Chintan

एकला चालो

अच्छाइयों और बुराइयों के वजूद में कहीं कोई समानता नहीं है। दोनों के गुणधर्म में पूरा का पूरा विरोधाभास देखने में आता है। जिस तरह धर्म और अधर्म, देवताओं और असुरों में जमीन-आसमान का अन्तर देखा जाता है ठीक उसी तरह बुरे और अच्छे, दुष्टों और सज्जनों में भारी अन्तर हमेशा रहता है। यही कारण है कि इन दोनों ही ... Read More »

यथार्थ पर हावी छद्म जिन्दगी

हम सब लोग वास्तविकताओं से मुँह मोड़कर या ता नकलची बंदर-भालुओं की जिन्दगी जी रहे हैं या फिर हर तरह से छद्म जिन्दगी को अपनाते हुए यथार्थ को भुला चुके हैं। हमारा छद्म, कुटिल और स्वार्थपूर्ण व्यवहार हर मामले में छलकने और झलकने लगा है। जो लोग हमारे सम्पर्क में आते हैं वे सभी लोग हमारे बारे में अच्छी तरह ... Read More »

सदा बदहवासी नंगे-भूखे नुगरे

इंसान चाहे तो सृष्टि के सभी जीवों, जड़-चेतन सभी तत्वों और परिवेश के प्रत्येक कारक से कुछ न कुछ सीख सकता है। सीखने की जो प्रक्रिया इंसान के समझदार होने के बाद से शुरू होती है वह पूरी जिन्दगी यों ही चलती रहती है। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया यदि बीच में कभी रुक जाए या किसी कारण से विराम पा ले ... Read More »

दुष्टों का दमन ही आज का युगधर्म

दुष्ट आत्माएं हर युग में पैदा होती हैं और सज्जनों को तंग करने का ही काम करती हैं। पुराने युगों में जो असुर हो चुके हैं वे ही दुष्ट आत्माएं नए-नए खोल और नामों से पैदा होती रहती हैं और दुनिया भर में  दुष्टताएं करती हुई अन्ततोगत्वा दुष्टताओं के नए-नए अनुभवों, नवाचारों और नई-नई आसुरी विधाओं का व्यवहारिक ज्ञान पाकर ... Read More »

बनाएँ अन्यतम पहचान

जब सब तरफ एक ही एक तरह की भीड़ ही भीड़ पसरी हुई हो तो ऎसे में अपने व्यक्तित्व को एक अलग ही पहचान देने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए ताकि हम भीड़ से अलग दिखें। भेड़ों की रेवड़ की तरह अंधानुकरण करने वाली पोंगापंथी भीड़ अपने आप में उस परंपरा की द्योतक है जिसमें हम केवल भीड़ का हिस्सा ... Read More »

जो अवधिपार, वो अभिशप्त

हर वस्तु और व्यक्ति से लेकर सांसारिक पदार्थ जगत की अपनी एक निश्चित आयु होती है जिसके बाद इनका कोई उपयोग नहीं रहता, ये नाकारा हो जाते हैं और या तो इनका रूपान्तरण होना जरूरी है अथवा पूर्ण संहार। हर विध्वंस नवीन सृजन की भूमिका रचता है और हर सृजन का अंत विध्वंस ही होता है। सृष्टि और संहार का ... Read More »

देशद्रोही हैं कामचोर, विघ्नसंतोषी और खुराफाती लोग

अपने यहाँ ज्ञान, अनुभव, निष्ठा, कर्मयोग, ईमानदारी, समर्पण और देशप्रेम सब कुछ है, कोई कमी नहीं है इनकी। संस्कार, सिद्धान्त और आदर्शों वाले लोग भी अभी बहुत बड़ी संख्या में विद्यमान हैं और वे परंपराएं भी अभी मरी नहीं हैं जिनमें परमार्थ और सेवा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। बावजूद इसके हम अपेक्षित तरक्की नहीं कर पा रहे हैं, अपने ... Read More »

जीमण में ही रमे न रहें, महिमागान करें पुरखों का

श्राद्ध पक्ष को जीमण का ही पर्याय न मानें बल्कि जिनका श्राद्ध खा रहे हैं उनके बारे में जानकारी पाएं, उनके व्यक्तित्व और जीवन को जानें तथा अच्छे कार्यों के अनुगमन का प्रयास करें। हम आज जिन मकानों, खेतों, धन-सम्पदा, संसाधनों और तमाम प्रकार की भोग-विलासी पदार्थ परंपरा का आनंद ले रहे हैं, हमारा जीवन बना हुआ है, यह सब ... Read More »

कपालक्रिया करें

न आने का वक्त, न रहने का, और न ही जाने का वक्त। जब मर्जी हो आ गए जैसे कि चौपाटी पर घूमने या भेल-पूड़ी खाने या तफरी का मन करने पर लोग इधर-उधर पहुंच जाते हैं। जो मुर्गा दिखा उसे पटाकर माल उड़ा लिया, खा-पी लिया और गप्पों के दौर दर दौर चलाते हुए दिन गुजार दिया। यही दिनचर्या ... Read More »

विनाश कर देता है पापियों का संग

समाज में शुचिता और  कल्याणकारी दिशा-दृष्टि के सनातन प्रवाह को निरन्तर बनाए रखना, दुष्टों का दमन, असुरों का संहार और पापियों तथा पाप एवं बुराइयों का समूल उन्मूलन करना उन सभी इंसानों का पहला फर्ज है जो अपने आपको इंसान समझते हैं। जो खुद को इंसान के रूप में कभी समझ ही नहीं पाए, जिनके लक्षणों और गुणधर्मों को देखकर ... Read More »