धन-सम्पदा देता है यह दुर्लभ संयोग

धन-वैभव सभी चाहते हैं और इसके लिए जीवन भर पुरुषार्थ भी करते हैं। लेकिन भगवान ने बहुत से विशेष समय निर्धारित किए हैं जिनमें पूजा-उपासना का अपार फल प्राप्त होता है। भगवती दुर्गा के इन 108 नामों के लिए कहा गया है कि मंगलवार और अमावास्या के साथ शतभिषा नक्षत्र होने का संयोग हो तो इनका लिख कर पाठ करने से धन-सम्पदा की कमी नहीं रहती। इसकी फलश्रुति में स्पष्ट किया गया है – विलिख्यं प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेद संपदा पदम्। जब भी ऎसा दुर्लभ संयोग आए, उस रात को इस स्तोत्र को सफेद कागज पर लाल स्याही से लिखें और फिर पाठ करें। यह अनुभूत प्रयोग है जिससे अपने जीवन में धन की कोई कमी नहीं रहती है। ऎसे संयोग बहुत कम बार आते हैं। पूरा फायदा उठायें और देवी कृपा प्राप्त करें।


श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्

ईश्वर उवाच

शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने।

यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥ 1॥

ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।

आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥ 2॥

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।

मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः॥ 3॥

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।

अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः॥ 4॥

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।

सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥ 5॥

अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।

पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी॥ 6॥

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।

वनदुर्गा च मातंगी मतंगमुनिपूजिता॥ 7॥

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।

चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः॥ 8॥

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।

बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ॥ 9॥

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।

मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥ 10॥

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।

सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा ॥ 11॥

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।

कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः॥ 12॥

अप्रोढा चैव प्रोढा च वृद्धमाता बलप्रदा।

महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला॥ 13॥

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।

नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥ 14॥

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।

कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥ 15॥

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।

नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति ॥ 16॥

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।

चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्॥ 17॥

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।

पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम् ॥ 18॥

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि।

राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात् ॥ 19॥

गोरोचनालक्तककुंकुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण।

विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः ॥ 20॥

भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।

विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम् ॥ 21॥

इति श्रीविश्वासरतन्त्रे दुर्गाष्टोतरशतनामस्तोत्रं