यह पोस्ट केवल ब्राह्मणों के लिए है – इसलिए हो रहे ब्राह्मण दरिद्री और भिखारी

यह पोस्ट केवल ब्राह्मणों के लिए है – इसलिए हो रहे ब्राह्मण दरिद्री और भिखारी

ब्राह्मणों को लोग भोजन कराते हैं इसके पीछे कई सारे कारण हैं।

इनमें एक कारण यह भी है कि ब्राह्मण भोजन से पुण्य की प्राप्ति होती है।

जो ब्राह्मण नित्यप्रति संध्या और गायत्री करते हैं वे तो यजमानों का भोजन अपनी तपस्या के बल पर पचा लिया करते हैं लेकिन जो लोग संध्या-गायत्री नहीं जानते या नहीं करते, वे इसे पचाने की स्थिति में नहीं होते क्योंकि उनके पास इतना ब्रह्म बल है ही नहीं।

ऎसे में ब्राह्मण पर दूसरों का ऋण चढ़ता रहता है। यह ऋण चुकता नहीं होने तक ब्राह्मण जीवन में तरक्की नहीं कर सकता।

ब्राह्मणों की अनभिज्ञता और शास्त्रों का अध्ययन नहीं करने के कारण उन्हें यह तक पता नहीं रहता कि जो ब्राह्मण पूर्णिमा को पराया अन्न ग्रहण करता है उसके पन्द्रह दिनों का तथा अमावास्या को पराये अन्न का भोजन करता है, उसके माह भर को जो भी पुण्य संचित होता है, वह उसे जिमाने वाले लोगों के पास चला जाता है।

इस परम सत्य से अनभिज्ञ होने के कारण मूर्ख ब्राह्मण अपनी बची-खुची पुण्य संपदा को स्वाद के फेर में लुटा देते हैं।

यह स्थिति श्रावण मास की अमावास्या के दिन भी देखी जाती है जब चतुर यजमान अधिक से अधिक ब्राह्मणों को जिमाकर उनका पुण्य ले लिया करते हैं।

वागड़ अंचल में श्रावण मास की पूर्णाहुति अमावास्या को ही कर दी जाती है और इस दिन सभी स्थानों पर ब्राह्मणों और दूसरे सभी लोगों को भोजन कराया जाता है, दक्षिणा दी जाती है और हम ब्राह्मण लोग खुश हो उठते हैं।

हमें पता ही नहीं है कि हमारा कितना जप-तप का बल और पुण्य इन पराये भोजनों की भेंट चढ़ता रहा है। ब्राह्मणों के दरिद्री और भिखारी होने का यह भी एक बहुत बड़ा रहस्य है। भोजन और दान-दक्षिणा

के फेर में कब तक लुटाते रहेंगे हम लोग अपनी दिव्य और दैवीय ऊर्जा।

2 comments

  1. हे भगवान ! बचा लिया, अब बाकी बारहमन भाईयों को बचाने की आवश्यकता है_

  2. हे भगवान ! बचा लिया, अब बाकी बारहमन भाईयों को बचाने की आवश्यकता है। आपको नमन्।