नरभक्षी हो गए हैं ये, संरक्षक हों चाहे वरिष्ठ

संरक्षक और वरिष्ठ ऎसे शब्द हैं जो कि घर-परिवार से लेकर समाज-जीवन के हर क्षेत्र में भारी भरकम व्यक्तित्व को प्रकट करते हैं और इनका प्रतिबिम्ब हर जगह प्रतिभासित और प्रतिध्वनित होता है।

पुराने जमाने में ज्ञान और अनुभवों की श्रृंखलाओं भरे उत्तरोत्तर उच्च पायदानों से ऊपर उठे हुए लोगों को संरक्षक तथा वरिष्ठ जन की श्रेणी में शुमार कर लिया जाता था और यह मान लिया जाता था कि ये लोग समाज और अपने संस्थाओं से लेकर क्षेत्र और देश के लिए उपयोगी साबित होंगे, इनके आश्रय-प्रश्रय और मागर्दर्शन से आने वाली पीढ़ियों को कुछ सीखने-समझने और करने के अवसर प्राप्त होंगे और इनका फायदा अन्ततोगत्वा समुदाय, क्षेत्र और देश को ही प्राप्त होगा।

उस जमाने के संरक्षकों और वरिष्ठजनों में वाकई यह माद्दा था कि वे अपने से कनिष्ठों, सहचरों और नवोदितों के लिए सम्बल बनकर दिखाते और समुदाय में अपनी पैठ कायम करते। अब समय बदल गया है। लगता है कि जैसे धरती बीज खा गई है उन पुरातन परंपराओं और संस्कारों के। या कि स्वार्थ और दुष्टताओं भरी वृत्तियों ने सेवा, परोपकार और प्रोत्साहन के बीजों को किसी पाताल कूए में फेंक कर दफना ही दिया हो।

समुदाय, क्षेत्र और परिवेश से सब कुछ अपने हक में कर लेने और हर तरफ अपने ही अपने आप को देखने-दिखाने के फेर में अब संरक्षक और वरिष्ठजन अपनी अहमियत को भूल भुलाकर सामान्य से भी निम्न स्तर पर आ चुके लगते हैं।

कई संरक्षक और वरिष्ठ होने या माने जाने लायक लोगों को देखा जाए तो साफ-साफ यह सुना जाता है कि ये लोग आम जन से भी गए-बीते हैं और किसी काम के नहीं। न किसी के काम आते हैं, न किसी को संरक्षण प्रदान करते हैं और न किसी के लिए किसी भी प्रकार से मददगार साबित होते हैं।

इससे भी बढ़कर हालात ये हो गए हैं कि लोग बेवक्त सठियाने लगे हैं। इसका एक कारण यह भी है कि पुराने जमाने में खान-पान, व्यवहार, मन-वचन-कर्म और आचरण सभी कुछ में पुरुषार्थ और शुचिता के भाव थे और इस कारण से इंसान की आयु शतायु के पार तक चली जाती थी।

अब कुछ भी अपना नहीं रहा। सब कुछ पराया हो गया है। खान-पान और व्यवहार से लेकर इंसान का हर कर्म दूसरों के भरोसे होकर रह गया है और इसका सीधा असर इंसान की कुल आयु पर पड़ा है। इस कारण से अब सठियाने के लिए साठ साल की अनिवार्यता नहीं रही है। अब इंसान पचास के पार जाते ही सठियाने लगता है और ऎसी हरकतें करने लगता है जैसे कि दुनिया का सारा ज्ञान और अनुभव प्राप्त कर लिया हो तथा अब उसे कुछ भी जानने-समझने या सोचने की आवश्यकता नहीं है।

इसी महा अहंकार के चलते बहुत बड़े-बड़े लोग अपने पद और कद के मद में भरकर अहंकारी होते जा रहे हैं। दंभ और अहंकार की इस नॉन स्टाप रेस में भिड़े हुए इन लोगों को यही लगता है कि अब वे सम्राट की श्रेणी में आ गए हैं और इसलिए दुनिया के सारे लोग उनके नौकर-चाकर, सेवक या दास की तरह पेश आने चाहिएं और उन सभी के जीवन का एकमात्र ध्येय इनकी हर तरह की सेवा का ही होना चाहिए।

इस अवस्था में आदमी इतना पगलाने लग जाता है कि अपने मातहतों, साथ वालों और आस-पास वालों पर भी हुकूमत करने लगता है। आस-पास और साथ वालों के साथ उसका बदला-बदला बर्ताव देखकर यही लगता है कि या तो किसी बुरी आत्मा ने उसके शरीर में प्रवेश कर लिया है अथवा अचानक भीतरी वर्णसंकरत्व का प्राकट्य हो गया है। अपने ही बीच से उठे हुए खूब सारे लोग ऎसे हो गए हैं जैसे कि किसी और लोक से आए एलियन्स हों।

उसे हमेशा यही भ्रम रहता है कि वह अमर फल खाकर आया है और सदियों तक इसी तरह धौंस, धमाल और धींगामस्ती करते रहना है। इस विषम हालात तक आते-आते अधिकांश वरिष्ठ अपने आपको इतना अधिक गरिष्ठ बना लेते हैं कि उन्हें पचा पाना संगी-साथियों से लेकर घर वालों और साथ काम करने वालों तक के लिए मुश्किल और असहज हो उठता है। 

