चंगू-मंगू जिन्दाबाद, राहु-केतु अमर रहें

बीते युगों के तमाम प्रजातियों के असुरों का इतिहास रहा है कि कोई भी एक असुर कहीं भी कुछ नहीं कर सकता। एक अच्छा और सच्चा इंसान अपने अकेले के बूते वह सब कुछ सृजन कर सकता है जो कि वह चाहता है।

स्थानीय से लेकर प्रादेशिक, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो अकेले आदमी ने इतना अधिक परिवर्तन ला दिया है कि इन्हें बाद में महापुरुष के रूप में स्वीकारा और पूज्य माना गया और बहुत से हैं जिन्हें सदियों और युगों के बाद आज भी हम श्रद्धा से नमन करते, पूजते और उनके विचारों तथा उपदेशों को आत्मसात करते हैं।

कई बार ऎसा भी होता है कि कुछ लोग कालजयी महापुरुषों की श्रेणी में स्थान पा जाते हैं और इस कारण हो सकता है कि उनके अपने समकालीन दौर में उन्हें उतना सम्मान या श्रद्धा न मिले, किन्तु उनके जाने के बाद अधिक सम्मान और श्रद्धा के भाव के पैदा होते हैं और सदियों तक चलते रहते हैं।

सज्जनों और नैष्ठिक कर्मयोगियों के लिए हर स्थान, समय और अवसर अनुकूल होता है क्योंकि इनका लक्ष्य कर्म की सफलता पर केन्दि्रत रहता है न कि कर्म के फल पर। इसलिए उन्हें इस बात का कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि कौन उनकी ओर देख रहा है, कौन उनके कर्म को सराहने अथवा निन्दा करने का काम कर रहा है।  और इस मायने में अकेला कर्मयोगी अपने सृजनात्मक मेधावी हुनर और प्रज्ञावान कर्म के माध्यम से दुनिया भर में अपनी श्रेष्ठता का लोहा मनवा सकता है।

यह जरूरी नहीं कि यह सब कर्म के उपरान्त ही हो जाए, बल्कि संभव है कि इस कर्म के भीतर से सुगंध के कतरों का आविर्भाव कुछ बरस बाद तक भी हो सकता है और उस समय कर्म का फल पूर्ण परिपाक अवस्था में होता है जिसके बाद कत्र्तव्य कर्म शेष नहीं रहता बल्कि उसका फल और कर्म की सुगंध का शाश्वत प्रवाह आरंभ हो जाता है।

कर्म यदि निष्काम हो तब तो कर्मफल और इसकी सुगंध का दायरा असीमित हो उठता है और फिर यह प्रवाह कभी थमने का नाम नहीं लेता। निष्काम कर्म करने वालों के लिए कालजयी  यश, प्रतिष्ठा और अमरता प्रदान करने का जिम्मा ईश्वर का है क्योंकि सृष्टि के लिए कर्म करना भगवदीय कार्य एवं सेवा की श्रेणी में माना गया है।

इसके ठीक विपरीत अनचाहे लोगों की बहुत बड़ी संख्या बेमौसम ओलावृष्टि की तरह धरती पर यहाँ-वहाँ पैदा होती रहती है जिसके लिए अपना कोई जीवन लक्ष्य या कर्म नहीं होता सिवाय खुद निकम्मे बने रहकर दूसरों के कर्म में बाधाएं पैदा करते हुए कर्मयोग को विध्वंस करना और कर्मयोगियों की राह में बाधाएँ पैदा करते हुए रचनात्मकता के प्रवाह को बाधित करते रहना ही है।

अंधेरों को अपना आदर्श मानने वाले और अंधेरी गलियों में हर तरह की धमाचौकड़ी मचाने वाले ये लोग खुद भी अंधेरों में रहते हैं और दूसरों को भी अंधेरे में रखते हैं। आसुरी भावों से भरे-पूरे ये लोग चाहे किसी भी वंश-परिवार या सम्प्रदाय में पैदा हो जाएं, पर इनकी हरकतें और जीवन वृत्तियाँ एक सी होती हैं इसलिए हमें हर जगह पर यही भ्रम होता है कि ये एक जैसे लोग सब जगहों पर कैसे पैदा हो गए हैं।

कई बार तो रूप-रंग और आदतों में ये सहोदर लगते हैं और कई बार इनके स्वभाव और व्यवहार को देख कर यह अनुभव होता है कि ये सगे भाई या सगी बहनें ही हों। लोग इनमें फर्क तक नहीं कर पाते।

विध्वंसक और विघ्नसंतोषी मानसिकता वाले ये लोग चाहे कितने कुटिल, खल, कामी और महादुष्ट क्यों न हों, किन्तु अकेले अपने दम पर कुछ नहीं कर सकते। हर राक्षस या राक्षसी अपने आप में अधूरे ही होते हैं इसलिए इन्हें अपनी करतूतों, कारनामों और कारगुजारियों को पूरा करने के लिए किसी न किसी दूसरे साथी या साथिन की आवश्यकता पड़ती ही है और इसके बिना ये कुछ नहीं कर पाते।

