बजा दो पाञ्चजन्य

अब हो ही जाए आर-पार बर्दाश्तगी की सारी सीमाएँ अब टूट चूकी, सहिष्णुता के सारे बाँध ध्वस्त हो चुके, सहनशीलता के समन्दरों पानी अपने-पराये, बाहरी-भीतरी…

ये मरे हुए लोग …

जो मरे हुए लोग हैं वे ही न औरों को जीने देते हैं, न खुद ही जी पाते हैं। आजकल अधिकांश लोगों की आत्मा कहीं…

अपनी बात-सच्ची बात

कैसे-कैसे सरकारी कारिन्दे, खाओ और देर तक सोते रहो  … पक्षियों के लिए चुग्गा डालना बचपन से मेरी आदत में शुमार रहा है। जहाँ-जहाँ भी…

अपने-अपने पिता

आजकल पिता होने का अर्थ उसी महान इंसान से नहीं रह गया है जिसकी वजह से हम संसार में आए हैं। भीड़ में खूब सारे…

छातीकूटिए अमर रहें

आज अगर छाती कूटने वालों की गणना शुरू हो जाए तो सभी जगह बहुत से लोग मिल जाएंगे जो बिना किसी कारण के छाती पीटते…