बेकार है ये सारी धन-दौलत

दीपावली चली गई, और इसके साथ जुड़े दूसरे त्योहार भी जाने लगे हैं। खूब जतन किए हमने, लक्ष्मी मैया को अपने घर-द्वार के बाड़ों से…

हमसे बड़ा आवारा कौन ?

वो समय चला गया जब आदमी अपनी निर्धारित जगह पर बैठ कर अपने रोजमर्रा के दायित्वों को अच्छी तरह पूरा कर लिया करता था और…

झूठे होते हैं कसम खाने के आदी

इंसान को वाणी की शुद्धि और सच्चाई पर सर्वाधिक गंभीर रहना चाहिए। जो इंसान सत्यभाषी, कर्मठ और न्यायप्रिय होता है वही विश्वास करने योग्य है।…

सुख-सुविधाएँ सब चाहिएं, कर्म और समर्पण के नाम पर जीरो

हाल के वर्षों में इंसान के भीतर से कर्तव्यपरायणता, परिश्रम और नैष्ठिक कर्मयोग का जितना अधिक क्षरण हुआ है उतना पिछली सदियों में भी नहीं…

जियो और जीने दो

समाज और देश की सारी समस्याओं का मूल कारण इंसान का इंसानियत छोड़ कर खुदगर्ज हो जाना ही है। वही समाज और राष्ट्र प्रगतिशील हो…