमें कभी दिखता नहीं। इन लोगों को देखकर, अपने को इनके करीब पाकर, इनसे बातचीत करते हुए हर क्षण यही लगता है कि हम किसी असुर या हिंसक जानवर के सामने खड़े हैं।

इंसान को देखकर इंसान को प्रेम की बजाय भय लगे तो यह समझ लेना चाहिए कि जो सामने खड़ा है वह इंसान के रूप में भेड़िया, लोमड़-लोमड़ी, चीर-फाड़ कर खा जाने वाला हिंसक और खूंखार जानवर या कि नरपिशाच या पिशाचिनी ही है।

कुछ लोग तो ऎसा राक्षसी व्यवहार करते हैं जैसे कि सामने वालों को फाड़ कर खा ही जाएंगे। इन लोगों को यदि और अधिक उन्मुक्तता दे दी जाए तो इंसानों को खाने लग जाएं।

अपने आस-पास और सम्पर्कितों में खूब सारे ऎसे हैं जिनमें न ममत्व है, न पर््रेम और मानवता। यही कारण है कि कुछ दशकों पहले तक लोग एक-दूसरे की कद्र करते थे, मेहमानवाजी कर खुश होते थे।

आजकल न आतिथ्य रहा, न सत्कार। और आखिर आदर-सत्कार करें तो किसका?  उन लोगों का जो हमेशा आँखें तरेरते रहते हैं, आवारा और बदचलन भिखारियों की तरह कुछ न कुछ डिमाण्ड करते रहते हैं, हमेशा बेवजह दबाने, डराने और धमकाने, नुकसान कर डालने और बरबाद कर डालने जैसे काम करते रहते हैं, क्या उनका !

इस किस्म के लोगों का जो आदर करते हैं वे भी पाप के भागी हैं क्योंकि जो लोग संहार, प्रताड़ना या दण्ड के लायक हैं उन्हें आतिथ्य सत्कार और आदर-सम्मान देना मानवता और मानवीय परंपराओं के साथ धोखा है।

अपेक्षाओं से मुक्त रहें और अपनी देह को देवालय बनाने के सारे प्रयास करें। इसमें यदि सफल हो गए तो फिर जब तक जियेंगे, दैवी सम्पदा प्राप्त होती रहेगी और इसका आनंद भोगते रहेंगे।

लेकिन इसके लिए हर प्रकार की शुचिता जरूरी है, कथनी और करनी में साम्य से लेकर खान-पान और लोक व्यवहार तक में पवित्रता आवश्यक है। मन-मस्तिष्क और शरीर में झूठन के प्रवेश को रोकने के लिए संयमपूर्वक प्रयत्न जरूरी हैं।

सादगी, सरलता और सहजता को हर कर्म, स्वभाव और व्यवहार में लाने की आवश्यकता होती है। झूठे लोगों और सभी प्रकार की झूठन का परित्याग करना जरूरी है।

जो झूठा अथवा उच्छिष्ट हो गया वह शुचिता और सिद्धि प्रदान नहीं कर सकता। इसलिए जो देह किसी भी प्रकार से उच्छिष्ट हो चुकी हो, उसका सामीप्य, संसर्ग और उपभोग भी बीमारियां, अशुद्धि, अपवित्रता और दुर्भाग्य देता है।

इस प्रकार की उच्छिष्ट देह के साथ रस, रूप, गंध, स्पर्श और वाणी व्यवहार से लेकर संसर्ग-समागम तक से धर्म हमारा साथ छोड़ देता है और इस कारण से हमारे पितर, देवी-देवता, ग्रह-नक्षत्र, कुलदेवी और पुण्य हमें छोड़ कर चले जाते हैं।

यही कारण है कि जीवन में दिन-रात खूब सारे कर्म करते रहने और जी तोड़ मेहनत करने के बावजूद दुर्भाग्य और असफलताएं हमारा पीछा नहीं छोड़ती और हम मायूसी, नैराश्य और हताशा भरा जीवन जीने को विवश हो जाते हैं।

जीवन की सफलता के लिए सभी प्रकार की शुचिता को पूरी निष्ठा व ईमानदारी से स्वीकार करने की जरूरत है। बिना परिश्रम किए पाया हुआ और बेईमानी का धन भी धनिकों और काली कमाई वालों की झूठन ही है। यह हमारी असली कमाई के साथ मिल जाएगा तो उसे भी पूरी तरह उच्छिष्ट कर डालेगा। फिर उसी झूठन लगी धन-सम्पदा को भगवान भी स्वीकार नहीं करता, चाहे कितने ही यज्ञ-यागादिग और अनुष्ठान करवाते रहो, मन्दिर-मन्दिर चक्कर काटो और लोभी-धुतारे पण्डितों से अनुष्ठान करवाते फिरो।

सभी प्रकार की उच्छिष्ट यानि की झूठन सामग्री, उच्छिष्ट देह और झूठ से भरे कामों, विचारों आदि सभी का परित्याग किए बगैर जीवन में सफलता का आनंद नहीं पाया जा सकता। हम सभी के जीवन में निराशा और असफलता का यही एकमेव कारण है।

शुचिता को अपनाते हुए देह को इतना दिव्य बना डालें कि यह देवालय के रूप में निखर उठे और देवता को स्वयं आकर इसमें प्रतिष्ठित होना पड़े।