Chintan

न करें कल की प्रतीक्षा

समय न किसी का सगा होता है, न शत्रु। हम ही हैं जो समय को पहचान नहीं पाते और इसकी बेकद्री करते रहते हैं।  जो समय की कद्र नहीं करता, समय भी उसकी परवाह नहीं करता। यह  समय ही है जो अच्छे-अच्छे आलसियों और प्रमादियों को समय से पहले ही ठिकाने लगा देता है और हालत इतनी अधिक खराब हो ... Read More »

ये पति नहीं, पतित हैं

यों तो आजकल तकरीबन तमाम संबंधों में मिलावट और घालमेल हो गया है। और यह मिक्चरी कल्चर भी ऎसा कि पता ही नहीं चल पाता कि कौन क्या है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाए तो हम सारे ही लोग सामाजिक प्राणी हैं लेकिन हमारे ही भीतर कई सारे लोग ऎसे हैं जो असामाजिकता के पूरक और पर्याय हो चले ... Read More »

कुपुत्रों का मोह त्यागें

मोक्ष या गति-मुक्ति पाने के लिए यह जरूरी है कि जब ऊपर जाएँ तब हमारा मन किसी में अटका न हो, न संतति और न ही सम्पत्ति, संसाधनों या जमीन-जायदाद में। अक्सर हम कृपणता का आलिंगन करते हुए जिन्दगी भर भिखारियों और दरिद्रियों की तरह बने रहते हैं और जो समय मिलता है उसमें जमा ही जमा करते चले जाते ... Read More »

नशाखोर नहीं होते भरोसे लायक

यों तो आजकल आदमी पर भरोसा खत्म होता जा रहा है। किसी पागल, आधे पागल या जानवर पर एक हद तक भरोसा किया भी जा सकता है लेकिन आदमी अब भरोसेलायक रहा ही नहीं। कुल जमा विस्फोटक भीड़ में बहुत से आज भी ऎसे हैं जिन पर आँख मूँद कर भरोसा किया जा सकता है लेकिन इनकी संख्या नगण्य है। ... Read More »

जहाँ पैसा,  वहाँ पाखण्ड

काम-धंधों, नौकरियों, कारोबार आदि में व्यापारिक मानसिकता और लाभ-हानि का गणित होता है क्योंकि इनका उद्देश्य धन कमाना ही है जबकि सेवा, धर्म और दैवीय प्रकल्पों और गतिविधियों से जुड़े हुए क्षेत्रों में पैसा उगाहने, मांगने और संग्रह करने की प्रवृत्ति विशुद्ध रूप से अधर्म ही है और जहाँ इन क्षेत्रों में पैसों और पूंजीपतियों को महत्व दिया जाता है ... Read More »

राष्ट्रघाती हैं व्यक्तिपूजा करने वाले

जब तक समाज और राष्ट्र का सार्वभौमिक कल्याण सभी के केन्द्र में होता है तब तक समाज तरक्की करता रहता है और राष्ट्र सुरक्षित।  वैयक्तिक जीवन, लोकजीवन और परिवेश में जो भी कर्म हों, वह यदि समाज के बहुविध कल्याण के लिए हों, इनमेंं देशभक्ति का पुट हो, धर्म, सत्य,न्याय और लोक मंगलकारी दृष्टि हो, सत्यासत्य का विवेक समाहित हो, ... Read More »

बेमौत मरते हैं ये लोग …

जड़-चेतन पिण्ड से लेकर समूचा ब्रह्माण्ड पंच तत्वों की माया से ही रचित है और इन्हीं का संयोग-वियोग और मिश्रण पदार्थ भाव, गुणों और अस्तित्व को आकार देता है। फिर चाहे वह प्रकृति हो या पुरुष। सृष्टि सृजन के मूल मेंं पंचतत्वों की ही माया है। पृथ्वी, जल, आकाश, वायु और अग्नि को निकाल दिया जाए तो सृष्टि की कल्पना ... Read More »

झकझोर डालें सूक्ष्म जगत को

आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि कोई कुछ बोलना या करना नहीं चाहता। सारे के सारे मूक-दर्शक होकर चुप्पी साधे हुए देखने-सुनने के आदी हो गए हैं या फिर तमाशबीन। जो तमाशबीन हैं वे तमाशा पैदा करने के लिए दिन-रात कुछ न कुछ षड़यंत्र, खुराफात और धमाल रचने के ताने-बाने बुनते रहते हैं और दूर रहकर तमाशा देखने ... Read More »

कुत्ते भी शरमाते हैं इन्हें देखकर

अभिव्यक्ति और संवाद हर प्राणी चाहता है क्योंकि यह उसका जन्मजात नैसर्गिक गुण है। संवाद और अभिव्यक्ति के प्रकार और माध्यम कई तरह के हो सकते हैं किन्तु बिना अभिव्यक्ति के कोई रह नहीं पाता। इसी तरह जिनसे हमारा किसी न किसी रूप में संबंध जुड़ा होता है उनसे सीधा संवाद कायम करना और पारस्परिक ज्ञान एवं अनुभवों का आदान-प्रदान ... Read More »

क्षमा नहीं, संहार करें

क्षमा करने का समय अब नहीं रहा। क्षमा का उपयोग उसी जमाने के लिए ही उपयुक्त था जब लोग नीति-धर्म और सत्य पर चला करते थे और सच्चे और अच्छे लोग बहुतायत में हुआ करते थे। उन दिनों दण्ड का प्रावधान आज की अपेक्षा सौ गुना अधिक था इसलिए दुष्टों और पापियों पर प्रभावी अंकुश था। फिर भी दयावान और ... Read More »