कुत्ते भी शरमाने लगे हैं कमीनों को देखकर

संसार भर में जितनी असंख्य, विचित्र और अजीबोगरीब किस्में आदमियों की है उतनी और किसी प्राणी की नहीं होेंगी। यही कारण है कि हर प्रकार के पशु-पक्षियों के लिए अभ्यारण्य बने हुए हैं लेकिन आदमियों के लिए कहीं कोई अभ्यारण्य नहीं है। और यों कहें कि जहाँ आदमी संख्या में बढ़ जाते हैं वहाँ अपने आप अजायबघरों का सृजन होता चला जाता है।

आदमी अपने आप में वह रहस्यमय जीव है जिसके बारे में कोई भी कभी भी सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकता। किसी जानवर के बारे में उसके हाव-भाव को देखकर कोई भी स्वाभाविक रूप अंदाज लगा सकता है कि वह क्या करने वाला है अथवा क्या कर सकता है।

दुनिया का कोई सा प्राणी हो, पालतू हो या जंगली, हिंसक और खूंखार हो या अहिंसक, सभी के बारे में साफ-साफ पूर्वाभास किया जा सकता है कि किस समय वे कौनसी हरकत कर सकते हैं। ये सारी बातें उन प्राणियों के बारे में हैं जो सामाजिक नहीं कहे जाते।

पर आदमी के बारे में कयास लगाना कभी संभव नहीं हो पाता। जबकि वह अपने आप में सामाजिक प्राणी कहा जाता है। आदमी हृदय से लेकर दिमाग तक कभी एक नहीं रहता। जो विचार हृदयाकाश में जन्म लेता है वह दिमाग की गलियों से होकर बाहर निकलते-निकलते इतना अधिक मैला और प्रदूषित हो जाता है कि उसका मूल स्वभाव नष्ट हो जाता है।

आदमी की अंदर-बाहर के बीच भारी अंतर वाली, विशुद्धावस्था खो चुकी यही स्थिति किसी को इस बात का अहसास नहीं होने देती कि आदमी के मन में क्या है, दिमाग मेंं क्या पक रहा है और ज्ञानेन्दि्रयां तथा कर्मेन्दि्रयां किस बात का इंतजार कर रही हैं।

सोच-विचार, संकल्प से लेकर कथनी और करनी में अन्तर की वजह से इंसान का चित्त इतना अधिक मलीन हो चुका है कि इंसान का मूल स्वभाव ही नष्ट-भ्रष्ट हो गया है।

इसी वैचारिक प्रदूषण और खुराफाती मिक्चर की वजह से  आदमी का पूरा जिस्म लगता है कि जैसे कोई ऎसा द्वीप हो गया हो जिसके सारे अंग-प्रत्यंग अलग-अलग खुराफात से नियंत्रित हो रहे हैं और वह भी ऎसे कि आदमी का दिमाग कठपुतली वाला हो गया है और जिस्म के विभिन्न हिस्से  अलग-अलग कठपुतलियां।

यही कारण है कि आदमी का अपने पर अब पूरा और पक्का नियंत्रण तक नहीं रहा है। उसकी मलीन सोच चेहरे पर भी नज़र आती है और अंग-उपांगों की बनावट या इनके परिवर्तित स्वरूप पर भी। इसी वजह से चित्त से लेकर चेहरे और जिस्म तक कहीं कोई एकरूपता, एकतानता और सरसता या माधुर्य नहीं दिखाई देता।

इन्हीं कारणों से आदमी अब मूल आदमी न होकर रोबोट या रिमोट होकर रह गया है जहाँ उसका बस नहीं चलता है। आदमी की इच्छाएं, मन की वृत्तियाँ और मलीनताओं भरे ध्येय जिधर ले जाते हैं उधर वह चल पड़ता है, कभी भोग-विलास में डूब कर नशे में गोते लगाता महसूस करता है, कभी शक्तिहीन और निढाल होकर नीम बेहोशी में बेसुध पड़ा रहता है, कभी दौड़ लगाता है और कभी और कुछ।

इसी भागदौड़ में आदमी इतना अधिक दक्ष हो जाता है कि उसे सारी दुनिया अपने लिए बनी हुई ही लगती है और दूसरों को वह अपनी सेवा के लिए पैदा हुए नौकर-चाकरों से कम नहीं समझता।

