अभिशप्त है इनका दाम्पत्य जीवन

अभिशप्त है इनका दाम्पत्य जीवन

सामाजिक प्राणियों के बीच विवाह का परंपरागत और धर्मसम्मत बन्धन अपने आप में जीवन भर के लिए दाम्पत्य माधुर्य का वह दरिया है जो हमेशा पूरे वेग से बहता रहना चाहिए, तभी जिन्दगी का आनंद प्राप्त हो सकता है।

जो अविवाहित हैं, जिन्हें अपने मनोनुकूल वर या वधू नहीं मिल पा रहे हैं, उन्हें देखियें, जिन्हाेंंने अपने वैवाहिक जीवन के किमते सारे स्वप्न संजोये हुए हैं। और एक वे लोग हैं जो विवाहित होते हुए भी एकाकीपन और दाम्पत्य जीवन में संघर्षों के दौर से गुजरते हुए वैवाहिक जीवन को कटु और तीक्ष्ण बनाए हुए कुण्ठित जिन्दगी जीने को विवश हैं। सब कुछ ठीक-ठाक होते हुए भी अपने मनोमालिन्य और पौरूषी दंभ में पत्नी को त्याग दिया है अथवा सभी प्रकार का सौभाग्य होते हुए पति से दूरियां बना डाली हैं।

इन विवाहितों के स्वभाव, चरित्र और लक्षणों के बारे में यदि पहले सब कुछ पता चल जाता तो आज तक ये कुँवारे होकर अभिशप्त जीवन जी रहे होते, जिन्हें दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं हो पा रहा है, विवाह के लायक जीवनसाथी नहीं मिल पा रहा है।

और उधर जिन लोगों को जीवनसाथी मिल चुका है, अपने-अपने रीति-रिवाजों के अनुसार वैवाहिक बंधन में बंध चुके हैं वे दाम्पत्य प्रेम में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि तो दूर की बात है, बात-बात में संघर्ष और बिखराव की बातें करते हैं, बेवजह वियोग और पृथक्कीकरण चाहते हैं।

इस मामले में सर्वाधिक दोषी आत्मजनित अहंकार ही हैं जिनकी वजह से जो अपना है, अपने लिए बना है, एक-दूजे के लिए पैदा हुआ है, उस समीप रहने वाले इंसान की उपेक्षा करते हैं।

यों भी इंसान का स्वभाव ही रहा है कि वह उसकी कद्र कभी नहीं करता जो उसे आसानी से प्राप्त हो जाता है अथवा जिसके बारे में यह पक्की धारणा बन जाती है कि अब वह लाख कुछ हो जाए, छोड़कर दूर जाने वाला नहीं है, उसे अपने ही सीमित घेरों और दायरों मेंं बंध कर रहना है, चाहे घुट-घुट कर रहे या कुण्ठित होकर।  यह सामीप्य गारंटी ही है कि जिसके कारण हम अपने सहधर्मियों की अवहेलना, उपेक्षा और अपमान करते रहते हैं। यह विश्वास न होता तो हमारी अक्ल ठिकाने आ जाती।

दुनिया की बहुत बड़ी भीड़ में खूब सारे लोग ऎसे हैं जिनके बारे में यह देखा जाता है कि वे दाम्पत्य के मामले में सब कुछ अनुकूलताएं होने के बावजूद मन मार कर साथ-साथ रहने लगे हैं या कि विवशता के कारण।

खूब सारे लोग एक-दूसरे पर आर्थिक रूप से निर्भर होने के कारण सीधे तौर पर साथ छोड़ नहीं पाते और इसलिए पूरी जिन्दगी मन मसोस कर रह जाते हैं और भगवान से यही प्रार्थना करते रहते हैं कि अगले जनम में किसी अच्छे का साथ देना, कम से कम इन्हें तो मत ही देना।

इंसान अब धार्मिक और सामाजिक मर्यादाओं में बंधे रहना मूर्खता और पोंगापंथी काम समझता है, फिर सामाजिक नियंत्रण और मूल्यांकन तथा सुरक्षा का परम्परागत चक्र अब विखण्डित हो गया है। कई सामाजिक क्षेत्रों में पूंजीवादी हावी हैं और कई स्थानों पर प्रभावशाली लोगों ने कब्जे कर रखे हैं।

इसलिए आम सामाजिक प्राणी का हित चिन्तक सामाजिक स्तर पर कोई दिखता नहीं। फिर मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना वाले हालातों के कारण स्थिति यह है कि कहीं पर भी बौद्धिक समुद्र मंथन में कोई निष्कर्ष निकलने की संभावना ही नहीं रहती।

इन स्थितियों के कारण समझदार और धीर-गंभीर लोग इसी में भलाई मानते हैं कि चाहे जो हो रहा हो, होने दो। प्रबुद्धजन पलायन कर जाते हैं इस कारण अखाड़ची ही सब जगह बने रहते हैं और ऎसे में समाज और क्षेत्र की स्थिति क्या होगी, इस बारे में आसानी से सोचा-समझा जा सकता है।

बात यदि वैवाहिक संबंधों की करें तो देखने में यह आता है कि अधिकांश विवाहित लोग अकेले की रहना पसन्द करते हैं। उन्हें अपने जीवनसाथी और बच्चों के साथ आने-जाने में शरम आती है।

जो लोग सार्वजनिक क्षेत्रों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं, बड़े और महान समाजसेवी कहे जाते हैं, स्वयंसेवी संस्थाएं चलाते हैं, सर्वजनिक जीवन से जुड़े सरोकारों में अहम् भूमिका का निर्वाह करते हैं, उनमें से कितने लोग हैं जो अपने परिवार के साथ उत्सवों, समारोहों, पर्वों, मेलों और विभिन्न जन आयोजनों मेंं देखे जाते हैं?  इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करें तो हमारा सर शर्म से नीचे झुक जाता है।

यह देखकर ग्लानि होती है कि अधिकांश में इंसान अकेला ही दिखता है। न पत्नी साथ होती है, न बच्चे। अपने घर के बुजुर्गों को तो साथ ले जाने में उसे शर्म ही आती है।  विवाहित होने के बाद सभी प्रकार के आयोजनों में पूरे परिवार के साथ हिस्सेदारी निभानी चाहिए और उसमें न केवल पति-पत्नी और बच्चे, बल्कि माता-पिता और घर के बड़े-बुजुर्ग भी शामिल होने चाहिएं।

बहुत सारे लोग जो महिलाओं के विकास, स्वतंत्रता, नारी चेतना और महिला सरोकारों से जुड़े आन्दोलनों और आयोजनाेंं में बढ़-चढ़ कर भाषण देते हैं उनमें से भी खूब सारे लोग हैं जिन्हें सार्वजनिक आयोजनों में कभी भी अपनी पत्नी और बच्चों, माता-पिता अथवा घर के बुजुर्गों के साथ नहीं देखा गया।

इस मामले में अभिजात्य और मध्यम वर्ग के लोगों की मानसिकता को दोषी माना जा सकता है जो पारिवारिक हैसियत रखने के बावजूद परिवार को साथ नहीं रखते और जो भी उत्सवी आनंद पाना चाहते हैं वे अकेले ही अकेले।

लजीज खान-पान से लेकर पार्टियों, शादी-ब्याह के रिसेप्शनों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में खुद को ही सब जगह परोसते रहते हैं। कई बार यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि फिर ऎसे लोगों ने शादी क्यों की, घर क्यों बसाया होगा जबकि घरवाली और घरवाले ही साथ नहीं होते।

उन सभी लोगों का दाम्पत्य जीवन अभिशप्त, असफल और निरर्थक माना जाना चाहिए जो परिवार की उपेक्षा करते हुए अकेले में दुनिया और जीवन के सारे आनंद पाने के लिए हमेशा उतावले रहा करते हैं और आनंद के क्षणों में परिवार को भूल जाते हैं।

इन लोगाेंं को परिवार की याद तभी आती है कि जब वे गंभीर बीमार हो जाएं, हार्ट अटैक हो जाए, बायपास सर्जरी की नौबत आ जाए या कोई सा अंग काम करना बंद कर दे और जान पर बन आए, उनके रक्त समूह के खून की जरूरत  हो या फिर पैसों की आवश्यकता पड़ जाए, एक्सीडेंट में सर फुड़वा डालें, हाथ-पाँव तुड़वा दें और सेवा-सुश्रुषा एवं ईलाज की आवश्यकता हो।

दाम्पत्य की अवहेलना और परिवारजनों की उपेक्षा करने वाले ऎसे लोगों का संसर्ग, सामीप्य और इनके साथ किया जाने वाला कोई सा व्यवहार भी शापित होता है और ऎसे लोगों के मांगलिक जीवन पर भी ग्रहण लग जाता है।

जो अपने परिवार के साथ आनंद उत्सव मनाता है, परिवार को सर्वोपरि सम्मान एवं आदर देता है, वही सामाजिक कहे जाने योग्य है और उसी का दाम्पत्य माधुर्य एवं सौभाग्य अक्षय बना रहता है।