अपने आस-पास से लेकर दुनिया भर में असुरों के इतिहास और इनके विध्वंस को देखा जाए तो अकेला असुर कभी कुछ नहीं कर सका है चाहे वह सतयुग, त्रेता युग या द्वापर युग का ही क्यों न हो। फिर कलियुग तो इनका अपना ही है।

दुष्ट, पापियों, असुरों और असुरियों, नरपिशाचों, डाकिनों-चुड़ैलों से लेकर हर प्रकार के असामाजिकों के लिए यह अनिवार्यता है कि कोई उनके जैसा दूसरा हो। और इनके भाग्य से ऎसे लोग सब जगह बिना किसी तलाश के मिल ही जाते हैं जिनके साथ मिलकर ये एक से बने दो होकर अपने आसुरी भावों का जागरण कर लिया करते हैं।

संसार भर में इन अधम नर-नारियों के बारे में सर्वे किया जाए तो एक के साथ एक फ्री असुर दिखेगा ही दिखेगा।  बीते युगों में शुम्भ-निशुम्भ हों या चण्ड-मुण्ड या और कोई, सबकी जोड़ियां रही हैं। आज कलिकाल का समय है इसलिए अब इन पापियों और दुष्टों की संख्या अधिक नज़र आती है।

और ये दोनों मिल जाने के बाद कहीं भी कुछ भी गोलमाल कर सकते हैं, हैरतअंगेज कबाड़ा करा सकते हैं, शांति भंग कर सकते हैं और किसी को भी आपस में लड़वा सकते हैं। फिर इनके साथ दूसरे साथी या साथिनें मिल जाएं तब तो उस स्थान या क्षेत्र की बरबादी होनी निश्चित ही है।

आजकल की भाषा में इन जोड़ियों को चंगू-मंगू, राहु-केतु आदि के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है। खूब सारे चंगू और मंगू तमाम प्रकार के परिसरों में उपलब्ध हैं। अकेला चंगू या मंगू कुछ नहीं कर सकता लेकिन दोनों मिल जाएं तो एक और एक मिलकर दो की बजाय ग्यारह हो जाते हैं।

हमारे देश की सबसे बड़ी समस्याओं की जड़ को तलाशा जाए तो इस तरह के चंगू-मंगू ही जिम्मेदार हैं।  देश में चंगुओं-मंगुओं की गणना कर ली जाए तो एक सौ से अधिक बटालियनें इन्हीं की बन सकती हैं।

चंगू और मंगू की जोड़ी जिन्दगी भर परस्पर सीखती और सँवरती रहती है। हर इलाके में ऎसी कई सारी जोड़ियां होती हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये अपने माँ-बाप, भाई-बहनों और पत्नी के भी नहीं होते जितने आपस में गठजोड़ और मोहब्बत रखते हैं।

कई बार तो इन जोड़ियों को देखकर लोगों को दूसरी तरह की नापाक और अप्राकृतिक शंकाएं-आशंकाएं होती हैं। इसी प्रकार स्ति्रयों की भी अपनी जोड़ियां होती हैं। इन्हें ओली बाई -पोली बाई जैसे नामों से भी जाना जाता है। इनका भी चोली-दामन का साथ कई सारी शंकाएं पैदा करने के लिए काफी है।

ऎसी विचित्र जोड़ियां चाहे पुरुषों की हों या फिर स्ति्रयों की, इनके आकार-प्रकार, स्वभाव और व्यवहार से लेकर सभी प्रकार के संबंधों पर शक की सूईयां निरन्तर घूमती रहती हैं।  कुछ लोगों के बारे में तो यहाँ तक कहा भी जाता है कि इनमें से दूसरा यदि विपरीत लिंगी होता तो इन्हीं की अमर जोड़ी बन जाती।

ऎसे तरह-तरह की समानता वाले लोगों की संख्या आजकल बढ़ती जा रही है। हर इंसान अपने आप को अधूरा महसूस करता हुआ अपनी किस्म के दूसरे किसी को ढूँढ़ ही लेता है और अपने सारे सगे-संबंधियों को भुलाकर मरते दम तक अपनी दैहिक, मानसिक और भौतिक ऎषणाओं की पूर्ति में पागल हुआ रहता है।

कुछेक चंगू-मंगू ही ऎसे होंगे जो कि समाज में अच्छा और रचनात्मक काम करते दिखते हैं अन्यथा ऎसी अधिकांश जोड़ियां बिगाड़ा करने और करवाने के लिए ही प्रसिद्ध हैं।

1 thought on “चंगू-मंगू जिन्दाबाद, राहु-केतु अमर रहें

  1. वर्तमान के कटु सत्य को उजागर करती बेबाक सटीक रचना 🙏👍

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