इसी अहंकार में डूबे खूब सारे लोग हैं जो दंभ में भरकर काफी कुछ कह जरूर जाते हैं मगर इनकी अभिव्यक्ति से अनचाहे ही यह लग जाता है कि ये कितना अधिक सत्य बोल रहे हैं।

अहंकारी आदमी किसी दूसरे आदमी को कभी स्वीकार नहीं करता।खूब सारे लोग जब तैश में आ जाते हैं तब सामने वालों को ललकारते हुए कहते हैं – तू नहीं जानता, मैं कौन हूँ। मैं किसका आदमी हूँ।

कई लोग गुस्से में भर कर औरों को चेतावनी देते हुए कहते हैं – मैं कुत्ता आदमी हूँ, मैं बहुत कमीना आदमी हूँ। कोई कहता है – मैं कोबरा साँप हूँ, काट लूँ तो पानी नहीं मांगेगा। कई लोग सामने वालों को जी भर कर बार-बार देखने के बाद भी कहते हैं – मैं देख लूँगा तुझको। आदमी अपने लिए ऎसे जुमले अक्सर बोलने का आदी होता है।

खुद आदमी को भले न लगे कि वह किस दंभ में भरकर क्या बोल रहा है, मगर औरों को साफ-साफ पता चल ही जाता है कि वह अपने लाक्षणिक गुणों का सौ फीसदी यथार्थ प्रकटीकरण ही कर रहा है।

आदमी जब सत्य बोलता है तब जोर-जोर से, गला फाड़-फाड़ कर बोलता है और इस अवस्था मेें वह जो कुछ बोलता है उसकी अन्तर आत्मा की आवाज होती है जो अनचाहे ही यथार्थ और सत्य का उद्घाटन करा ही देती है।

आदमी अपने आप में तिलस्म है, मायाजाल है और वह सब कुछ है जिसके बारे में कभी कोई निश्चित राय व्यक्त नहीं की जा सकती। आदमी अनिश्चय का ही दूसरा नाम होकर रह गया है। वर्तमान युग में तो लगता है कि हर आदमी न अपने आप में है, न अपने आपे में। हर कोई अभिनय ही कर रहा है। और अभिनय भी ऎसा कि किसी को भनक तक नहीं लगे कि वह कर क्या रहा है, क्या चाहता है, और क्यों चाहता है।

कई लोगों में यह पागलपन सर चढ़ कर बोलता रहा है, उन्हें कुछ मिले न मिले, दूसरों के लिए कुछ न कुछ खुराफात करते ही रहेंगे, न खुद चैन से बैठते हैं, न औरों को चैन से बैठने देते हैं। बेवक्त दुनिया में आ गए ये लोग किसी प्रोफेशनल मनोरंजन या संसार की आकस्मिक दुर्घटनाओं से कम नहीं होते। जो आसानी से पहचाना जा सके,  वह आदमी। जिसे कोई नहीं पहचान सके वह आदमी की खाल में कुछ भी हो सकता है।

3 thoughts on “कुत्ते भी शरमाने लगे हैं कमीनों को देखकर

  1. गर्व करने लगे हैं कुत्ते अपने आप पर…
    खूब सारे लोग हैं जिनके बारे में आम धारणा यही रहती है कि इनसे तो कुत्ते भी अच्छे हैं।
    इस मूल्यांकन के बाद कुत्तों में आत्म गौरव और स्वाभिमान बढ़ा है और वे गर्व के साथ यह उद्घोष करने लगे हैं कि वे अब उन इंसानों से भी बेहतर समझे जाने लगे हैं जो कमीन हैं।
    अपने आस-पास, साथ और अपने क्षेत्र में खूब सारे लम्पट, व्यभिचारी और भ्रष्ट-लूटेरे हैं जिनकी करतूतें, कारनामें और हरकतें लपकने, झपटने और छीन खाने वाले कुत्तों से भी कई गुना अधिक हैं और इस मायने में इन्होंने कुत्तों को भी पीछे छोड़ दिया है।

  2. What a great & accurate satire …I think u have done research in human behavior..👌

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