इस मुकाम पर आने के बाद संरक्षकों की स्थिति भी संरक्षण के भाव छोड़ कर संभक्षक जैसी हो जाती है। कुछ फीसदी ही लोग ऎसे बिरले होते हैं जिन्हें न पद का गुमान होता है, न पैसों या प्रभाव का। इन्हें अहंकार छू तक नहीं पाता। लेकिन इनके अलावा के लोगों की हालत बड़ी ही विचित्र हो जाती है।

समझदार लोगों को लगता है कि इन आदमियों ने प्रकृति और परिवेश से भले ही कुछ न सीखा हो मगर जानवरों की खाद्य श्रृंखला को ये अच्छी तरह अपना लिए होते हैं। पारिवारिक माहौल और आत्मीयता दे पाने की परंपरागत आदत से कोसों दूर रहने वाले ये नाम मात्र के संरक्षण हर किसी को दबोचने, कुछ न कुछ निगल जाने, पा जाने और खा जाने की मनोवृत्ति से इतने अधिक भरे होते हैं कि जो भी इनसे संबंधित और सम्पर्कित होते हैं वे यही धारणा बना लेते हैं कि ये नर भक्षी हो चुके हैं और अच्छा यह होगा कि जहाँ तक हो सके, इनसे दूरी बनाए रखी जाए, इनसे बच कर रहा जाए।

यही वजह है कि आजकल हर तरफ इंसान-इंसान में खाई बढ़ती जा रही है। कोई दूसरे को पसन्द नहीं करता। सारे के सारे अपने-अपने अहंकारों और दुष्टताओं से जाने-पहचाने जा रहे हैं। अधिकांश के बारे में यही धारणा बन गई है कि ये लोग गलती से इंसान का खोल पा चुके हैं अन्यथा इनमें इंसानियत का एक भी लक्षण नहीं दिखता।

जिन बाड़ों, परिसरों और गलियारों में नए-नए लोग आते-जाते रहते हैं उन्हें सभी संबंधितों के गुणावगुणों और प्रतिभाओं तथा उनकी ऎतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में सही-सही बताने की जिम्मेदारी उन वरिष्ठों पर होती है जो बरसों से कुण्डली मारकर जमे होते हैं। लेकिन इन वरिष्ठों की भूमिका इस मामले में नकारात्मक ही देखी गई है। ये अपने-अपने आकाओं की निगाह पाने तथा अपने नम्बर बढ़ाने के फेर में इस कदर डूबे रहते हैं कि बाकी सारों के बारे में गलत फीडबेक देते रहते हैं।

असत्य, स्वार्थ और गुमराह कर देने वाली यही प्रवृत्ति आजकल सारे बाड़ों की अवनति और अवमूल्यन का मूल कारण है। सब तरफ धर्म, नीति और सत्य से परे जाकर अपने उल्लू सीधे करने के षड़यंत्र इस कदर हावी हो रहे हैं कि अच्छे, सच्चे और कर्मशील लोग लगातार हाशिये पर धकेले जा रहे हैं और तात्कालिक लाभ एवं स्वार्थपूर्ति के लिए भ्रमित करने वालों की भरमार होती जा रही है। 

कच्चे कानों वाले भी खूब पैदा हो रहे हैं और इसी अनुपात में कान भरने वाले भी। चौतरफा विषम हालातों के बीच अपनी शुचिता और सत्याश्रय को बनाए रखने वाले लोग वाकई धन्य हैं। सच तो यह भी है कि इन्हीं अच्छे लोगों के कारण से सब कुछ ठीक-ठाक है वरना कभी का कबाड़ा हो गया होता।

अपने आपकी क्षमताओं को जानें तथा यह भेम हमेशा-हमेशा के लिए दिल और दिमाग से निकाल दीजियें कि ये संरक्षक और अपने से वरिष्ठ लोग हमारे किसी काम आ भी सकते हैं। लेकिन इनके बारे में यह तथ्य अच्छी तरह समझ लें कि स्वार्थ न सधे,  कुछ प्राप्ति या लाभ न हो तो ये संरक्षक और वरिष्ठ आपके बारे में नकारात्मक छवि का निर्माण कर सकते हैं, कुछ भी नुकसान कर सकते हैं और दूसरों को भरमाते हुए अपनी छवि को साफ-सुथरी दर्शाने के लिए किसी को भी निपटा सकते हैं।

इसलिए श्रद्धा, विश्वास और आस्था के भाव त्यागियें और खुद के बूते आगे बढ़ते रहियें। इस विश्वास के साथ कि इन तथाकथित संरक्षकों और वरिष्ठों के लिए ऊपर जाने का नम्बर निश्चित रूप से हमसे पहले आएगा, या फिर इनका उत्तरार्ध बिगड़ेगा ही बिगड़ेगा।

इस स्थिति में अपने लक्ष्य के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है। जो कुछ करना है वह खुद को ही करना पड़ेगा, नाकारा और खुदगर्ज संरक्षकों और वरिष्ठों के भरोसे कभी न रहें। वे बेचारे अपने अस्तित्व और प्रभाव को बनाए रखने की दौड़ में ही भेड़ों की रेवड़ परंपरा का अनुसरण कर रहे हैं, उनके पास औरों के बारे में सोचने और कुछ करने की फुरसत ही कहाँ हैं। सारी की सारी अधजल गगरियाँ यों ही तो छलकती रही हैं और छलकती रहेंगी।

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