चापलुसी जिन्दाबाद, चमचागिरी अमर रहे

चापलुसी जिन्दाबाद, चमचागिरी अमर रहे

कोई ज्ञान, हुनर और प्रतिभा न हो तो कोई बात नहीं। आजकल लोग चापलुसी और चमचागिरी के सहारे इतने अधिक आगे बढ़ गए हैं, प्रतिष्ठा पा चुके हैं कि पढ़े-लिखों, हुनरमन्दों और बुद्धिजीवियों की बजाय इनकी अधिक पूछ हो रही है।

आजकल प्रतिभा, हुनर और कर्म में दक्षता की बजाय अनुचरों, अंधानुचरों और भेड़ों की तरह सिर झुकाकर पीछे-पीछे चलते रहने वाले लोगों की पूछ है या फिर उन लोगों की जो चरण स्पर्श करने, पाँव दबाने, मालिश और चम्पी करने, जी हुजूरी करने और कर्णप्रिय प्रशंसा सुनाने वालों की। चरण स्पर्श तो आजकल सर्वाधिक प्रचलित फण्डा हो गया है।

कोई भी धर्म, सत्य और नीति, न्याय और यथार्थ पर जीना नहीं चाहता। कुछ फीसदी लोगों को छोड़ दिया जाए तो सारे के सारे इसी मानसिकता के हैं कि उन्हें अपने जीवन में सफलता पाने से मतलब है चाहे इसे पाने के सारे रास्ते कितने ही गन्दे क्यों न हों।

जब से सामूहिकता और सामाजिकता का लोप होने लगा है, आदमी अपने ही अपने लिए जीने लगा है। दुनिया जाए भाड़ में। एक तरफ खुदगर्ज लोगों के समूहों की तूती बोलती रहती है और दूसरी तरफ मूर्खों और नासमझों की भीड़ बिना कुछ समझे जयगान करती हुई करतल ध्वनि करती रहती है।

भीड़ में शामिल बन्दे इसी बात से खुश हैं कि वे उनकी निगाह मेंं आ गए हैं जो उन पर कृपा दृष्टि बरसाने वाले हैं और अपने आपको भाग्यनिर्माता और नियन्ता समझने वाले लोग खुद को धरती का देवता साबित करते हुए भीड़ को भरमाने के लिए हर तरह के जतन करते रहते हैं।

आदमी का अपना अकेला कोई वजूद नहीं रहा। कभी वह किसी परिवार के नाम से जाना जाता है, कभी किसी सरनेम को बरसों से घसीटता हुआ अपने नाम के साथ लगाकर मौज उड़ाता है, कभी दूसरों के नाम से पहचान बनाता है और कभी किसी न किसी का पालतु होकर जीने में भी आनंद और गर्व महसूस करता है।

जब से जमाने भर में चमचों और चापलुसों की मौज उड़ने लगी है तभी से सब तरफ यह महसूस किया जाने लगा है कि आखिर इंसान लम्बा समय लगाकर मेहनत क्यों करे, जब दूसरे लोगों को बिना पढ़-लिखे, और बिना किसी हुनर के वो सब कुछ प्राप्त हो रहा है जो जीवन में हर किसी को अपेक्षित होता है, तब से लोगों की मानसिकता बदलने लगी है और वे भी परंपरागत भीड़ को छोड़कर उस भीड़ में शामिल होने लगे हैं जहाँ स्वाभिमान नाम का कोई तंतु नहीं होता, वंश परंपरा और कुल प्रतिष्ठा का कोई भान नहीं होता, किसी को किसी भी तरह की शरम नहीं आती। गाय बगुले भी बढ़ते जा रहे हैं और साण्ड-बगुले भी।

सारे के सारे अपनी लाज-शरम छोड़कर चंद लोगों को खुश करने के तमाम प्रकार के जतन में लगकर धींगामस्ती करने को ही जीवन लक्ष्य मानकर जहाँ-तहाँ मौज उड़ा रहे हैं।

एक तरफ अपने सुरक्षित भविष्य को बनाने की चिन्ता, कठोर परिश्रम और धैर्य आदि जरूरी हैं और दूसरी तरफ कुछ नहीं। बस एक ही हुनर होना चाहिए। और वह है जी भर कर चापलुसी-चमचागिरी करने का, और सम्पूर्ण बेशर्मी के साथ सर्वस्व समर्पण का भाव।

