कृतज्ञ बनें, कृतघ्न नहीं

हम सभी लोग जीवन के हर मोड़ पर किसी न किसी काम से सम्पर्क में आते हैं। लेकिन यह सम्पर्क हमेशा बना रहे, उसके लिए तब तक प्रयास नहीं करते, जब तक कि लाभ-हानि या मुनाफे का कोई समीकरण हमारे सामने न हों

यह संसार धर्म, अर्थ, कर्म और मोक्ष का सागर है जहाँ हर जीव को इनके लिए दिन-रात कर्मरत रहना पड़ता है। अधिकांश लोग औसत होते हैं जो आम इंसान के लिए निर्धारित कर्मों को करते हैं और इसी को जिन्दगी मानकर समय पूरा कर लौट जाते हैं।

बहुतों की यह धारणा होती है जो मिल रहा है वही पर्याप्त है और इसी में संतोष है इसलिए  कुछ करने की जरूरत नहीं है लेकिन अधिकांश लोग जिजीविषा के साथ जीते हैं, जीवन में कुछ करने के लिए पैदा होते हैं और ये लोग हमेशा प्रयासरत रहते हैं कि उनका जीवन समाज और देश के काम आए।

इस दृष्टि से ये लोग अकेले भी काम करते हैं, समूहो में भी, और अधिकांश मर्तबा संगठन बनाकर अच्छे और रचनात्मक कामों में रमे रहते हैं।  इस दृष्टि से सामाजिक प्राणी की मान्यता रखने वाला हर इंसान दूसरे जीवों और सृष्टि के लिए मददगार के रूप में जीवन जीता है।

संवेदनशील, सेवाभावी और परोपकारी लोग दूसरों के प्रति संवेदनशील रहते हैं और हमेशा इस बात के प्रयास करते हैं अपनी वजह से औरों का भला हो, जगत का कल्याण हो तथा ऎसे काम हों कि जिनसे ईश्वर की प्रसन्नता भी पायी जा सके और पुण्य का संचय भी होता रहे।

भांति-भांति के अजब-गजब मुण्ड-तुण्डी लोगों के बीच काम करते हुए और कर्मयोग के विभिन्न क्षेत्रों में देखा यह जाता है कि हम अक्सर कृतज्ञता ज्ञापित करने में कंजूसी बरतते हैं।

हालांकि कई बार हम सायास कृतघ्नता नहीं करते, कृतज्ञता व्यक्त करना भी चाहते हैं लेकिन या तो फुरसती अवसर की प्रतीक्षा करते हैं अथवा समय चूक जाते हैं।

कुछ लोगों के मन में दूसरों के प्रति कोई कृतज्ञता भाव नहीं होता मगर वे इतने शातिर, चतुर और अभिनयवादी होते हैं कि धन्यवाद ज्ञापन का कोई सा अवसर चूकते नहीं हैं और इस तरह वे सभी के प्रिय बने रहते हैं। 

अभिनय भले न करें, न ही करना चाहिए। इससे हम भले ही खुश हो लें कि सामने वाले का दिल जीत लिया, पर आजकल सब लोग अपने हाव-भाव और वाणी को देख कर पता लगा लेते हैं कौन कितना श्रद्धावान है और उसकी इन मुख मुद्राओं और वाणी का उद्देश्य क्या है, कितने फीसदी आडम्बर है।

कई बार हम अच्छे, सहज, सरल और सादगी पसंद लोग आभार प्रदर्शन में कृपणता की वजह से हार जाते हैं क्योंकि जमाने में बहुत सारे लोग हैं जो लल्लो-चप्पों और तारीफ करने में सिद्ध हो गए हैं और इस कारण से दूसरे लोगों को लगता है कि ये ही उनके परम शुभचिन्तक हैं, हालांकि हकीकत में ऎसा होता नहीं।

