अवसाद को बदलें आनन्द में

सुख-दुःख, प्रसन्नता और अवसाद तथा इस जैसी ही सम-विषम स्थितियां हर आदमी की जिन्दगी में सदैव बनी रहती हैं।  बचपन से लेकर पचपन पार हों या शतायु तक की यात्रा की हो, हर किसी के जीवन में यह क्रम हमेशा बना ही रहता है।

किसी भी जीवात्मा के पूरे जीवन में सुख ही सुख अथवा दुःख ही दुःख हमेशा बना ही रहे, यह कभी संभव नहीं है। कभी सुखों का घनत्व अधिक बार और निरन्तर बना रह सकता है तथा कभी दुःखों की निरन्तरता और घनत्व बढ़ा हुआ प्रतीत होता है।

दिन, महीने और साल भी बदलते चले जाते हैं और इन्हीं के अनुरूप दशक और शताब्दियां भी परिवर्तित होती रहती हैं। कोई बड़ा-छोटा, ऊँचा-नीचा, गरीब-अमीर, मामूली या प्रभावी नहीं होता बल्कि समय बलवान होता है।

समय जब ठीक होता है तब मूर्खों और नुगरों की भी खोटी चवन्नियां चल निकलती हैं, और समय खराब हो तब ज्ञानियों-अनुभवियों, हुनरमन्दों और वर्चस्वी लोगों को भी नीचे देखने को मजबूर होना पड़ता है।

समय अच्छा होने पर कुत्ते भी शेर हो जाते हैं, गधे ऎरावत हो जाते हैं और समय खराब होने पर शेर भी चूहों की तरह बिल में घुसे रहकर सब कुछ सहने को मजबूर हो जाते हैं।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किसी का समय एक सा नहीं रहता। समय जितना बड़ा बलवान है उतना ही परिवर्तनशील। अमावास्या के बाद पूर्णिमा और पूर्णिमा के बाद अमावास्या, दिन के बाद रात, और रात के बाद दिन का शाश्वत आवागमन निरन्तर चलता रहता है।

पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक में हर पल परिवर्तन का चक्र चलता ही रहता है। इस आवागमन के कालचक्र और सुख-दुःख के परिवर्तनशील नियम को जान लेने पर हम आनंद भाव को सहजतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं।

वस्तुतः सुख और दुःख दोनों ही अवस्थाओं में यह जरूरी है कि हम समत्व की साधना करें। भौतिक सुखों और भोग-विलासी क्षणों में हम बौराए नहीं, और दुःख प्राप्त होने की स्थिति में घबराए नहीं, व्यथित न हों। यह अवस्था प्राप्त हो जाने पर हमें किसी प्रकार का कोई मलाल नहीं रहता।

आम तौर पर कहा जाता है कि दुःखों को बाँटने से दुःखाें का अनुभव कम होता है। लेकिन यह स्थिति उस जमाने में थी कि जब मानवीय संवेदनाओं का प्रभाव इंसान पर था और वह मानवता की दृष्टि से परिपक्व और परिपूर्ण हुआ करता था।

आज दुःख बाँटने वाले के प्रति लोग केवल बाहरी हमदर्दी जताते रहते हैं, भीतर से यही कामना करते हैं कि दुःख का प्रसार होता रहे ताकि दूसरे लोग सुखी रह सकें। इसलिए अब दुःखों को अपने स्तर पर भोग लेने के सिवा और कोई चारा नहीं रहा है।

दूसरी ओर हम सभी की मनोवृत्ति यह हो गई है कि सुख का चाहे कोई सा प्रकार हो, किसी भी श्रेणी या घनत्व का सुख उपलब्ध हो या सायास छीना-झपटा जाए, खुद ही खुद इसका उपयोग और उपभोग कर लिया जाए, अपने सुखों को कोई किसी से शेयर करना नहीं चाहता।