लक्ष्य सभी का एक – सामने वाले खुश हो जाने चाहिएं और हमेशा खुश रहने भी। फिर जी भर कर लूटोे, कमाओ, खाओे, पीयो और पिलाओ, कुछ भी करो और करवाओ, कोई पूछने या रोकने-टोकने वाला।

इस गैंग में सारे खुदगर्ज हैं इसलिए दूसरे की कोई परवाह नहीं। जितना अपने लिए बटोर सको, बटोरते चले जाओ। डकैतों के कुनबे में चोरों को हीन नहीं बल्कि सहयोगी ही समझा जाता है और चोर-डकैत भाई-भाई की तरह माने जाते हैं।

अब न तो जीने का माद्दा रखने वाले खुद्दार इंसान नज़र आते हैं न स्वाभिमानी लोग। यह बीते जमाने की बात हो गई है।  चन्द लोगों को छोड़कर सारे अपने लिए जी रहे हैं। जहाँ कहीं भीड़ का माहौल दिखता है उसमें जो चेहरे दिखते हैं उनके बारे में गहराई से सोचे तो नगण्य लोग ही पढ़े-लिखे, मानवीय संवेदनाओं वाले, सेवा और परोपकार में रुचि लेने वाले और कमाने-लायक मिलते हैं।

जिन्हें प्रबुद्ध और समझदार माना जाता है वे परायों के टुकड़ों और झूठन पर पले हुए होने के कारण अपने जमीर को इतना अधिक खत्म कर चुके हैं कि इन ठूँठों में चाहे कितनी सिंचाई की जाए, स्वाभिमान, सम्मान और सत्य के अंकुर फूटना असंभव ही है।

पिछलग्गू होने के मामले में हमने सारी हदें पार कर दी हैं। कोई किसी के साथ सिक्योरिटी गार्ड की तरह घूम रहा है, कोई अर्दली की तरह सेवा में जुटा रहता है, कोई ऎसे साथ रहता है जैसे कि दहेज में साथ आया हो।

शर्मनाक और दुर्भाग्यजनक बात तो यह है कि कई बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों और ओहदेदारों की अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं जो कि अपना सब कुछ भुलाकर ऎसे-ऎसे लोगों की सेवा-चाकरी और बटरिंग में जुटे हुए हैं जिन्हेंं दुनिया के लोग सबसे खराब, धूर्त-मक्कार, पाखण्डी और झूठा मानते हैं।

हैरत तो तब होती है कि जब अच्छे और संस्कारवान परिवारों के लोग सत्य और धर्म को त्यागकर अपने स्वार्थ और नाजायज कामों, कृपा और दया पाने तथा प्रतिष्ठा प्राप्ति के लिए अपने आपको ऎसे समर्पित कर दिया करते हैं जैसे कि कोठे की वैश्याएँ पैसों की लालच में अपनी देह।

इन वैश्याओं को तो पैसे की दरकार भी होती है, जीवन चलाने के लिए कोई न कोई साधन जरूरी है लेकिन जो लोग खूब कमा रहे हैं, ऊपर से, नीचे से, दांये-बांये से, आगे-पीछे हर तरफ से कमाई कर रहे हैं, उन्हें क्या कहें।

हालात ये हैं लोग जिन पर आँख मूँद कर भरोसा करते हैं, जिन्हें अपना और अपने लिए मानते हैं, ऎसे-ऎसे दलाल और खुदगर्ज लोग आजकल जो कुछ कर रहे हैं, उसे बयाँ करना संभव नहीं है। इतना सब कुछ देखते-सुनते हुए यह तो मानना ही पड़ेगा कि आजकल चमचागिरी और चापलुसी जैसी ट्रेड्स का जितना अधिक जोर चल रहा है, उतना पहले कभी नहीं रहा।

यही सब चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मैनेजमेंट की पढ़ाई में ये विषय भी शामिल हो जाएंगे। क्योंकि बिना कुछ किए सब कुछ हासिल कर लिए जाने का इससे बड़ा और कोई रास्ता दिख ही नहीं रहा।