अहसान मानें आस-पास के मरियल-मुर्दाल टट्टूओं का भी

जिस हिसाब से समाज और परिवेश में नकारात्मकता और स्वार्थ हावी होते जा रहे हैं, मनुष्य के मन-मस्तिष्क और तन से लेकर आभामण्डल तक कलियुग की काली छाया का गहन अंधकार मण्डराता जा रहा है, उस अनुपात में यह कहना प्रासंगिक ही होगा कि अब कलिकाल अपने उफान पर आ चुका है जहां इंसान इंसान को काटने की फितरत पाल चुका है।

अब  आदमी आदमी को मारने-काटने और छीनने पर आमादा है, इंसानियत किसी कोने में दुबकी हुई रुदन करने लगी है और आत्मीयता भरे कौटुम्बिक भाव पलायन करते जा रहे हैं, आदर्शों, सिद्धान्तों, अनुशासन और मर्यादाओं का चीर हरण सब जगह हो रहा है। 

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो साम्राज्यवाद और पाशविकताओं का बोलबाला बढ़ चला है, जाने किस-किस नाम से जो कुछ चल रहा है, उसे सुन-देख कर भी शर्म आती है कि हम मनु की संतान हैं। 

हर कोई एक-दूसरे को भुना रहा है, भून रहा है और अपने उल्लू सीधे कर रहा है। टेढ़ी पूँछ वाले न सीधे हो पा रहे हैं, न उनकी पूँछ ही सीधी हो पा रही है, बावजूद इसके सब कुछ उन्हीं के हक में सीधा सपाट हो रहा है। टेढ़ी पूँछ और टेढ़े-मेढ़े कानों से लेकर लपलपाती जीभें हर तरफ गिद्ध दृष्टि से तकियाने और धकियाने लगी हैं।

कोई अच्छा करे या बुरा, कहीं कोई मूल्यांकन नहीं, न कर्मयोगियों की जमातें रही हैं, न कर्मयोग का मूल्यांकन करने वाले निरपेक्ष सज्जन। कहीं कोई स्वार्थ के मारे परेशान होकर भटक रहा है, कोई कुछ गटक रहा है, कोई कुछ झटक रहा है।

 हर तरह लगता है कि जैसे जलेबी दौड़ की धमाचौकड़ी मची है जहाँ कुछ पुरस्कार मिले न मिले, कुछ तो जलेबियों के स्वाद में पगलाये हुए हैं, कुछ चाशनी को ही अमृत समझ कर छक रहे हैं, और कितने ही ऎसे हैं जिन्हें कुछ मिले न मिले, जलेबियों की गंध के मारे अजीब सी खुमारी में जीने के आदी हो गए हैं।

कोई गिद्धों की तरह झपट रहा है तो कोई आवारा कुत्तों की तरह जीभ लपलपाता हुआ इधर-उधर के बाड़ों में मुँह मारता हुआ अपने आपको बाड़ों और डेरों का स्वामी मानकर इतरा रहा है। बहुत सारे हैं जो अपनी मूँछों से घिरी थूथन को लेकर जाने कहाँ-कहाँ कीचड़ और सडान्ध में जमीन तलाशते हुए भिड़े हुए हैं।

सब तरफ हौड़ और दौड़ मची है, लोग कुछ न कुछ पाने के फेर में कभी इधर और कभी उधर घूम रहे हैं। आदमी की आस सब तरफ बनी रहने लगी है। कुछ ही हैं जो संतोषी, आत्ममुग्ध और मस्त होकर जी रहे हैं वरना बहुसंख्य तो पेण्डुलम की तरह एक-दूसरे छोर को छूकर इधर-उधर घूमते  रहकर इधर से उधर करने का स्वभाव भी पाले बैठे हुए हैं।

हर बाड़े और गलियारे में ऎसे लोगों का जमघट है। खूब सारे लोग भुजंगों तक को बेदखल कर खुद कुण्डली मारकर ऎसे जमे बैठे हैं कि न हिलने का नाम ले रहे है, न कोई उन्हें हिलाने की सोच पा रहा है।

