साधना में लाएं तीव्रता

यथासंभव यह प्रयास करें कि जो साधना-उपासना हम करते हैं, वह गुप्त ही हो।

देवी साधना से पूर्व अपनी वंश परंपरा से बाप-दादाओं द्वारा चली आ रही साधना का क्रम पूरा कर लें, यह अपने आप में वो अर्थिंग पॉवर है जो हमें अर्वाचीन ऋषियों और अपने कुल के पूर्वजों द्वारा संचित शक्ति संचार तत्व से जोड़ती है। अपनी मूल साधना पद्धति को त्याग कर की गई कोई भी साधना कभी सिद्ध नहीं होती। जैसे हाई वोल्टेज पर बल्ब फ्यूज हो जाने का खतरा हमेशा बना रहता है।

कोई भी एक साधना ऎसी रखें जो किसी को न बताएं, उसकी दीक्षा भी किसी को न दें। यह आपातकाल में हमारे रक्षा कवच के रूप में काम आती है।

बाहरी खान-पान का पूरी तरह त्याग किए बगैर साधना में सफलता पाने की कामना दिवास्वप्न ही है क्योंकि बाहरी खान-पान से प्राप्त अन्नदोष और दूसरे पापों के होते हुए हम साधना करेंगे तो हमारी नब्बे फीसदी साधना का बल इन पापों और पराये ऋण को उतारने में ही चला जाता है। इस स्थिति में हमारी साधना नब्बे फीसदी हिस्सा बेकार हो जाता है।

इसलिए अच्छा यह होगा कि बाहरी खान-पान को बिल्कुल बन्द कर दें और साधनाकाल में इसे वर्जित ही रखें। निराहार रहकर साधना करने का विशेष महत्व है क्योंकि मंत्रों से प्राप्त ऊर्जा रेखाओं और वलयों का संचरण बिना किसी  बाधा के शरीर के चक्रों के साथ ही नख से लेकर शिख तक ऊर्जा प्रवाह करता रहता है। इससे शुचिता में वृद्धि होने के साथ ही निर्मलता और ओज की प्राप्ति होती है।

यह हमेशा हमारे ध्यान में रहना चाहिए कि साधना की सफलता और सिद्धि के लिए चित्त की शुद्धि और सर्वांग शुचिता जरूरी है। हर साधना पहले विशुद्ध भावभूमि का निर्माण करती है। उसके बाद ही दैवीय शक्तियां और दिव्यत्व प्राप्ति के रास्ते आसान होते हैं।

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