कड़वा सच

गौहत्यारों को प्रश्रय देने वाले हैं ये सब,

इनकी हिम्मत ही नहीं है सच और कड़वा कहने की  …

भारतभूमि पर सच्चे संत-महात्माओं, बाबाओं, ध्यानयोगियों की कोई कमी नहीं है लेकिन धन-वैभव, भोग-विलासिता, भक्तों की भारी भीड़ जुटाने और प्रतिष्ठा पाने के चक्कर में फंसे हुए ‘‘वैराग्यवान’’ लोगों ने धर्म क्षेत्र का कबाड़ा करके रख दिया है।

इन संतों, कथावाचकों और बाबाओं को गौरक्षा, गौपालन और गौसेवा से कोई सरोकार नहीं है।  इनको अपना धंधा चलाना है इसलिए विवश हैं। कृपया इन्हें दोष न दें क्योंकि यह इनकी मजबूरी है। खरी-खरी और कड़वी बात कह डालें तो भक्तों की भारी भरकम फौज के कम होने के साथ ही पब्लिसिटी और पैसा देने वालों की जमात कम हो जाएगी। कौन चाहेगा धर्म के नाम पर इकट्ठा हो गई इस भारी भरकम भीड़ को कम करना।

हालात ये हैं कि कुछ अपवादों और ईश्वर को पाने में लीन सच्चे संत-महात्माओं और बाबाओं को छोड़कर अधिकांश बाबाओं के लिए राजनेता, वीवीआईपी और वैभवशाली लोग ही ईश्वर हो गए हैं। इसमें बुरा भी क्या है। जो हमें आसानी से पालता है वही हमारा पालनहार है।

देश के दुर्भाग्य से अब बाबा लोग राजनेताओं धनाढ्यों और अपराधियों तक को अपने आश्रमों, मन्दिरों और मठों में आमंत्रित करने में गर्व और गौरव का अनुभव करते हैं। और इन भक्तों में से बहुत सारे ऎसे हैं जो गौहत्या विरोध, नशाखोरी और अपराधों आदि के उन्मूलन के बारे में एक शब्द नहीं बोलते बल्कि परोक्ष-अपरोक्ष रूप से लिप्त बताए जाते हैं। भारतमाता के हम सब बाशिन्दों को गर्व होना चाहिए कि हमारे देश के इन बाबाओं के लिए ये ही लोग ईश्वर बन गए हैं जो बाबाओं को तमाम प्रकार के भोग-विलास, पैसों और प्रतिष्ठा दिलाने में सहयोगी  बन सकें चाहे वे कितने ही अनीतिवान और धर्महीन क्यों न हों।

आज किसी भी संत-महात्मा, कथावाचक और पण्डित या धर्माधिकारी में इतनी हिम्मत है ही नहीं कि सच बोल सकें, कड़वा घूंट पिला सकें। कारण यही है कि ये लोग इनकी झूठन और काले धन पर ही पल रहे हैं। जैसा अन्न-वैसा मन, जैसा पानी-वैसी वाणी।

बेचारे ये लोग भी क्या करें जब इस देश में धर्म के नाम मूर्खता की सारी हदें पार करने वाले लोगों में कहां कोई कमी है। संसार को छोड़ कर ईश्वर की तलाश में निकले और जगत कल्याण के प्रणेता माने जाने वाले ये लोग भटक गए हैं या कलियुग के युग धर्म को अंगीकार कर लिया है। इन्हें दोष न दें, ये बेचारे जो कुछ कर रहे हैं वह इनकी विवशता है।

इन पर दया करें, करुणामूलक दृष्टि का अहसास करें। ये भ्रम से वैराग्य धारण कर चुके हैं। क्यों न  पैसों और संसाधनों के पीछे भाग रहे इन निर्धनतम बाबाओं के लिए बीपीएल बाबा नाम से नई श्रेणी बनाकर यह व्यवस्था की जाए कि इन्हें सब्सिडी के रूप में पर्याप्त धर्मादा हर माह मिलना चाहिए ताकि इन गरीबों की भूख और प्यास शांत हो सके।

क्यों न इनकी कथाओं का आयोजन सीमाओं पर किया जाए ताकि इनके प्रवचनों, कथाओं और चमत्कारों से प्रभावित होकर शांति स्थापना हो सके।  क्यों न इनकी कथाओं -सत्संग और प्रवचनों का आयोजन नक्सल प्रभावित और आतंकवादग्रस्त इलाकों में किया जाए। इस देश के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं ये महान संत-बाबा और कथावाचक पर कोई इन्हें कहे तो सही।

देश सदियों तक गुलाम रहा तो इन्हीं लोगों के कारण जिन्होंने धर्म के नाम पर लोगों को पंगु बना दिया और लोग राष्ट्रधर्म भूलते चले गए।  ( वीवीआईपी को ईश्वर मान चुके सभी संत-महात्माओं, बाबाओं, ढोंगियों से क्षमायाचना सहित जो कि हर वीवीआईपी, राजनेता, दौलतमन्द पूंजीपतियों और प्रभावशालियों में ईश्वर के दर्शन करने लगे हैं। )