सच बोलें, स्पष्ट कहें

कलिकाल के दुष्प्रभाव से घिरे वर्तमान समय में जात-जात के भयंकर और विचित्र असुरों का बोलबाला है।  पिछले सारे युगों के तमाम किस्मों के असुरों…

कबाड़ी ही हैं ये जुगाड़ी

किससे करें उम्मीद ? संरक्षक हो गए हैं भक्षक सामाजिक एवं परिवेशीय समस्याओं का मूल कारण स्वधर्म से पलायन या विमुख होना है। सृष्टि का…

स्थानीय उत्पाद ही हैं उपयोगी

प्रकृति असंख्य उत्पादों की जननी है। हर क्षेत्र का अपना विशिष्ट उत्पाद होता है। पंच तत्वों के सम्मिश्रण से निर्मित पदार्थों का मौलिक प्रभाव उन्हीं…

बर्बाद कर देगी हराम की दौलत

इंसान जीवन में आनंद की प्राप्ति के लिए सारे जतन करता है। खूब सारा पैसा जमा कर लेता है, काफी संख्या और मात्रा में जमीन-जायदाद…

असंभव कुछ भी नहीं

आम तौर पर हम सभी लोग उन्हीं कामों और गतिविधियों में हाथ डालना पसंद करते हैं जिन्हें करना आसान होता है।  जिसमें कुछ मेहनत नहीं…

कौन कहे इन्हें इंसान ?

आदमी का नाम लेते ही हमारी आँखों में शालीन, सभ्य, सुसंस्कृत और धीर-गंभीर व्यक्ति की कल्पना साकार हो उठती है। आदमी होने का मतलब ही…