बेफिक्र रहें एकतरफा शत्रुता से

भगवान की बनायी दुनिया और उसकी माया खूब निराली है। जो लोग दुनिया में आए हैं उन्हें दुनियादारी करनी ही है और फिर उस जगह लौटना भी है जहां से आए हैं। इस पूरी यात्रा में असंख्य पड़ावों, घुमावदार रास्तों और श्रृंग-गर्त भरे क्षेत्रों से होते हुए आदमी जाने कितने सफर तय करता हुआ अपने मुकाम को पाने  के लिए बेताब रहता है।

इस पूरी यात्रा में कई जगह उसे हिंसक और पैशाचिक लोग दिख जाते हैं और कई बार अच्छे लोगों से उसका सामना होता है। कई बार आदमी को अनचाहे ही बहुत कुछ प्राप्त हो जाता है और बहुत सी  बार लाख चाहने पर भी कुछ प्राप्त नहीं हो पाता। इस सारी उधेड़बुन में रमता हुआ आदमी कभी उन रास्तों की खाक छानता है जहां से उसके पूर्वज आए और गए थे, कभी उन गलियों में भटक जाता है जिनमें काम, क्रोध, लोभ और मोह के मूत्र्तमान स्वरूप डेरा जमाए बैठे होते हैं।

इन सारी स्थितियों में कुछ लोग प्रारब्ध को स्वीकार कर आगे बढ़ते रहते हैं जबकि कई सारे लोेग खुद ही वे सारे जतन करने लग जाते हैं जिनके लिए हमारी परंपरा में साफ-साफ वर्जनाएं कही गई हैं। इन हालातों के बीच भिन्न-भिन्न स्वभाव वाले व्यक्तियों का बहुत बड़ा समुदाय अपने आस-पास मण्डराता रहता है, आवागमन करता है अथवा हमें अपना बनाने की कोशिशों में दिन-रात जुटा रहता है। कभी-कभार ऎसे ही काम हम लोग करने लग जाते हैं।

दुनिया की भीड़ में हमें वे सब लोग अच्छे लगने लगते  हैं जिनसे हमें काम या लाभ की उम्मीद होती है और वे सभी लोग बुरे लगते हैं जो हमारे कामों में अड़चन डालते हैं या अडंगे लगाते हैं। अपने जीवन की पूरी यात्रा में हम मानवी समुदाय को दो भागों में ध्रुवीकृत कर डालते हैं। एक वे हैं जिन्हें हम अपना मानते हैं, दूसरे वे हैं जिन्हें हम अपने शत्रु मानते हैं। असल में देखा जाए तो दुनिया में कोई किसी का शत्रु नहीं होता। शत्रुता का भाव पूर्वजन्म के प्रतिशोध से जुड़ा हुआ होता है जो इस जन्म मेंं चुकारे का प्रयास करता है। बहुत सारे लोग हमें ऎसे देखने को मिल जाते हैं जिनका बेवजह विरोध होता रहता है।

घर वालों से लेकर बाहर वालों तक में अकारण विरोध होता रहता है। इसका मूल कारण अपनी कोई गलती नहीं होना है बल्कि पूर्वजन्म की शत्रुता ही होती है। ऎसे में जो लोग अनचाहे शत्रुता के भाव रखते हैं या दुश्मनी निकालते हैं उन्हें अपने कर्म करने दीजिए, एक समय ऎसा आ ही जाएगा जब उनके भीतर की सारी शत्रुता बाहर निकल कर समाप्त हो जाएगी और इसके बाद उनके पास कुछ बचेगा ही नहीं जिससे कि वे शत्रुता के भाव रख सकेंं।

इन लोगों को एकतरफा शत्रुता निकालने का पूरा समय दिया जाना चाहिए ताकि वे खाली हो सकें।  उनके भीतर पूर्व जन्म से संचित यह शत्रुता पूरी तरह बाहर निकल जाने के बाद उनका हृदय परिवर्तन अपने आप हो जाएगा और वे भी अपने शत्रु नहीं रह सकते, अमित्र भले ही रह सकते हैं। शत्रुता के मामले में दूसरा पक्ष जब प्रतिशोध की स्थिति में आ जाता है तब शत्रुता की नई श्रृंखला का निर्माण हो जाता है और दोनों ही पक्ष कर्मबंधन में फंस जाते हैं। फिर शत्रुता का यह सिलसिला कई जन्मों तक चलता ही रहता है। हम क्यों चाहें कि ऎसे नालायक, मूर्ख और दुर्भाग्यशाली आत्माओं से फिर कभी पाला पड़े।

इसलिए जीवन में सच्चा आंनद पाने की कामना हो तो किसी के प्रति शत्रुता न रखें, जो लोग हमसे शत्रुता रखते हैं उन्हें अपनी शत्रुता निकालने का भरपूर समय दें और कोई प्रतिक्रिया न करें, इससे कुछ समय बाद वे अपने आप फुस्स हो जाएंगे और वो दिन अपनी विजय पताका फहराने के महोत्सव से कम नहीं होगा। नए कर्म बंधन के चक्कर में न पड़ें और निष्काम भाव से अपने जीवन के सारे कर्मों को करते रहें।