Dr. Deepak Acharya and Acharya Yogita Vyas

खुश रहें, खुश रखें

इंसान प्रसन्नतापूर्वक जीवन निर्वाह और मनुष्य के रूप में यादगार एवं उपलब्धिमूलक जिन्दगी जीने के लिए पैदा हुआ है। एक आम इंसान के पास वह सब कुछ होता है जिससे वह आसानी से जीवन निर्वाह कर सकता है और खुशी-खुशी जीवन निर्वाह कर सकता है।

एक सामाजिक प्राणी के रूप में इंसान को उन सभी से काम पड़ता है जो लोग हमारे आस-पास और परिवेश से जुुड़ा हुआ होता है। हमारा जन्म संसार भर के जीवों को खुशी देने के लिए हुआ है।

दुनिया में सर्वाधिक सफल इंसान वही माना जाता है जो स्वयं भी हमेशा मुदित रहता है और आस-पास के जीवों तथा अपने सम्पर्क में आने वाली सभी जीवात्माओं को खुश रखता है।

Dr. Deepak Acharya
Family at Rajsamand Lake

यदि हम अपने आस-पास और साथ वालों को प्रसन्न रखने में विफल रहते हैं तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि हमारी जिन्दगी असफल है। देखा गया है कि स्वार्थी और खुदगर्ज लोग खुद न कभी खुश रह सकते हैं और न किसी और को खुश रख पाते हैं।

यही कारण है कि खूब सारे लोगों के बारे में यह सुना और अनुभव किया जाता है कि ये लोग बड़े अक्खड़, बदतमीज, बदमिजाज और बदहवास रहते हैं और उन्हें यह तक भान नहीं रहता कि वे क्या बोल रहे हैं और किस तरह का व्यवहार औरों के लिए कर रहे हैं।

इस प्रजाति के लोग अपने लिए तो हर कहीं वीआईपी तथा वीवीआईपी व्यवहार, आदर-सम्मान और सुख-सुविधाएं चाहते हैं किन्तु औरों के सुख-चैन और सुविधाओं को छीनने में इन्हें आनंद का अनुभव होता है।

जिस इंसान को औरों को दुःखी करने, अभाव देने और परेशान करने में आनंद आता है ऎसा इंसान नरपिशाच, राक्षसी और पशुता भरी वृत्तियों वाला माना जाता है तथा इनसे न घर-परिवार के लोग खुश रह सकते हैं, न कुटुम्बी या अपने से सम्पर्कित।

जो इंसान  अपने आपको खुश नहीं रख सकता, वह जमाने में किसी को खुश देखना नहीं चाहता बल्कि अपनी मायूसी, शोक और गमों को भुलाने के लिए अपने आस-पास वालों तथा सम्पर्कितों को दुःखी करता हुआ आनंद का अनुभव करता है किन्तु उसे मरते दम तक आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती इसलिए हर बार या रोजाना ही इस किस्म के दुष्टों और राक्षसों को खुराफाती व्यवहार, षड़यंत्रों भरे तिलस्मों और पैशाचिक व्यवहारों का अनुसरण करना पड़ता है।

खूब सारे लोगों से हमारा रोजाना का सम्पर्क रहता है, बहुत से लोगों से हमारा किसी न किसी काम से पाला पड़ता रहता है और ढेर सारे ऎसे लोग हमारे साथ और आस-पास रहते या काम करते हैं जिन्हें मुर्दानगी का पर्याय माना जा सकता है। इन मनहूस और गमगीन लोगों के चेहरों को देख कर ही यह प्रतीत होता है कि ये लोग कितने शोक और खुराफात से भरे हुए हैं।

पैशाचिक किस्म वाले स्त्री-पुरुष जहाँ रहते हैं या काम करते हैं वहाँ का माहौल भी शोक संतप्त, दुःखमय और दुर्भाग्यशाली बना रहता है क्योंकि दुष्टों और आसुरी मानसिकता व कुकर्मों से भरे हुए लोगों का अपना मलीन और काला आभामण्डल होता है जो उनकी परपंरागत दुष्टता और दुर्बुद्धिजनक खोटे कर्मों, पापों, मलीन व्यवहारों आदि के कारण से उत्तरोत्तर प्रसार पाता जाता है।

इस वजह से ये लोग जहाँ रहते या आवागमन करते हैं, जहाँ काम-धंधा या नौकरी करते हैं वहाँ इनका केवल स्थूल शरीर ही विचरण नहीं करता बल्कि इनके साथ मैला, सड़ान्ध भरा और दुर्भाग्य से भरा-पूरा सूक्ष्म शरीर भी साथ ही चलता रहता है और प्रदूषण फैलाता रहता है।

इसका बुरा असर उन लोगों पर भी पड़ता है जो उन परिसरों में आवागमन करते हैं या काम करते हैं। कई सारे संस्थानों और परिसरों की साख ऎसे लोगों के कारण से ही बन नहीं पाती बल्कि लोग इनके कार्यस्थलों को शंकाओं की दृष्टि से देखते हैं और सायास दूरी बनाए रखते हैं।

यह भी शाश्वत सत्य है कि जहाँ ऎसे पापी और पामर लोग होते हैं वहाँ दुष्ट और अनिष्टकारी भटकी हुई आत्माएं भी जमा हो जाया करती हैं और इन आत्माओं में उन लोगों की आत्माएं भी होती हैं जो कि मुफ्तखोर, दारूड़िये, माँसाहारी, खुराफाती और धूर्त-मक्कार होते हैं और मरने के बाद भी इनकी आत्माएं अतृप्त होती है।

इन बुरी आत्माओं को अपनी अतृप्त ­­­­­­­­वासनाओं को पूरा कर आनंद पाने के लिए किसी न किसी शरीरी इंसान की जरूर होती है। इस स्थिति में इन बुरी आत्माओं के लिए शराबी, दुव्र्यसनी, बातूनी, खाने-पीने के शौकीन और दुष्टों का शरीर आदर्श अनुभवित होता है।

इंसान के सभी ग्रह-नक्षत्र चाहे कितने अनुकूल क्यों न हों, यदि उससे कोई खुश नहीं रहता, तो इसका मतलब यही है कि वह इंसान खरा नहीं है और उसमें मिलावट है। यह मिलावट किस स्तर पर हुई, इस बारे में पक्के तौर पर कोई नहीं बता सकता अथवा बताना नहीं चाहता।

प्रथम दृष्ट्या इंसानों की परख करनी हो तो सच्चा और अच्छा इंसान वही माना जाना चाहिए जो कि खुद भी खुश रखने की कला समझे और दूसरों को भी खुश रखने के विज्ञान में माहिर हो।

जो औरों को खुश रखता है उसका आभामण्डल भी शुभ्र रहता है और उसके सम्पर्क में जो भी लोग आते हैं वे भी अपने आपको धन्य समझते हैं। हमारा होना तभी सुकूनदायी है कि जब हम अपने संपर्कितों को प्रसन्न रख सकें, अन्यथा हमें इंसान होने का कोई हक नहीं।

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