देश है पहले, हम सब बाद में  ..

आतंकवाद क्या है, आतंकवादी कौन हैं, किस मजहब के हैं, इनके साथ क्या सुलूक किया जाना चाहिए ? इन सब बातों को कुछ समय के लिए दरकिनार कर थोड़ी गंभीरता से मंथन करें तो यह सार्वभौम स्वीकार्य निष्कर्ष निकल कर सामने आता है कि इन आतंकवादियों के माई-बाप, दादा-दादी और नाना-नानी हमारे ही बीच विद्यमान रहे हैं जिन्होंने अपनी कुर्सी या किसी न किसी तरह की अतृप्त सांसारिक वासनाओं के मोहजाल में पड़कर आतंवादियों को पैदा किया है, उन्हें प्रश्रय दिया है।  इंसान की व्यभिचारी मानसिकता, देश और समाज की अपेक्षा अपने कुटिल स्वार्थों और मिथ्या प्रतिष्ठा को बनाए रखने की सुरसा भूख और हृदय में हिलोरें ले रहा पूतना जहर इसके लिए दोषी है।  सर्वधर्म समभाव, सौहार्द, भाईचारा, शांति, अहिंसा और भ्रातृत्व भाव के लिए दुनिया भर में मशहूर भारतवर्ष इन देशद्रोहियों-आतंवादियों, नक्सलियों, देश की जड़ों को कुतर-कुतर कर खाने वाले वर्णसंकर मूषकों और दीमकों से परेशान है।  जरूरत चिल्लाने या किसी को दोष देने की नहीं है बल्कि यह है कि इनकी जड़ों तक पहुंचकर इनका रसायनिक उपचार किया जाए। देश सर्वोपरि है और रहेगा। हमारा अस्तित्व तभी तक है जब तक देश हमारा है। दुर्भाग्य यह भी है कि जो लोग देश को अपना समझते हैं वे इस कदर भटक गए हैं कि देश को अपने लिए समझ बैठे हैं इसलिए खाते ही जा रहे हैं। ये लोग भी देश के लिए खतरनाक हैं। वे लोग भी देश के लिए खतरा हैं जो देश-देश, समाज-समाज चिल्लाते हैं मगर यह सब उनकी वाणी तक ही सीमित है। देश और समाज के लिए न तो कुछ करते हैं, न कर पाने की उदारता। ( नोट – संवेदनहीन, स्वार्थी, धूर्त और कपटी लोग कृपया इसे न पढ़ें)