छातीकूटिए अमर रहें

आज अगर छाती कूटने वालों की गणना शुरू हो जाए तो सभी जगह बहुत से लोग मिल जाएंगे जो बिना किसी कारण के छाती पीटते रहने के सिवा कुछ नहीं करते। इनके छाती पीटने के पीछे के कारणों को तलाशा जाए तो इनकी जिन्दगी से जुड़ा एक भी कारण  ऎसा नहीं मिलेगा जिसकी वजह से इन्हें छाती कूटनी पड़े।

दूसरों के सुखों, तरक्की और शुचिता को देखकर ये छाती कूटते रहते हैं। हर स्थान पर इन्हीं की तरह के दूसरे लोगों की भरमार है। छाती कूटने वालों में किसी प्रकार का कोई लिंगभेद नहीं है नर-नारी या उभयलिंगी सब शमिल हैं इनमें। समान किस्म के ये लोग किसी न किसी मोड़ पर मिल कर अपने छोटे-छोटे समूह बना लिया करते हैं और इन समूहों को तब तक आनंद नहीं आता है जब तक कि ये किसी न किसी बाहरी विषय या दूसरों के बारे में सोच-सोच कर छाती न पिटने लगें।

छाती कूटिया समूहों को भले ही अपने लिए कुछ भी हासिल न हो पाए, लेकिन इनके हीमोग्लोबिन, शुगर, ब्लड़ प्रेशर और दिमागी संतुलन को ठीक-ठाक रखने के लिए छाती पीटना ठीक उसी तरह जरूरी होता है जिस तरह सूअरों को थूथन रगड़कर कचरे और गंदगी के ढेर या  कि गन्दे नाले से अपनी मनपसंद दुर्गन्ध की तलाशी, या फिर चूहों के लिए निरन्तर दाँत घिसने की मजबूरी अथवा  झींगुरों को हर क्षण गूंजायमान रहकर नीरवता और शांति भंग की विवशता।

आने वाले समय में लगता है छाती कूटिया सम्प्रदाय या छाती कूट जाति का प्रादुर्भाव होगा ही, जिसके हर कर्म में छाती कूटने की विवशता बनी रहेगी। इसके मठाधीश की तलाश इन लोगों को अभी से आरंभ कर देनी होगी। छाती पीट-पीट कर अपने हृदय को मजबूत और निष्ठुर बनाने वाले सभी लोग धन्य हैं जिनकी वजह से शोक संवेदनाओं और रुदालियों का वजूद बना हुआ है। लगता है विधाता ने इन लोगों को केवल छाती पीटने के लिए ही धरती पर भेजा हुआ है। छाती कूटने वालों को कूटने दें …