अपने आप को बदलें

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। हर परिवर्तन अवश्यम्भावी है और इसके लिए हरेक जीव को हर पल तैयार रहना ही चाहिए। हर समय एक जैसा नहीं होता, उसमें निरन्तर बदलाव का दौर चलता ही रहता है। यह बदलाव ही है जो हमें जीवन्तता देता है वरना जड़ और चेतन में अन्तर ही क्या रह जाएगा। जो जड़ता को स्वीकार कर लेता है वह जीवन भर जड़ बना रहता है। जो जीवन्तता को अपना लेता है वह हर क्षण प्रगतिकारी  ऊँचाइयों  का वरण करता हुआ जीवन को सफल और धन्य बना लेता है।

परिवर्तन का हर किसी पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। कुछ के लिए परिवर्तन सुखद होते हैं और कुछ के लिए दुःखद। कुछ लोग परिवर्तन से प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन बहुत सारे लोग परिवर्तन से परेशान हो जाते हैं।

मूल बात यही है कि जो परिवर्तन हमारे मनचाहे होते हैं वे हमें पसंद आते हैं और जो परिवर्तन अनचाहे होते हैं उन्हें हम नापसंद करते हैं। यह हमारे मन की अवस्था है कि उसे कौनसे परिवर्तन अच्छे लगते हैं और कौनसे खराब।

हालांकि इंसान हो या कोई भी जीवात्मा, जो भी परिवर्तन उसके जीवन में आते हैं उनसे वह सामन्जस्य स्थापित कर सकता है, अपने आपको उनके अनुकूल ढाल सकता है। ऎसे ही परिवर्तन सामने आते हैं। ऎसा कोई परिवर्तन हमारे सामने नहीं आता है कि जो कि इंसान की क्षमता से बाहर का हो। इस दृष्टि से हर प्रकार का परिवर्तन हमें चुनौती के रूप में लेना चाहिए।

हर प्रकार के परिवर्तन का अपना प्रभाव होता है और इसका असर भी भिन्न-भिन्न लोगों पर अलग-अलग तरीकों से होता है। कुछ लोग परिवर्तनों को स्वीकार कर उनके अनुरूप ढल जाते हैं और अपने हाल में मस्त रहते हुए जीवन निर्वाह करते रहते हैं।

बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जो अपने आपको एक सीमित परिधि में ढाल कर अपना आभामण्डल निर्मित कर दिया करते हैं और चाहते हैं कि दूसरे लोग भी उनके आभामण्डल की तरह अपने आपको ढाल लें। लेकिन ऎसा हो नहीं पाता। हर जीवात्मा की सोच, स्वभाव और व्यवहार पृथक-पृथक होता है। फिर पूर्व जन्म के अच्छे-बुरे संस्कार और पूर्व जन्मों में भोगी हुई योनियों के प्रभाव भी बने रहते हैं। इसीलिए कहा गया है कि दुनिया का हर इंसान अपने आप में भगवान की अन्यतम कृति है। इसीलिए ‘मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना’ का माहौल देखने में आता है।

संसार नित्य परिवर्तनीय है और परिवर्तन का यह दौर हर दिन किसी न किसी रूप में अपने आपको परिमार्जित करता हुआ आगे बढ़ता रहता है, अपने स्वरूप और कार्यशैली में बदलाव लाता रहता है। हमेशा तरोताजा रहने और हर परिवर्तन के प्रति तैयार रहने वाले लोग मौज-मस्ती के साथ आनंद पाते रहते हैं।

सामाजिक प्राणियों की एक असामाजिक प्रजाति ऎसी भी है जिसे कोई परिवर्तन पसंद नहीं आता। यह प्रजाति मलीन सोच-विचार और हीन कर्मों में इतनी लिप्त रहती है कि किसी और को स्वीकार कर ही नहीं पाती।

इस प्रजाति के लोग अपने आपको सर्वस्व, संप्रभु और सर्वज्ञ होने का इतना बड़ा भ्रम हमेशा पाले रहते हैं कि अपने अहंकारी व्यक्तित्व के झण्डे के नीचे सभी को नत मस्तक खड़ा हुआ देखना चाहते हैं और यही कारण है कि ये कहीं भी किसी भी प्रकार का समन्वय स्थापित नहीं कर पाते हैं।

