इतराए और बदहवास हैं वल्लरियाँ और कुकुरमुत्ते

कहा जाता है समय बड़ा बलवान होता है।

यह वक्त ही है जो गधों को प्रतिष्ठित कर गुलाबजामुन, रसगुल्ले और मावाबाटियाँ खाने के लायक बना  देता है, कौओं के लिए मोती चुगने के तमाम मालखाने खोल देता है।

बेचारे हाथी तृण-तृण को तलाशते हुए घूमने को विवश हो जाते हैं और मानसरोवर के हँसों को पलायन करना पड़ता है।

जिनकी कहीं कोई पूछ नहीं होती उनके इतनी लम्बी पूँछ लग जाती है कि जैसे सुन्दरकाण्ड को अंजाम देने वाला हो गए हों।

लोमड़ियाँ सियारसिंगियों के दम पर खुद को अभेद्य सुरक्षा कवच में पाती हैं और जंगल भर में शोर मचाती हुई खुद के सर्वश्रेष्ठ होने का ऎलान करने लगती हैं।  कुलाँचे भरते हिरणों को मरते दम तक भी यह पता नहीं लग पाता कि उनकी नाभि में कस्तूरी भरी हुई है और उसी की गंध के मारे सारे के सारे शिकारी लोग अपने-अपने तीरकमानों के साथ जंगल में जंगलराज मचाये हुए हैं।

पता नहीं समय को क्या हो गया है। लोग लोग नहीं रहे, आदमी होने के सिवा बहुत कुछ हो गए हैं और होते जा रहे हैं। न जाने क्या-क्या होने लगा है आदमी और होगा अभी।

जिसका कोई आधार नहीं है वह दूसरों के आधार तय करने लगा है, जिन्हें अपने भाग्य का कोई पता-ठिकाना नहीं, वे औरों का भाग्य बाँच रहे हैं।

भगवान ने जिन्हें कभी अपनाया नहीं वे खुद भगवान और भागवान मानते हुए दुनिया का भाग्य बनाने-बिगाड़ने की कोशिशों में लगे हुए हैं।

सबसे बड़ी समस्या और जमाने का दुर्भाग्य यही है कि जो कुछ नहीं होने चाहिएं, वे बहुत कुछ होने का दम भर रहे हैं।

तकरीबन सभी जगह कलिकाल का भयंकर और घातक असर देखा जा रहा है। जिन लताओं को जमीन नहीं मिल पा रही, खुद के दम-खम पर खड़े होने का साहस नहीं है वे वल्लरियाँ होकर कभी ठूँठों की छाती पर चढ़ कर आसमानी होने का ख्वाब देख रही हैं, किसी विशाल वृक्ष का सहयोग पाकर लिपटते हुए ऊपर चढ़ रही हैं और कई प्रकार की दुस्साहसी वल्लरियां बिजली के खम्भों पर चढ़ती हुई खुद खम्भों की तरह दिखने लगी हैं।

सबको पड़ी है अपने-अपने नम्बर बढ़ाने की, अपने कद को ऊँचा दिखाने की। दूसरों को नीचा दिखाने और खुद का ऊपर उठाने की बुरी लत इस कदर हावी है कि इसने दुनिया के सारे नशों को पीछे छोड़ दिया है।

यही स्थिति जगह-जगह उग आने वाले कुकुरमुत्तों की हो गई है। ढेर सारे रंग-बिरंगे कुकुरमुत्ते किसी काम के नहीं होते मगर धरती की छाती पर इस तरह छा जाते हैं कि जैसे धरती पर इनके अधिकार की पताका फहरा रही हो।

फिर बरसाती मशरूमों की भी अपनी अलग ही कहानी है। इन्हीं में होते हैं कई सारे जहरीले  जंगली फंगल।

इसी तरह की खूब सारी प्रजातियां इस धरा पर इधर-उधर पसरी हुई रहती हैं जिनका अपना कोई आधार नहीं होता। ऑक्टोपसिया अभिनय में माहिर लोग किसी एक सिद्धान्त से बंधे नहीं रहे। दूसरों के सहारे इठलाते और बल खाते हुए पराये मद का पान करते हुए अपने कद को बढ़ाने का इनका शगल ही ऎसा होता है जिसमें खुद का कुछ नहीं होता।

जो कुछ होता है परायों का, और परायों के सहारे का। लगता है कि जैसे लोग अमरबेल हुए जा रहे हैं। अमरत्व पाने की चाह में जहर उगलने लगे हैं।

सब चाहते हैं सातवें आसमान की ओर निरन्तर चढ़ाई करते हुए दूसरो को बौना और खुद को ऊँचे से ऊँचा देखना-दिखाना। यही तमन्ना अब महामारी की तरह पसरती जा रही है। कोई कोना शायद ही ऎसा बचा हो जो कुकुरमुत्तों, वल्लरियों और अमरबेलों की सत्ता से दूर हो, वरना आजकल धरती का मौलिक रूप-रंग और अस्तित्व कहाँ सुरक्षित और संरक्षित बचा हुआ है।

अपनी ही अपनी प्रजातियों की संख्या में निरन्तर होती जा रही अभिवृद्धि से प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है। इस वजह से सब तरफ उच्चाकांक्षाओं को पाने की बेशर्म छीना-झपटी का दौर है जिसने बदहवास कर रखा है सभी को।

अमरबेलों और वल्लरियों में भूत सवार है छा जाने का, कुकुरमुत्तों के लिए अब बरसाती मौसम जरूरी नहीं रहा। सब तरफ खुद ही खुद को पनपाने और आगे बढ़ाने में निर्ममता से रौंदे जा रहे हैं सिद्धान्त, आदर्श और सामाजिकताओं को पुष्ट करने वाले नैतिक मूल्य।

पता नहीं इन सबकी बदहवासी और बदचलनी इंसान को कहाँ ले जाएगी। सभी इसी चिन्ता में दुःखी हैं और आशंकाओं के ताने-बाने बुनने लगे हैं।

ईश्वर करे कोई महा चक्रवात या भयंकर भूकम्प ही आ जाए और उखाड़ ले जाए उन सभी को, जिनकी खातिर मानवता को परिपुष्ट करने वाली परंपराएं बेमौत मरने लगी हैं, सज्जनों पर आँच दर आँच आने लगी है और झुलस रहे हैं मूल्य, जिन पर टिका हुआ है सह अस्तित्व, सामूहिक विकास और सामुदायिक माधुर्य।