फक्कड़ी का दूसरा नाम – वागड़ विभूति दिनेश दादा बादशाह

फक्कड़ी का दूसरा नाम – वागड़ विभूति दिनेश दादा बादशाह

दक्षताओं और हुनर के बावजूद कठोर जिन्दगी के ढेरों पड़ावों से होकर जो कोई तप कर निकलता है उसी के साथ  ज्ञान, अनुभवों और व्यवहारिक जीवन के सारभूत तत्वों का मिश्रण व्यक्तित्व में ऎसा निखार ला देता है कि फिर इंसान को न किसी से भय होता है, न अपेक्षा या उपेक्षा का भाव। हर मामले में बिन्दासगी, मुखर अभिव्यक्ति और फक्कड़ी जिन्दगी का ऎसा मस्त जीवन अपने आप चलता रहता है कि आत्ममुग्धता का यह दौर जिन्दगी भर सुकून देता रहता है।

जीवन के इन्हीं उतार-चढ़ावों से होकर बिन्दास व्यक्तित्व के रूप में अलग ही पहचान बनाने वाले एक शख्स हैं श्री दिनेश भट्ट।  बांसवाड़ा के औदीच्यवाड़ा में वैद्य मधुकान्त भट्ट के घर माता यशोदा देवी की कोख से 17 मार्च 1942 को जन्म लेने वाले श्री दिनेश भट्ट ने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए आयुर्वेद जगत की सेवाओं को चुना। राष्ट्रभाषा कोविद तक शिक्षा पाने के बाद उन्होंने मुम्बई की होटलों और अहमदाबाद की मिलों में भी काम किया। पर वहां उनका मन नहीं लगा।

 

 

कठोर संघर्ष का सामना

मुम्बई की होटलों में काम करने के साथ ही अहमदाबाद की मिलों में भी मजदूरी की लेकिन कुछ समझदार लोगों ने राय दी कि बांसवाड़ा पहुंच कर  पढ़ाई करो और नौकरी के लिए कोशिश करो।  डूंगरपुर में कामरेड स्व. कान्तिशंकर शुक्ला के साथ तत्कालीन आयुर्वेद मंत्री श्री भीखा भाई से मिले। जहाँ भीखा भाई ने उन्हें परिचारक के पद पर नौकरी पर लगवा दिया। उनकी प्रथम नियुक्ति 4 नवम्बर 1962 में राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय कलिंजरा परिचारक के पद पर हुई। खेड़ा, बाँसवाड़ा, सेनावासा, तलवाड़ा, सुरपुर आदि स्थानों पर वर्षों तक सेवाएं दीं।

मुखर होकर सुनाते हैं व्यथा कथा

आयुर्वेद के क्षेत्र में लम्बी सेवाओं के दौर में  आयुर्वेद विभाग के कई जिलाधिकारियों ने उन्हें इतना अधिक प्रताड़ित किया कि उनके मन में आयुर्वेद के उच्च पदस्थों के बारे में नकारात्मक धारणा बनी जो आज तक कायम है।वे आज भी आयुर्वेद अधिकारियों के भ्रष्टाचार की बातें बताते हुए कई नाम गिनाते हैं जिन्होंने उनके साथ अन्याय ढाया। ट्रिब्यूनल में भी उन्होंने केस दायर किए। अपनी व्यथा कथा सुनाते हुए वे कहते हैं कि उनके पास पत्रावलियों के करीब दस किलो के दस्तावेज जमा हैं जो अन्याय के गवाह हैं।  रिटायरमेंट से दो साल पूर्व स्थानान्तरण आमेट में हो जाने पर 2001 में उन्होंने तंग आकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। इसके बाद से वे कर्मकाण्ड और समाजसेवा के कामों में लगे हुए हैं।

