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जी उठी हैं कठपुतलियाँ, उछालें मार रहे कठपुतले

किसी जमाने में जब श्रव्य-दृश्य के आज की तरह संसाधन नहीं थे तब कठपुतलियां ही मनोरंजन और संदेश से लेकर सम सामयिक हालातों का दिग्दर्शन कराती थी। कठपुतलियां और कठपुतले उन दिनों मनोरंजन के महा पात्र हुआ करते थे और भीड़ भी खूब जुटती थी।  काठ की इन पुतलियाें को आज के टीवी, सिनेमा, मोबाइल और दूसरे सारे साईबर एवं ... Read More »

उपेक्षा करें कमीनों की

  असुरों की सबसे बड़ी विजय है दैव वंश का प्रभावित और प्रतिक्रियावादी हो जाना। लोग हमें भटकाने – भड़काने की कोशिश करते रहते हैं और यही चाहते हैं कि हम अपने श्रेष्ठ कर्म को छोड़कर भटक जाएं। जो कुछ कर रहा है उसे करने दो। उस तरफ ध्यान देने का अर्थ है कि हम उसे गंभीरता से ले रहे ... Read More »

ठिकाने लगाएँ भिखारियों को

दान-पुण्य और धर्म के सहारे स्वर्ग और मोक्ष को तलाशने वाले हम लोगों के लिए भिखारियों का होना जरूरी है अन्यथा हम न तो स्वर्ग प्राप्त कर सकते हैं और न ही मोक्ष। भला हो इन किसम-किसम के भिखारियों का, जिनकी वजह से हमारे पुरखों ने मोक्ष पा लिया अथवा स्वर्ग का मैदान मार लिया। और हम भी कितने अधिक ... Read More »

लघु कथा – वरदान

रात के चौथे पहर में गहरी नींद में सो रहे माईक वाले को भगवान ने जगाया। कहा – वत्स मांगों वरदान ! मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत खुश हूँ। माईक वाला – प्रभु मैंने कुछ नहीं किया, मैं वर पाने लायक कहाँ ? शिवजी – नहीं वत्स ! तू ने दोहरी-तिहरी भक्ति का पुण्य कमा लिया है। तेज आवाज वाला ... Read More »

कचूमर निकालें कमीन कैंकड़ों का

कोई कितना ही ऊँचा चढ़ना और बढ़ना चाहे, हर तरफ फिसलन के तमाम ताम-झाम भी हैं और इनके साथ ही कैंकड़ों का भी बाहुल्य है, जो किसी को ऊँचे चढ़ना और बढ़ना देख नहीं पाते। जब भी कोई अपने कद को ऊँचा करने और ऊध्र्वगामी यात्रा करने की कोशिश करता है, एक-दो-तीन ही नहीं ढेरों कैंकड़े उधर खींचे चले आते ... Read More »

किसे बनाएं आदर्श, किसका करें अनुकरण

आज का सबसे बड़ा यक्षप्रश्न है – किसे बनाएँ अपना आदर्श। यह अपने आप में छोटा सा किन्तु सृष्टि के हर इंसान से संबंधित है। हर तरफ अभिभावकों, प्रेरकों, गुरुओं, बाबाओं, कथाकारों, सत्संगियों, उपदेशकों, नेतृत्वकर्ताओं और मार्गद्रष्टाओं की भारी बाढ़ आयी हुई है। और सभी एक ही बात को बार-बार दोहराते हुए कहते हैं आदर्शों पर चलें। कोई भी इंसान ... Read More »

बांसवाड़ा की बात – अम्बा बा होने का मतलब आतिथ्य सत्कार की प्रतिमूर्ति

बांसवाड़ा की रत्नगर्भा वसुन्धरा में असंख्य ऎसी हस्तियां पैदा हुई हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इनका माधुर्यपूर्ण और औदार्य से लक-दक जीवन-व्यवहार और आत्मीयता ऎसी कि कहीं और देखने तक न मिले। इन्हीं में एक थीं अम्बा बा।  कुलीन औदीच्य परिवार की अम्बा बा का मकान सिंगवाव से औदीच्यवाड़ा स्कूल के रास्ते है जिसमें प्रवेश का ... Read More »

मुखिया हैं या दुःखदायी

मुखिया उसे ही कहा जा सकता है जो कि पूरे कुटुम्ब के लिए वफादार, जिम्मेदार और हर गतिविधि के लिए उत्तरदायी हो। उसके लिए परिवार का मंगल और सभी सदस्यों की सर्वतोमुखी अभिवृद्धि का निष्काम भाव सर्वोपरि हो। हर सदस्य के प्रति निश्छल स्नेह बरसाने वाला मुखिया ही सभी छोटाें-बड़ों की श्रद्धा व आदर-सम्मान का पात्र होता है। मुखिया के ... Read More »

खुश हैं मदारी, मदमस्त हैं जमूरे

जीवन में न कोई अनुकूलताएं होती हैं, न प्रतिकूलताएं, न कुछ अच्छा, न बुरा। जो एक के लिए अच्छा हो वह दूसरे के लिए बुरा मान लिया जाता है, इसी प्रकार जो एक के लिए प्रतिकूल होता है वह दूसरे के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल मान लिया जाता है। असल में मनुष्य का पूरा जीवन परिवर्तनों की भेंट चढ़ा ... Read More »

इतराए और बदहवास हैं वल्लरियाँ और कुकुरमुत्ते

कहा जाता है समय बड़ा बलवान होता है। यह वक्त ही है जो गधों को प्रतिष्ठित कर गुलाबजामुन, रसगुल्ले और मावाबाटियाँ खाने के लायक बना  देता है, कौओं के लिए मोती चुगने के तमाम मालखाने खोल देता है। बेचारे हाथी तृण-तृण को तलाशते हुए घूमने को विवश हो जाते हैं और मानसरोवर के हँसों को पलायन करना पड़ता है। जिनकी ... Read More »