सब जगह है रोजड़ों की धींगामस्ती

रोजड़ों से सारी दुनिया हैरान-परेशान है। रोजड़ों के पास न कोई हुनर है, न बुद्धि। फिर भी कोई रोजड़ा ऎसा नहीं दिखता जो मरियल हो। हर रोजड़ा हृष्ट-पुष्ट और जबर्दस्त ताकतवर होता है। पुल्लिंग, स्त्रीलिंग रोजड़े हों या नपुंसक लिंगी रोजड़े। इनकी धमाल में कहीं कोई अन्तर नहीं।

रोजड़ों के लिए क्या जंगल और क्या खेत-खलिहान या बस्तियाँ। रोजड़ों के लिए पूरी दुनिया ही उनका वह आँगन है जहाँ वे जब मन करे, कुलाँचे भरते हुए धमक जाते हैं और चन्द मिनटों में सब कुछ ऎसे साफ कर जाते हैं जैसे कि उनके बाप-दादाओं और पूर्वजों ने ही उनके लिए सब कुछ रख छोड़ा हो।

रोजड़ों के पास न कोई लाईसेंन्स है, न उनके लिए कोई वर्जना। कोई सा खेत हो, कोई सी फसल हो, रोजड़ों के लिए इन्हें चट कर जाना मामूली बात है। मुफत का माल उड़ाने और उन्मुक्त धींगामस्ती करते हुए पूरी की पूरी दादागिरी और धमाल करना रोजड़ों का जैसे प्रकृति प्रदत्त अधिकार ही हो गया है।

रोजड़ों के लिए कहीं भी कहर बरपा देना मुश्किल नहीं। रोजड़े  वनों-जंगलों से लेकर बस्तियों तक में कोहराम मचा सकते हैं। गाँव की पगडण्डियों से लेकर राज्य एवं राष्ट्रीय राजमार्गों तक अपनी उछलकूदिया प्रतिभा का इस्तेमाल कर सकते हैं।

किसी जमाने में रोजड़े कुछ-कुछ खास भौगोलिक क्षेत्रों में ही बतौर मेहमान विद्यमान हुआ करते थे लेकिन वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में रोजड़ों ने पालों-फलों, ढांणियों, गांवों, कस्बों और शहरों से लेकर राजधानियों व महानगरों तक में अपनी सियासत का डंका बजा रखा है।

इन रोजड़ों के लिए पूरी दुनिया ही उनकी अपनी है, चाहे जहाँ, चाहे वो सब कुछ कर सकने में समर्थ हैं ये। और वह भी बिना किसी लाज-शरम के। रोजड़ों को किसी से शर्म नहीं आती। नंग-धड़ंग होकर उछलकूद करते हुए संगी-साथी रोजड़ों के साथ खेतों में खड़ी फसल को बर्बाद कर सकते हैं, किसी को धराशायी कर सकते हैं और ज्यादा उन्मादी हो जाएं तो सरेराह अचानक से सड़कों पर कूद कर किसी की भी जान ले सकते हैं।

रोजड़ों की उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही विस्फोटक संख्या के मौजूदा दौर में किसी की हिम्मत नहीं है कि रोजड़ों के लिए आपातकाल की तरह कोई विराट और देशव्यापी नसबन्दी अभियान चलाए और इनकी संख्या को नियंत्रित करे। इसलिए अब रोजड़े देशव्यापी बहुसंख्यक हो गए हैं।

रोजड़ों की उत्पाती धींगामस्ती को देखते हुए अब यह कहा जाने लगा है कि रोजड़े सब जगह हैं, कहाँ नहीं हैं रोजड़े। रोजड़ों को जंगलों से लेकर तरह-तरह के बाड़ों, बस्तियों और राजमार्गों तक देखा जाने लगा है। रोजड़ों के लिए यह दुनिया अब धर्मशाला या अभ्यारण्य हो चली है।

कई-कई रोजड़े तो अकेले ही इतने ताकतवर हैं कि खुद के बूते कहीं भी औचक कहर ढा सकते हैं। और अधिकांश बार देखा जाता है कि ये रोजड़े गिरोह के रूप में लक्ष्य संधान करने के लिए छापामार युद्ध की तर्ज पर एक साथ झुण्ड के झुण्ड निकल कर टूट पड़ते हैं और विजयश्री का वरण करने के उपरान्त ही स्थान छोड़ते हैं।

कलिकाल में रोजड़ों की माया से सब परिचित हो रहे हैं। पता नहीं किसी देवी-देवता या राक्षस-राक्षसी ने रोजड़ों को अपना वाहन क्यों नहीं बनाया। यह भी संभव है कि रोजड़ों की उत्पत्ति ही कलियुग में हुई हो। अथवा यह भी संभव है कि पुराने जमाने के राक्षस-राक्षसियां, दुष्टों और धूर्त-मक्कारों का रोजड़ों के रूप में ही  अब जन्म हो गया हो।

तभी यह अनुभव में आ रहा है कि रोजड़ा हो या रोजड़ी, इनमें एक भी ऎसा नहीं दिखता जो शालीन, सभ्य और संस्कारी हो। रोजड़ों ने मानवीय मूल्यों, संस्कारों, नीति और सभी प्रकार की मर्यादाओं के खेतों को चट कर लिया है और आज ये खेत बंजर होकर रह गए हैं।