ऎसे लोगों की स्थिति जिन्दगी भर उस द्वीप की तरह होती है जिसे चारों तरफ से खारे पानी का समुद्र घेरे हुए रहता है और द्वीप पर विषैले और हिंसक जानवरों तथा जहरीले पेड़-पौधों के सिवा और कुछ नहीं होता।

इस प्रजाति के लोग हर युग में दुःखी, संतप्त और आत्महीन बने रहते हैं। न और लोग इनसे सामंजस्य या किसी भी प्रकार का न्यूनाधिक समन्वय स्थापित करने की कल्पना कर पाते हैं, न ही ये दंभी स्वभाव वाले औरों के पास जाने की उदारता रख पाते हैं।

अपने अहंकारों भरे आभामण्डल की चादर में लिपटे हुए आत्म मुग्धता के चरमोत्कर्ष का अनुभव करने वाले ये लोग न बदलाव ला सकते हैं, न इन्हें कोई बदल सकता है। एक बार जब कोई किसी कृत्रिम खोल या दायरे में अपने आपको सहर्ष बाँध लेता है, फिर उसे खोल के बाहर की दुनिया दिखाना बड़ा ही मुश्किल होता है।

ऎसे बहुत सारे द्वीप लोक में विद्यमान हैं जिनकी वजह से लोग परेशान हैं और इनकी वजह से पूरा का पूरा समुदाय। इस प्रजाति के लोग पूरी दुनिया को अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं लेकिन ऎसा होना संभव नहीं हो पाता। इस कारण ये हमेशा खिन्नता और मायूसी में जीने के आदी रहते हैं अथवा पूरी दुनिया को अपने हिसाब से ढालने और अपनी बातें मनवाने के लिए नीचता के स्तर पर जाकर भी प्रयासों में कहीं कोई कमी नहीं छोड़ते।

इन लोगों को हमेशा लगता है कि हर बार होने वाला परिवर्तन उनके लिए लाभकारी या सुकून देने वाला साबित होगा लेकिन थोड़े दिन गुजर जाने के बाद वही स्थिति – ढाक के पात तीन के तीन। इसका कारण यही है कि इनमें किसी भी परिवर्तन को उदारतापूर्वक स्वीकार करने और अच्छाइयों को आत्मसात करने का माद्दा नहीं होता।

इन लोगों को दुनिया के सारे घृणित पाप और दुष्कर्म भी अच्छे लगते हैं क्योंकि इनसे इन्हें लाभान्वित होने के अवसर प्राप्त होते रहते हैं। कच्ची और गन्दी बस्तियों में रहने वाले बगुले, कुत्ते और सूअरों को अच्छी बस्तियों में रहना और खाना कभी पसंद नहीं आता है। इन्हें अपने मैले मल और मलीन तन तथा खुराफाती दिमाग को परिपुष्ट करने वाला परिवेश ही भाता है।

इसलिए ये बार-बार परिवर्तन के पहले वाली स्थिति में आ जाते हैं और अपनी अहंकारी सत्ता को बनाए या स्थापित रखने के फेर में हर बार परिवर्तन की आकांक्षा में जायज-नाजायज ताने-बाने बुनते रहते हैं, नापाक समीकरणों और समझौतों का सहारा लेते रहते हैं।

 इससे परिवर्तन हो भी जाता है मगर इनके लिए हर परिवर्तन कुछ दिन बाद बेमानी ही साबित होता है क्योंकि ऎसे लोग जीवन में कभी भी खुश नहीं रह सकते। यही इनके जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप होता है। इनके साथ यह भी विडम्बना जुड़ी हुई है कि ऎसे लोग दुनिया में किसी को खुश नहीं रख सकते, चाहे कोई कितना ही उदारवादी, सज्जन और भद्र हो।

यहाँ तक कि इनके घरवाले और परिचित भी इनके कुकर्मों, हरकतों और करतूतों को पहचानते हैं और इस कारण इन्हें सम्मान से वंचित रहना पड़ता है। इस वंचित सम्मान की पूर्ति वे बाहर से करना चाहते हैं और इसी कारण इन्हें मुखौटे और अभिनय स्वीकारने के धंधों में रमना पड़ता है। और एक बार जब इन्सान को अपनी प्रतिभा या हुनर से कहीं अधिक सम्मान व प्रतिष्ठा पाने की आतुरता जग जाती है, उसके बाद जोश जग जाता है किन्तु होश ,खो बैठते हैं।

चाहे परिवर्तन कैसा भी हो, इन लोगों के लिए इसका कोई अर्थ नहीं होता क्योंकि किसी भी प्रकार का परिवर्तन इन्हें बर्दाश्त नहीं होता। दूसरी तरफ ये इतने दंभी होते हैं कि खुद में किसी भी प्रकार बदलाव लाने को कभी राजी नहीं होते। इनके स्वयं द्वारा अपने लिए बनाया गया अदृश्य खोल इन्हें बाहर निकलने नहीं देता और ये हमेशा उस खोल के भीतर रहकर ही जमाने भर को अपने अनुरूप ढालने और चलाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं।

इस वजह से जमाना और संगी साथी तो निरन्तर बहुत आगे बढ़ चलते हैं और ये लोग जहाँ होते हैं वहीं ठहरे होते हैं। अहंकार के लंगर इनकी हर हरकत को बांधे रखते हैं। और अहंकार भी ऎसा कि इसके आगे और सब कुछ गौण ही बना रहता है।  दुनिया में जहाँ-जहाँ इस मानसिकता के लोग मौजूद रहते हैं वहाँ हर तरफ मायूसी और शोक के सिवा और कुछ भी नहीं होता। 

अच्छा यही होगा कि हम अपने मिथ्या भ्रमों और अहंकारों को खत्म कर हर प्रकार के परिवर्तन के प्रति सजग रहें और जो-जो परिवर्तन हमारी तरक्की, हुनर विकास और प्रतिभा विस्तार के लिए लाभकारी हैं उन्हें अपनाने में कंजूसी न रखें।

उदारतापूर्वक जो हितकारी परिवर्तनों को स्वीकारता है वही आगे बढ़ सकता है, दुनिया पर राज करने का सामथ्र्य पा सकता है। किसी और को या जमाने को दोष न दें, अपनी गलतियों को देखें, अपने अहंकारों के खोल से बाहर निकल कर देखें, अपने आपको किसी अच्छे आईने में देखें, और फिर तय करें कि खराब कौन है, जमाना या हम। पूरी गंभीरता और ईमानदारी के साथ समय-समय पर यह भी सोचते रहें कि आखिर लोग हमें ही खराब क्यों मानते और कहते हैं। कुछ तो कारण होगा ही इसका।

दूसरों को दोष  देने या खराब कहने से पहले यह सोचें कि जिन लोगों को हम खराब बताते हैं उनकी छवि जमाने में कैसी है, हमारे सिवा और कौन है जो उन्हें खराब कहता है। दूसरी तरफ हममें से बहुत से लोग ऎसे हैं जिन्हें कोई अच्छा नहीं कहता, सभी हमारी छवि, स्वभाव और व्यवहार को खराब बताने से कोई परहेज नहीं रखते।

अपने आपको देखें, सुधारने के प्रयास करें और हर परिवर्तन से कुछ सीखें तथा अपने आप में बदलाव लाएँ। अन्यथा हम जिन्दगी भर बदलाव करते रहकर भी कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे। और अन्त में लोग यह कहने को मजबूर हो ही जाएंगे कि ये हैं ही ऎसे खराब कि किसी को न पसंद आते हैं, न कोई इन्हें पसंद करता है।

हर बदलाव से सीखें और अपने गिरेबान में पूरी ईमानदारी के साथ कम से कम एक बार तबीयत से झाँक लें, अपने आप सच सामने आ ही जाएगा। फिर भी न सुधर पाएं तो दोष भगवान को देने में कोई आपत्ति नहीं जिसने मनुष्य का शरीर भूल से ही दे दिया लगता है।

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