आज की दुनिया में अच्छा होना जरूरी नहीं है बल्कि अच्छा दिखने का आडम्बर रचे रहना ज्यादा जरूरी समझा जाता है। खूब सारे लोग इसी पाखण्ड के सहारे पूरी मस्ती के साथ जीने का मजा ले रहे हैं। क्योंकि अधिकांश लोग चापलुसी पसन्द होते हैं और उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाला कितना भौन्दू, मूर्ख, लफ्फाज, धूर्त-मक्कार और भ्रष्ट है या आपराधिक छवि रखता है। इन लोगों को केवल झूठी तारीफ करने वाले ही पसंद हैं और इन्हीं को ये अपना मानते हैं। 

इन सभी पहलुओं के बीच निष्कर्ष यही है कि जो हमारे काम करता है, हमारे लिए किंचित मात्र भी काम आता है, हम पर उपकार, दया और करुणा भाव दर्शाता है अथवा हमारा आत्मीय शुभचिन्तक होता है, उसके प्रति आभार प्रदर्शन करना न भूलें।

यह परंपरागत शिष्टाचार का प्रतीक है जिससे हमेशा व्यवहार माधुर्य के भाव प्रगाढ़ ही होते हैं। हालांकि बहुत से लोग इतने भारी और धीर-गंभीर, समझदार होते हैं कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन धन्यवाद दे रहा है और कौन नहीं।

विनम्र और भारी पेटे वाले लोग इन सबसे बेपरवाह रहते हैं। लेकिन बहुत से लोग ऎसे हो गए हैं जो बात-बात में धन्यवाद पाना चाहते हैं और न मिले तो गाँठ बाँध लेते हैं, पूर्वाग्रह और दुराग्रह पाल लिया करते हैं और शंकाओं-आशंकाओं एवं भ्रमों में जीते हुए विद्वेष पाल लेते हैं।

ऎसे छिछले और नुगरे लोगों की पूरी जिन्दगी में चापलुसों की जबर्दस्त फौज होती है जो उन्हें हमेशा घेरे रहती है। इस फौज में भी आपस में प्रतिस्पर्धा बनी रहती है। जो जितनी अधिक चापलुसी कर सकता है, भरमा सकता है, मूर्ख बना सकता है, वह उतना अधिक प्रियपात्र हो जाता है।

और इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है जिनका इस प्रकार के ढोंंग और चोंचलों में कोई विश्वास नहीं होता, वे मौन साधक की तरह काम करते रहते हैं। पर आज की परिस्थितियां ऎसी हैं कि अपने लिए कुछ भी करने वाले के प्रति धन्यवाद देने में कभी कंजूसी न करें।

समय पर कृतज्ञता अर्पित करने का अपना अलग ही आनंद है। और कुछ नहीं तो धन्यवाद के एक शब्द मात्र से हम पर चढ़ा हुआ ऋण एक झटके में उतर जाता है और इससे हमें दिली सुकून की प्राप्ति भी होती है।  उन सभी धीर-गंभीर विद्वजनों के प्रति हार्दिक धन्यवाद जिन्होंने इस लेख को अन्त तक पढ़ा।

1 thought on “कृतज्ञ बनें, कृतघ्न नहीं

  1. आभार माने उनका, जो हमारे सहयेागी हैं …

    कोई हमारे लिए तनिक भी मददगार हो, उसका आभार मानना न भूलें। जो लोग समाज और देश के हितों की चिन्ता करते हैं, मातृभूमि की सेवा के लिए समर्पित हैं, उन सभी का आभार भी मानें और उनके लिए हरसंभव सहयोगी बनकर साथ निभाएं।
    आजकल इंसान इतना अधिक खुदगर्ज हो गया है कि किसी का धन्यवाद ज्ञापित करने की उदारता उसमें रही ही नहीं। वह समझता है कि और लोग उसके लिए जो कर रहे हैं, वह उनका कर्तव्य है।
    जो जितना अधिक कृतज्ञ होगा, वह उतना अधिक पुण्यशाली होगा, ईश्वर की उस पर अनुकंपा रहेगी और सांसारिक ऋणों से मुक्त रहेगा। इसकी बजाय जो इंसान कृतघ्न होते हैं वे विश्वासघाती, स्वार्थी और धूर्त होते हैं तथा उन पर पापों का बोझ हमेशा बना रहता है, जो उनके इहलोक और परलोक दोनों को बिगाड़ देता है। कृतघ्न लोग दुनिया में किसी के हो ही नहीं सकते।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *