दुःखी करते हैं ये गूंगे-बहरे

जो वाकई दिव्यांग हैं वे हमारे लिए सम्माननीय भी हैं और सभी सुविधाओं के हकदार भी। इन दिव्यांगाें को सभी प्रकार से सहयोग करना हम सभी का पहला फर्ज है। पर इनके सिवा खूब सारे लोग हैं जो न गूंगे हैं, न बहरे, बल्कि जीते ऎसे हैं जैसे कि वास्तव में गूंगे और बहरे ही हों। इनके जीवन का हर कर्म, व्यवहार और स्वभाव गूंगे-बहरों जैसा ही हो जाता है।

चाहे इनके कितने ही बड़े कान हों, भाग्य की निशानी वाले लम्बे-लम्बे बालों से भरी हुई श्रवणेन्दि्रयां हों, भरे-पूरे खुलने वाले मुँह हों, पर इनका उपयोग उन्हीं के लिए होता है जो अपने हैं, अपने लिए काम आने वाले हैं और अपने काम या स्वार्थ पूरे करने वाले हों।

इन छद्म गूंगे-बहरों की जमात भी आजकल कोई कम नहीं है। ‘‘ जितनी चाभी भरी राम ने, उतना चले खिलौना’‘की तर्ज पर ये उतने ही चलते हैं जितना इनके आका चलाते या ईंधन भरते हैं। बहुत से हैं जिन्हें कितनी ही बार और कितना ही कहा जाए, वे एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देंगे। हाँ-हूँ ही कर पाते हैं जैसे कि ये जन्मजात बहरे हों और कुछ भी सुन नहीं पा रहे हों।

सब कुछ सुनते हुए भी अनसुना कर देना इन लोगों की वह आदत होती है जिसकी वजह से इन्हेंं पहचाना जाता है। इनके बारे में कहा जाता है कि जिन लोगों के कान खिंचने वाला कोई नहीं होता, उनके कान कच्चे रह जाते हैं और इन कच्चे कानों की ही वजह से ये लोग बाहरी दुनिया से तब तक बेखबर रहा करते हैं जब तक कि जो आवाज इनके कानों की तरफ आती है उसमें कोई स्वार्थ या अपने काम की किसी ऎषणा या विलासिता का सुकूनदायी समावेश न हो।

आमतौर पर ये गहरी आत्म निद्रा में सोए पड़े रहते हैं इसलिए इनका जागरण कोई आसान काम नहीं है। इनका जागरण मुद्रा की खनक से ही हो सकता है अथवा इनके जिस्म के लिए जरूरी किसी न किसी प्रकार की विशिष्ट गंध से ही।

इसी प्रकार गूंगों का भी बाहुल्य बढ़ता जा रहा है। ये भी तभी मुँह खोलते हैं जब कहीं से कुछ पाने की उम्मीद हो। अन्यथा कितना भी कुछ कह लो, कितना ही उत्तेजित-उत्प्रेरित कर लो, ये होंठों को सायास सी कर रखते हैं।

अपने आस-पास और बाहर की दुनिया में चाहे जो हो जाए। अच्छा हो या बुरा। इन लोगों को इससे कोई सरोकार नहीं रहता। ये लोग हमेशा चुप्पी साधे रहते हैं।

इनके भी होंठ तभी खुलते हैं जब अपने स्वार्थ का कोई विषय हो या किसी भी प्रकार याचना अथवा कृपा प्राप्ति का कोई लपलपाता हुआ विषय इनके सामने आ जाए और पूरी उम्मीद हो कि उनके शब्द व्यर्थ नहीं जाएंंगे, एक बार बाहर निकलेंगे तो अपने लिए कोई न कोई इंतजाम करके ही बाहर आएंगे।

और लौटेंगे तो मनचाही खुशियों को लेकर ही। इन लोगों का बोलना भी बेशकीमती है और सुनना भी।  इन्हें बुलवाना और इन्हें सुनाना भी बड़ा दुश्कर कार्य है। यह कार्य भी वे ही लोग कर सकते हैं जो कि इनकी आदतों, शौक और अन्दरूनी अभिरुचियों से वाकिफ हैं, यह भी अच्छी तरह जानते हैं  इन लोगों को कैसे और किन-किन तरीकों से खुश किया जा सकता है।

इन गूंगों और बहरों की जमातों के कारण ही  परिवेशीय समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय विषमताओं का जन्म होता रहा है क्योंकि ये लोग अपने स्वार्थों में इतने अधिक डूबे हुए हैं कि सच न बोल-सुन पा रहे हैं और इसका साहस हैं। इसलिए भीतरी सत्य बाहर नहीं आ पा रहा है और झूठ के ढक्कन बुलंदियों को दर्शाने लगे हैं।

हमारी ढेर सारी समस्याओं, विपदाओं और तनावों के कारण वे ही लोग हैं जो खुद गूंगे-बहरे बने बैठे हैं और सभी को दुःखी करने का ठेका लिए हुए हैं।