तिस पर ये यही मान बैठे हैं कि वे जहाँ बिराजमान हैं शायद उसी के ठीक नीचे दबा पड़ा है विक्रमादित्य का सिंहासन। विषमताओं से भरे इस पूरे माहौल में कहीं भी लग  नहीं रहा है कि सद्वृत्तियों और सकारात्मक चिन्तन का कहीं कोई प्रभाव दीख भी रहा है।

आदमी से लेकर समुदाय और क्षेत्र या देश का कोई सा काम हो, शुरू करने से पहले नकारात्मक भूमिकाओं भरी हवाएं चलने लगती हैं और खूब सारे लोग इन्हीं हवाओं पर झूलने और मस्त होकर ऎसे झूमने लगते हैं जैसे कि उन्हीं के हिलने-डुलने से हवाएं चल रही हों।

 जहाँ-तहाँ अड़े पड़े नाकारा-नुगरे ठूँठ भी यही भ्रम पाले बैठे हैं कि उनके हिलने मात्र से हवाओं का चलन शुरू होता है, और उनके स्थितप्रज्ञ होते ही हवाएँ भी जड़ता को ओढ़ लेती हैं। हर कोई, हर तरफ परेशान और हैरान है नकारात्मक हवाओं की दुर्गन्ध के भभकों से।

कई आदमी तो आजकल ऎसे ही हो गए हैं जैसे कि सीवरेज का कोई बड़ा सा प्राचीन टैंक या डंपिंग यार्ड ही हों। जहां कहीं इनका परिभ्रमण होता है वहां हर तरफ सडान्ध भरा साम्राज्य व्याप्त होने लगता है। लोग नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं और  ये समझते हैं कि उनके सम्मान में नाम पर रूमाल रखे हुए हैं।

इस जमाने में जहां सब तरफ नकारात्मकता का माहौल है, आदमी आदमी के पीछे पड़ा हुआ है, आदमी सब तरफ अपने आप को ही देखना चाहता है, न किसी और देखना चाहता है, न बर्दाश्त करता है।

कुछ आदमी तो ऎसे हो गए हैं कि आदमियों की बस्तियों में रहकर हिंसक जानवरों सा बर्ताव करने लगे हैं। कुछ अपनी आदमीयत को भुला कर औरों के पीछे पड़े हुए कब्र खोदने में लगे हैं, कई सारे शिकायतों से कमा-खाकर जैसे-जैसे पेट भर रहे हैं और बहुतेरे ऎसे भी हैं जो अपना कोई काम-धाम करें न करें, दूसरों की थाली से लेकर  बैडरूम, कीचन और बाथरूम्स तक की हरकतों पर नज़र गड़ाये हुए रहते हैं।

हर तरफ ऎसे अंधकार के बीच आजकल कोई हमें सहयोग करे न करे, हमारे आस-पास रहते हुए हमारी मदद करे, न करे, कम से कम खुराफात तो न करे, यही उसकी महानता है। 

हमारे आस-पास उदासीन सम्प्रदाय के चुपचाप बैठे रहने वाले लोग उन लोगों से लाख गुना अच्छे हैं जो पास रहकर हमारी हरकतों पर नज़र रखते हैं और इसी ताक में रहा करते हैं कब हमें मानसिक, शारीरिक या आर्थिक क्षति पहुंचा दें।

कोई हमारा सहयोग भले न करे, चुपचाप बैठा रहे, वह इंसान भी हमारा सबसे बड़ा हितैषी माना जाना चाहिए क्योंकि आजकल आदमी इतना खुराफाती हो गया है कि आदमी को ही नुकसान पहुंचा कर अपने आपको धन्य मानने लगा है।

उन सभी लोगों के प्रति मन से आभार व्यक्त करें जो कोई मदद नहीं कर पाते मगर चुपचाप बैठे रहते हैं। आजकल ऎसे भौन्दू और नाकारा तथा उदासीन लोगों को अच्छा माना जाने लगा है। कम से कम इनसे न तो मानव को कोई खतरा है, न मानवता को, और न ही मातृभूमि या कर्मभूमि को। बेचारे संसार में जन्म लेने का प्रारब्ध लेकर आए हैं, और एक दिन चुपचाप चले जाने वाले हैं।

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