हम सभी लोग संसाधनों, भौतिक संपदाओं और सुखों को अकेले ही अकेले भोगने पर आमादा रहते हैं। यहाँ तक कि अधिकांश लोेग अपने आत्मीय बंधुओं, घर-परिवार वालों और संबंधितों तक को भी सुखों की भनक लगने से दूर रखने के आदी हो गए हैं, यही नहीं तो सुखों के स्रोत से भी इन्हें दूर रखने या करने के भरसक प्रयासों में जुटे रहते हैं। सुख और लाभ अकेले ही पाने के लिए जुटे रहना खुदगर्ज इंसानों का पहला लक्षण है।

इस तरह की मनोवृत्ति पालने वाले इंसान चाहे अपार सुख भोग लें, मगर इन लोगों की जिन्दगी का अधिकांश उत्तरार्धकालीन हिस्सा कुढ़ने और संत्रासों को भोगने में ही गुजरने को विवश रहता है।

बहुसंख्य लोग किसी न किसी मामूली समस्या को लेकर विषाद, खिन्नता और दुःखों के साथ जीते हुए शोकाकुलों की तरह जीवन व्यवहार दर्शाते हैं। अपने जी को भी जलाते हैं और उस दुर्लभ देह को भी दुःखी करते हैं जो चौरासी लाख योनियों के बाद प्राप्त हुई है।

जो लोग वर्तमान में आनंद और सुख के साथ वैभव का अनुभव करते हुए अहंकारों में फूले नहीं समा रहे हैं उन सभी के लिए यह जरूरी है कि ज्यादा बौरायें-इतराएं नहीं, औरों को हीन समझ कर दुःखी न करें, शोषण और प्रताड़ना का शिकार न बनाएं और विपन्नों, आप्तजनों तथा जरूरतमन्दों के प्रति प्रेम, सद्भाव और सदाशयता के भाव रखते हुए समत्व का अभ्यास करें।

जो लोग अर्थाभाव सहित विभिन्न तरह के अभावों, समस्याओं और विषमताओं में जी रहे हैं, उन लोगों के लिए यह जरूरी है कि सुखद व सकारात्मक परिवर्तन के प्रति आशान्वित रहें और अपने आपको आत्महीन न मानें।

यह अनुभव करें कि दुःखों और पीड़ाओं के रूप में परमात्मा हमारे चित्त और शरीर की सफाई करता हुए अपने लिए पवित्र व साफ-सुथरा स्थान बना रहा है। दुःख, अवसाद और निराशा अनुभव करना मन की कमजोरी का लक्षण है। जब भी ऎसी स्थिति सामने आए, हमें चाहिए कि अपने जीवन के सारे वर्तमान दुःखों, नैराश्य भाव तथा आत्महीनता को भुलाकर भूतकाल के उन पलों को याद करें जिनमें हमें परिवेशीय सुख-सुकून का अनुभव हुआ हो, अपने प्रियजनों के साथ बिताए क्षणों का स्मरण करेें, मानसिक रूप से प्रकृति, तीर्थस्थलों, दैवधामों, नदी-नालों, जलाशयों और उत्सवी उल्लास के अवसरों का स्मरण करें।

इससे हमारे मन से अवसादों भरे विचारों को भीतर जमे रहने का अवसर नहीं मिलेगा तथा नकारात्मक भाव खुद ही परेशान होकर अन्यत्र पलायन करने लगेंगे। इनसे भी सुकून प्राप्त न हो तो अपनी जवानी के क्षणों में आत्मीयजनों, प्रेम संबंधियों अथवा दाम्पत्य रिश्तों के साथ परिभ्रमण और आनंददायी आयोजनों, दैहिक रति सुख के चरमोत्कर्ष तथा इंसानी द्वैत भाव से अद्वैत अवस्था पाने का स्मरण करें।

चित्त में इन आनंद भावों के भरने की स्थिति में अवसादी भावों का भीतर रुक पाना असंभव हो जाएगा। यह  अभ्यास यदि निरन्तर जारी रहे तो इससे अवसादों को अपने भीतर प्रवेश या घर करने का अवसर ही प्राप्त नहीं होगा।

अपने मानसिक संकल्पों और स्मृतियों के सहारे अवसादों को आनंद में बदल डालने के इस विज्ञान को सीखने, समझने और अपनाने भर से हमारा जीवन आनंद का सागर उमड़ाने लग सकता है। जीवन जीने की यह सहज, सरल और सर्वसुलभ कला है।

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