कुछ अरसे पहले तक कुछ क्षेत्र ऎसे बचे भी थे जहाँ खेतों में पैदावार और हरियाली देखी भी जाती थी पर रोजड़ों ने अब हर क्षेत्र में इस कदर घुसपैठ कर ली है कि कोई इलाका, बाड़ा या परिसर ऎसा नहीं बचा है जिसे रोजड़ों से खतरा न हो या जिसे रोजड़ों ने नेस्तनाबूद न कर लिया हो।

इन रोजड़ों ने सारी मर्यादाओं की निर्मम हत्या कर डाली है। लगता तो यही है कि पुराने जन्मों के सारे दुष्ट-दुष्टाएं, राक्षस-राक्षसियाँ, मुफ्तखोर, चोर-उचक्के, लूटेरे, डकैत, निकम्मे, हराम का खाने-पीने और जमा करने वाले, जमाने भर में अपने क्रूर और हिंसक व्यवहारों से मानवता का गला घोंट देने वाले सारे के सारे लोग रोजड़ों के रूप में पैदा हो गए हैं।

जिस तरह से इस किस्म के लोगों की वर्तमान में भी तादाद बढ़ती जा रही है, उसे देख यह कल्पना की जा सकती है कि आने वाले समय में रोजड़ों की संख्या अपार हो जाएगी और आतंक पराकाष्ठा पार कर जाएगा।

बहुत से लोग हैं जो रोजड़ा बनने की क्यू में लगे हुए दिखते हैं। हमारे आस-पास और सम्पर्कितों में भी बहुत सारे हैं जिनकी हरकतों और करतूतों को देख कर विश्वास किया जा सकता है कि रोजड़ों की आने वाली खेप में इनके लिए भी कहीं न कहीं सम्मानजनक स्थान होगा ही।

जी भर कर जमाने भर को परेशान करने वाले रोजड़े इतने अधिक शातिर और चतुर हैं कि इन्होंने अपने आपको नील गाय के रूप में जबरन पूज्य मनवा लिया है। फिर जहाँ गाय का नाम हो, वहाँ रोजड़े जीवन भर के लिए अभयदान और पूज्य भाव को प्राप्त कर लिए हैं।

रोजड़े चाहे किसी का कितना ही नुकसान कर लें, वाहनों पर कूद पड़ें और किसी को भी दुर्घटना मौत के घाट पहुंचा दें, किसी पर बेरहम हमला कर दें, घायल कर लहूलुहान कर मरा-अधमरा कर डालें, कोई इन्हेंं रोकने-टोकने वाला नहीं।

रोजड़ों का अपना संगठन कौशल और सामथ्र्य इतना अधिक है कि दुनिया के दूसरे जानवर भी इनके आगे खुद को बौना मानते हैं। बेचारी असली गाय भूख-प्यास से मरे तो मरती रहे, कोई देखने वाला नहीं। लेकिन रोजड़ों के लिए भूख-प्यास का कोई संकट नहीं। चाहे जिसके बाड़े और खेत में घुस जाएं, कुछ भी कर जाएं, अपने आपको नील गाय मनवा कर पल्ला झाड़ देते हैं। नील गाय के रूप में पूज्य हो चले रोजड़ों की मटरगश्ती को कोई रोकने वाला नहीं।

आजकल सब तरफ रोजड़ों और इंसानों में संघर्ष का दौर चला हुआ है। इंसान लाख समझाए, कोशिश करें पर रोजड़े समझने वाले नहीं, वे अपनी पर तुल आए हैं और कुछ भी मानने को तैयार नहीं।

समाज, क्षेत्र और देश की असली समस्या अब रोजड़े होते जा रहे हैं।  रोजड़ों के रूप में ये जितने हिंसक, लूटेरे और विध्वंसक हैं उतने ही नील गाय के रूप में पूज्य। अब भला कौन इन अधर्मी नील गायों से पंगा ले।

यही सब देख कर रोजड़े मदमस्त हो चले हैं। कहीं रोजड़े शराब की भट्टी के इर्द-गिर्द घूम-फिर कर हवाओं से मदिरा का पान करते रहते हैं, कहीं अफीम के खेतों को चट कर नशे में मदमस्त हो रहे हैं, और कभी तम्बाकू और गुटखों के स्वाद या सूंघने के फेर में बाहर निकल आते हैं।  रोजड़ों के पास मदमस्त होने के कई सारे उपाय उपलब्ध हैं। जिस रोजड़े को जो पसंद आ जाता है उसी में रमा हुआ मादक और उन्मादी हो जाता है।

वह दिन दूर नहीं जब रोजड़ा देव या रोजड़ा माता के स्थानक बनने भी शुरू हो जाएंगे, उनके नाम पर भजन और आरतियां गूंजने लगेंगी, रोजड़े और अधिक पूज्य एवं सर्वमान्य हो उठंंेगे। भगवान बचाए जात-जात के इन उत्पाती रोजड़ों से।