ग्राम पंचायतों, चिकित्साधिकारियों और जिला प्रशासन सहित विभिन्न संस्थाओं, संगठनों ने उनके आयुर्वेद ज्ञान और व्यवहारिक सेवाओं को देखते हुए प्रशंसा पत्र प्रदान किए। उनके पास ऎसे ढेरों प्रमाण पत्र और प्रशस्ति पत्रों का अम्बार है।

आयुर्वेद के जानकार

अपने स्तर पर ही आयुर्वेद के पुराने नुस्खों के जानकार जड़ी-बूटियों के मामले में सिद्ध वैद्य की तरह विशेषज्ञ हैं।  वे बताते हैं कि अरावली के जंगलों में तमाम प्रकार की जड़ी-बूटियां विद्यमान  हैं। श्री भट्ट का जीवन कुशल वैद्यकीय अनुभवों से भरा है। वे हर साल अपने स्तर पर ही  च्यवनप्राश, सुपारी पाक, कौंच पाक, ब्रह्मरसायन आदि जो कद्रदान खूब पसन्द करते हैं।

निष्काम सेवा सराहनीय

अपने स्तर पर आयुर्वेदिक उपचार करते हुए उन्होंने सैकड़ों मरीजों को परंपरागत आयुर्वेदिक नुस्खों से लाभान्वित किया। निष्काम सेवा के पर्याय श्री दिनेश भट्ट द्वारा की गई आयुर्वेद जगत की सेवाएं अपने आप में लोक सेवा का यादगार इतिहास है।

पहले नौकरी के वक्त जमानत ली जाती थी। श्री भट्ट बताते हैं कि उनके लिए बागीदौरा के प्रधान एवं जाने-माने राजनेता श्री मोहनलाल आचार्य ने छह हजार की जमानत दी थी। आयुर्वेद कार्मिकों के संगठन में भी श्री दिनेश भट्ट की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। आयुर्वेद धात्री परिचारक संघ के प्रान्तीय अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल को लोग आज भी याद करते हैं।

बहुमुखी रचनात्मक कार्यकर्ता

कानून कायदों से लेकर सभी प्रकार की जरूरी शिक्षा-दीक्षा के प्रति आपका रुझान विद्यार्थी काल से ही रहा है और नौकरी में रहते हुए भी अनेक पाठ्यक्रमों व परीक्षाओं में सफलता हासिल की है।  बार कौंसिल आफ राजस्थान से भी उन्हें कोर्ट-कचहरी से संबंधित काम करने के लिए पात्र माना गया। ज्यूरिस प्रमाण पत्र भी उन्होंने प्राप्त किया है।  आपकी रुचि कबड्डी, खो खो, क्रिकेट, फुटबाल, वालीबाल आदि में रही तथा विभिन्न प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। संगीत, कविता, भजन आदि के सृजन और गायन में भी सिद्धहस्त हैं।

कठोर अनुशासन के हामी

वैदिक संस्कृति और पुरातन परंपराओं का अनुगमन करने वाले श्री दिनेश भट्ट अच्छे वैद्यकीय कौशल के साथ ही कर्मकाण्ड और प्राचीन विधाओं में भी प्रवीण हैं। धार्मिक और पौराणिक अनुष्ठानों में अनुशासन के वे हामी हैं। उनका मानना है कि इनमें कोई समझौतावाद या  शिथिलता नहीं होनी चाहिए तभी पूरा पुण्य व प्रभाव सामने आ पाता है।

मस्त मौला प्रेरक, बेपरवाह फक्कड़

वे हर बात को साफ-साफ कहने के आदी हैं इसलिए लोग उनसे घबराते भी है। निरपेक्ष और बेबाक व्यक्तित्व के धनी श्री दिनेश भट्ट को इसी वजह से दिनेश बादशाह और दादा के रूप में संबोधित किया जाता है। दिनेश भट्ट अपने आप में वह विलक्षण व्यक्तित्व हैं जो भारतीय संस्कृति, संस्कारों और परंपराओं के संवाहक के रूप में प्रेरणा के स्रोत हैं।

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