संकल्प सिद्ध बनें

जीवन को सफल बनाने के लिए तथा हर कदम पर सफलता पाने के लिए संकल्प का दृढ़ होना तथा उस कार्य विशेष के प्रति एकाग्रता रखकर आगे बढ़ना सबसे बड़ी जरूरत है। इनमें से एक की भी कमी होगी तो दूसरा अपने आप सफल नहीं होगा।

संकल्प दृढ़ होगा और एकाग्रता नहीं होगी तो लक्ष्य के प्रति संचय होने वाली शक्तियाँ अलग-अलग कामों में लग जाएंगी और मूल लक्ष्य की प्राप्ति के लायक ताकत या बौद्धिक सामथ्र्य का संचय नहीं हो पाएगा।

इसी प्रकार सिर्फ एकाग्रता होगी और संकल्प नहीं होगा तब भी हमारे जेहन में कई-कई संकल्प होंगे और शक्तियों का विभाजन इतना अधिक होता चला जाएगा कि एक भी संकल्प पूरा नहीं हो पाएगा।

इन दोनों ही स्थितियों में हमारे पास पछताने के सिवा कोई और रास्ता बचता ही नहीं है। आज की पीढ़ी के साथ यही कुछ हो रहा है और यही कारण है कि भौतिक, बौद्धिक और शारीरिक सभी प्रकार के संसाधनों की भरपूर और सहज उपलब्धता के बावजूद हम पिछड़ते ही चले जा रहे हैं और हमारे भविष्य को लेकर चिन्ता का बहुत बड़ा माहौल खड़ा हो गया है।

बार-बार प्रयासों के उपरान्त भी हमें वह सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही है जिसकी कि हमें सदैव अपेक्षा रही है। कई लोग तो इन्हीं झंझावातों के बीच बिना कुछ उपलब्धि पाए ऊपर पहुंच जाते हैं।

दरअसल हमारे पास वे सारी अनुकूलताएं हैं जिनकी वजह से जीवन में सफलता पाने के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन तथा संबल प्राप्त होता है। इसके बावजूद हमारी प्रगति की रफ्तार धीमी है और लाख कोशिशों के बाद भी जो प्राप्त होता है उससे हम संतुष्ट नहीं हैं।

इसका मूल कारण संकल्प और एकाग्रता में से किसी एक की अथवा दोनों की ही कमी है। वरना इतनी सारी सुविधाओं और ऎशो आराम भरे जीवन की अनुकूलतम परिस्थितियों के होते हुए भी हम वांछित सफलता वरण नहीं कर पाएं, इसका कोई कारण नहीं है।

असली वजह यह है कि जहाँ संकल्प दृढ़ हुआ करते हैं वहाँ एकाग्रता का अभाव रहता है। यह सारी बातें आज की विद्यार्थी पीढ़ी के प्रति अक्षरशः खरी उतरती हैं।

सारे विद्यार्थी स्कूल-कॉलेजों में पढ़ रहे हैं, उन सभी का सपना होता है कि जीवन में कुछ करके दिखाएं और माता-पिता व क्षेत्र का नाम रौशन करें। इन सभी में से अधिकांश के पास सारी सुख-सुविधाएं होती हैं।

इन लोगों में आगे बढ़ने का संकल्प भी होता है लेकिन संकल्प के साथ जिन लोगों की एकाग्रता का मेल होता है वे आगे बढ़ जाते हैं, और जो लोग संकल्प के साथ एकाग्र नहीं हो पाते हैं वे दूसरे-तीसरे कामों में लग जाते हैं। इसी एकाग्रता भंग का परिणाम यह होता है कि ये बच्चे संकल्प को प्राप्त करने में विफल रहते हैं।

इसलिए सफलता पाने के लिए संकल्प के साथ उसी अनुपात में एकाग्रता का होना जरूरी है। ये सभी लोग स्कूल-कॉलेज और शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थानों आदि में भी जाते हैं लेकिन इनमें एकाग्रता का अध्ययन किया जाए तो बहुत कम बच्चे ऎसे होते हैं जो स्कूल-कॉलेज और घर में भी संकल्प के प्रति एकाग्र होते हैं।

बहुत सारे बच्चे एकाग्रता से किनारा कर लिए जाने की वजह से मोबाइल, दोस्तों, इंटरनेट, साईबर कैफे, व्यसनों आदि को जीवन का अंग बना लेते हैं। इस प्रकार संकल्प के प्रति उनकी एकाग्रता का इतना विभाजन दैनंदिन जीवन में हो जाता है कि उनका संकल्प पूरा होने लायक ऊर्जा ही ये लोग बटोर नहीं पाते। स्कूल-कॉलेजों में होंगे, या घर पर अथवा कहीं बाहर, हमेशा मोबाइल कान पर चिपकाए रहेंगे, जैसे कि शेयर मार्केट में उतार-चढ़ावों या देश-दुनिया की हर पल की जानकारी रखने के लिए उन्हें अधिकृत किया हुआ हो।

