सरसता के लिए परिवर्तन जरूरी

जहाँ जड़ता है वहाँ निरसता है। और जहाँ परिवर्तन है वहाँ सरसता भी है  तथा समरसता और सुकून भी। इंसान की पूरी जिन्दगी में शैशव, यौवन और वृद्धावस्था की तीन अहम परिवर्तनकारी स्थितियों में बहुत सारे अच्छे-बुरे परिवर्तन होते रहते हैं। तभी कहा गया है  चलती का नाम जिन्दगी।

जिन लोगों के जीवन में एक ही एक प्रकार के काम, परिवेश और व्यक्तियों का साक्षात होता रहता है, एक ही प्रकार की मूर्तियां हमेशा दिखती रहती हैं, एक ही तरह का कामकाज हमेशा बना रहता है उनमें हुनर का विकास होता है, काम की गुणवत्ता भी बढ़ती रहती है लेकिन आनंद का भाव गायब हो जाता है।

इस आनंद की बजाय अनकहे जड़त्व का भाव गहराता चला जाता है। कर्मयोग के विभिन्न आयामों को छूते हुए बहुआयामी प्रतिभाओं का जो लोग दिग्दर्शन कराते हैं, जिनमें कई प्रकार के हुनर भरे होते हैं वे लोग एक ही एक प्रकार के काम से बांध दिए जाएं, पुराने ही पुराने बाड़ों में परंपरागत खूंटों से बंधे रहें, तब उनमें जड़त्व आना शुरू हो जाता है।

इसीलिए सभी प्रकार के कर्मक्षेत्रों में एक निर्धारित व्यवस्था है कि कुछ-कुछ समय के अन्तराल में इंसान की प्रतिभा और कर्म विशेष के प्रति हुनर को देखते हुए उसे उसी क्षेत्र में उच्च से उच्च स्तर का काम उत्तरोत्तर दिया जाता रहता है ताकि वह कार्मिक से लेकर निर्देशक की डगर को पार करता हुआ आगे से आगे बढ़ता जाए।

इस बढ़ोतरी का फायदा यह होता है कि उसके ज्ञान, हुनर और अनुभवों का लाभ बाद वाली पंक्तियों के लोगों को मिलता रहता है और नवीन काम मिल जाने पर इन पुराने लोगों को  तरक्की के बढ़े हुए अवसरों का लाभ भी मिलता रहता है। देश के सामने यह संकट भी नहीं आता कि इनके बाद कौन, जैसा कि आजकल बहुत सारे लोगों के बारे मेंं सुना जाता है।

उनके बाद कौन? यह प्रश्न रत्नगर्भा वसुन्धरा भारतमाता का सरेआम अपमान है।  सभी स्वनामधन्य और स्वयंभू लोगों को यह भ्रम त्याग देना चाहिए कि उनके बाद कौन। ऎसा है भी यह इन अनुभवी और ज्ञानी लोगों की कमी, कमजोरी और स्वार्थ है जिनकी वजह से दूसरे लोगों को पनपने, हुनर निखारने और आगे बढ़ने के अवसर नहीं मिल सके।

चाहे कोई सा पांच साला या साठ साला बाड़ा या गलियारा हो, अनुभवियों को उनके शारीरिक श्रम में कटौती और मानसिक कर्म में बढ़ोतरी से मानसिक शांति मिलती है और यह अहसास हमेशा बना रहता है उन्हें अपने ज्ञान, अनुभवों और हुनर के अनुरूप अपेक्षित सम्मान प्राप्त हो रहा है।

इससे ये पुराने लोग और अधिक आनंद के साथ काम करते हैं और उनके निर्देशन में आने वाली पीढ़ियां कर्मयोग में आती रहकर अपना अच्छा प्रदर्शन कर पाती हैं और इन युवा तुर्कों की भरपूर ऊर्जा का लाभ संस्थानों, समाज और देश को भी प्राप्त होता है।

इस दृष्टि से इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि कार्मिक, निर्देशक और प्रबन्धन, शरीर, मन-मस्तिष्क और आयु इन सभी पर विचार करते हुए लोगों को जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए।

एक ही एक प्रकार का काम एक आदमी के पास होने से उस व्यक्ति को भी कूपमण्डक होकर जीने में आनंद नहीं आता, वहीं उसके ज्ञान और अनुभवों का विस्तार नहीं हो पाता।  दूसरे विषय विशेषज्ञ ज्ञानियों और अनुभवियों से वही का वही पुराना काम लिए जाते रहने की परंपरा बन जाने से  इन्हें काम का आनंद नहीं आता और वे कुढ़ने लग जाते हैं। कर्मयोग के अधिकांश कार्यों का संबंध आयु से होता है, इस बात को भी सर्वोपरि रखकर सोचने की जरूरत है।

इसीलिए समय-समय पर पदोन्नतियों की परंपरा कायम है। यह इंसान और संस्थान दोनों की सेहत, स्वाभिमान और प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ विषय है।  जहां कहीं कार्य प्रवृत्ति में समय-समय पर बदलाव का दौर विद्यमान रहता है वहाँ हमेशा तरक्की बनी रहती है और संस्थान की दीवारों से लेकर हरेक तक के दिल की दीवारों तक खुशहाली के शब्दचित्रों की रोशनी पसरी रहती है।

लेकिन जहाँ एक ही प्रकार के लोगों से बरसों बरस एक ही प्रकार का काम लिए जाने की गलत परिपाटी बन जाती है वहाँ दिलों से लेकर  सभी प्रकार की दीवारों में दरारें दिखने लगती हैं। और एक बार शीशे या दीवार में दरार आ गई तो फिर इसका जुड़ना मुश्किल होता है।

आजकल बहुत सी जगहों पर यही सब देखने को मिल रहा है। इस महानतम रहस्य से परिपूर्ण मनोविज्ञान को समझने की आज जरूरत है। जीवन और परिवेश को सरस और माधुर्य भरा बनाए रखना चाहें, आनंद भाव से जीवनयापन करने और कराने की इच्छा हो तो कुछ-कुछ वर्ष में खुद के कामकाज की प्रवृत्ति में बदलाव लाएं और दूसरों को भी परिवर्तन लाकर सरसता से जीवन जीने का संदेश दें। किसी भी समाज और राष्ट्र की एकता, अखण्डता और परिपूर्णता के लिए यह मनोविज्ञान अनिवार्य है।

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