अधिकांश लोग इसलिए असफल होते हैं क्योंकि वे संसाधनों का ऎसे समय उपयोग करते हैं जो समय उनके लिए जीवन निर्माण का होता है। जो काम वर्षों बाद करना होता है उसे समय से काफी वर्ष पहले कर चुके होने के कारण उनका पूरा जीवन एकाग्रताहीन हो जाता है।

वय के अनुसार संकल्प तय करते हुए एकाग्रता के साथ जीवन निर्माण में जुटने वाले लोग ही जीवन यात्रा में पूर्ण सफल हो पाते हैं। बाकी सारे बीच रास्ते में कहीं न कहीं धड़ाम से गिरते चले जाते हैं और अन्ततः पस्त होकर अंतिम यात्रा की राह पकड़ लेते हैं।

आज की पीढ़ी स्वतंत्र ही नहीं बल्कि स्वच्छन्द और उच्छृंखल होती जा रही है उसका कारण संस्कारहीनता के साथ ही यह भी है कि संकल्पों और एकाग्रता के बारे में अभिभावक अपने बच्चों को कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं हैं।

आजकल अभिभावकों का पूरा ध्यान बच्चों की हर मांग को तुरत-फुरत पूरी कर देने तक सीमित रह गया है और वे चाहते हैं कि बच्चों को बनाने का काम स्कूलें और शिक्षकों के जिम्मे ही रहें।

अभिभावकों का काम सिर्फ सुविधादाता तक ही सीमित होकर रह गया है। इस संतुलन के बिगड़ जाने का ही परिणाम है कि बच्चों का भविष्य जितना सुनहरा होना चाहिए उतना नहीं होकर ऎसी स्थिति में पहुंचता जा रहा है जहाँ न रोने की स्थिति है न हँस पाने की।

बच्चों को भी यह समझने की जरूरत है कि जिन संसाधनों और सुविधाओं तथा भोग-विलासिता की उन्हें इस समय नितान्त आवश्यकता नहीं है उस तरफ न भागें और अपना पूरा ध्यान पढ़ाई-लिखाई तथा व्यक्तित्व निर्माण के लिए करें। समय का पूरा उपयोग समय पर नहीं कर पाने वाले लोग पूरी जिन्दगी पछताते रहते हैं।

इसी प्रकार जीवन में एकाग्रता के साथ संकल्प का निर्वाह होना चाहिए। व्यक्ति के जीवन में संकल्प वय, समय और परिस्थितियों के हिसाब से निरन्तर बदलते रहते हैं। ऎसे में यह जरूरी है कि संकल्पों की प्राथमिकताएं तय करें।

आज लोग अपने कामों के प्रति एकाग्र भी हैं और पूरी ताकत भी झोंक दे रहे हैं, फिर भी हाथ लग रही हैं असफलताएं हीं। इसका मूल कारण यह है कि एकाग्रता तो है लेकिन संकल्प एक नहीं अनेक हैं। ऎसे में जो ऊर्जा एकत्रित की जाती है उसका संकल्पों में विभाजन हो जाता है। थोड़ी-थोड़ी ऊर्जा हर संकल्प के खाते में चली जरूर जाती है लेकिन संकल्प के साकार होने लायक ऊर्जा नहीं मिल पाती। इस कारण विफलता सामने आती है।

इसे देखते हुए यह भी जरूरी है कि एक समय में एक ही संकल्प सामने हो और उसी की प्राप्ति के लिए भरपूर प्रयास किए जाएं ताकि उसी संकल्प के मूत्र्त होने लायक ऊर्जा का संचय हो और सफलता के सोपान तय होते रहें।

एक समय में एक ही संकल्प होगा तो शत-प्रतिशत सिद्ध होगा वरना कई सारे संकल्पों के सामने होते हुए एक भी संकल्प के पूरे होने की बात सिर्फ दिवा स्वप्न ही है।

यह बात विद्यार्थियों पर भी लागू होती है जिनके विद्यार्थीकाल का मकसद सिर्फ पढ़ना और आगे बढ़ना है, न कि वे काम करना जो उन्हें बरसों बाद करने चाहिएं। इन सारे कामों को तो वे अपनी पढ़ाई पूरी होने के बाद भी अच्छी तरह कर सकते हैं, उस समय उन्हें कोई भी पढ़ने को नहीं कहने वाला।

जीवन निर्माण के लिए संकल्प, एकाग्रता और समय का ध्यान रखना सर्वोपरि है और जो लोग इस बात का ध्यान रखते हैं वे अपने लक्ष्यों को पाने में कामयाब होकर यादगार जीवन जीते हैं जबकि इन मूल तत्वों की अवमानना करते हुए स्वच्छन्द जीवन जीने वाले लोगों के भाग्य में सफलता, यश और समृद्धि की त्रिवेणी के बहाव की कल्पना व्यर्थ है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *