नंगे-भूखे आतुरों का आसुरी नाच-गान

नंगे-भूखे आतुरों का आसुरी नाच-गान

हमने नवरात्रि कर ली, रावण दहन कर दशहरा मना लिया। फिर भी कुछ दिख नहीं रहा है इसका कोई प्रभाव।

सब तरह भरमार है कुटिल चेहरों की, जिनका दिल कुछ और धड़कता है, दिमाग कभी किसी घातक खुराफाती षड़यंत्र का शिलान्यास करता है और कभी अपने किये षड़यंत्रों के महलों के उद्घाटन कर खुद को नियन्ता व भाग्यविधाता के रूप में पेश करने के पब्लिसिटी प्लान की रचना करता रहता है और जिस्म की हर बार बदलती अजीबोगरीब हरकतें दिखाती हैं कि आदमी के भीतर से आदमियत गायब है।

रह रहकर वे ही चेहरे लिबास, पगड़ियां, टोपियां और साफे बदल-बदल कर हर जगह नज़र आते हैं जो बरसों से इंसानियत को रेनबसेरों में छोड़ते रहने के आदी हैं।

जो रसिकों की जाजम पर नज़र आते थे वे मंच पर जमा दिख रहे हैं और जो कभी मंच पर फबते थे वे आज रसिकों की भीड़ में बैठे तमाशा देखने का मजा लूट रहे हैं। तमाशा खड़ा करने वाले और तमाशबीन सब मस्त हैं। दोनों ही तरफ वाले अपने हाल में मगन और खुश हैं।

उन्हें अच्छी तरह पता है कि यह अदला-बदली और तमाशा हमेशा यों ही चलता रहेगा। तमाशबीनों की अपार भीड़ अपने-अपने भ्रमों में जी रही है। एक तरफ वाले खा-पीकर अजीर्ण और अपच के शिकार होकर कब्जियत मिटाने दौड़ लगा रहे हैं दूसरी तरफ वाले जलेबी दौड़ की शुरूआत को लेकर बेसब्र हैं, उन्हें हमेशा यही लगता है कि अब समय आ ही गया है जब अन्नकूट लूटने वाला है। इनके लिए हर तरफ अन्नक्षेत्र और रावण रसोड़ों के द्वार खुले हुए हैं।

जो करने वाले हैं उनकी हमेशा मौत है और न करने वालों की हमेशा मौज उड़ी रहती है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि वे किस युग में जी रहे हैं। जमाने भर में जो वास्तविकता में हो रहा है वह कलियुग ही दिख रहा है और भाषणों, कथाओं, सत्संग, प्रवचन, उपदेशों में सब तरफ सत, त्रेता और द्वापर युग की छाया का आभास हो रहा है।

आखिर सच क्या है ? इसी प्रश्न के बारे में सोचते-सोचते आदमी समझ नहीं पाता और अन्ततः यक्ष प्रश्न को साथ में लिए ही उसका समय पूरा हो जाता है।

बाबा लोग गृहस्थों को मात देते जा रहे हैं और गृहस्थियों को बाबे बनाने में न केवल बाबा बल्कि बहुत से डकैत पीछे पड़े हैं जो तरह-तरह के रंगों के झण्डों और स्टण्टों के साथ हर तरफ भिड़े हुए हैें।

बाबा लोग तो पकड़ में आ जाते हैं इसलिए बदनाम भी हो जाते हैं और सलाखों के पीछे जिन्दगी बिताने को विवश भी हैं। पर खूब सारे लोग हैं जो ऎय्याशी, भोग-विलास और धन-दौलत जमा करने के मामले में बाबाओं से भी हजार गुना ऊँचे किस्मों के लुच्चे-लफंगे और टुच्चे हैं पर पकड़ में नहीं आते।

उनके पास और साथ तेल मालिश कर चिकने बनाने वाले और बच निकलने के हर नुस्ख आजमाने वाले टुकडैलों और इनकी झूठन पर पलने वाले परजीवियों की जबरदस्त फौज ही इतनी है कि बड़ी-बड़ी व्हेल मछलियाँ, मगरमच्छ और अजगर साफ बच निकलते हैं। कमाल की फिसलन वाले हैं ये सब। लगता है यमपाश के सिवा ये किसी की पकड़ में नहीं आने वाले।

महाभारत और रामायण के सारे पात्र फिर जीवित हो उठे हैं लेकिन इस बार ये विलक्षण कुटिलताओं के साथ सामने हैं। उन पात्रों को तो नामों और चेहरों से आसानी से पहचाना भी जा सकता था पर आज के ये सारे पात्र अपने नामों से कोई सरोकार नहीं रखते, न इनके चेहरों से इन्हें पहचाना जा सकता है।

हर मामले में ढेरों मुखौटों को धारण करने में सिद्ध इन पात्रों की हर हरकत अकल्पनीय है। ये कभी भी कुछ भी कहर बरपा सकते हैं। हाँ इतना अवश्य है कि ये कोई सा अच्छा काम कभी नहीं कर सकते, जो कुछ करेंगे या कहेंगे वह बुरा ही बुरा। इस बात की पक्की गारंटी है।

इस मामले में आज के आदमी ने पुराने सारे युगों के असुरों और राक्षसियों को काफी पीछे छोड़ दिया है। इनके आगे बेचारे रावण और कंस से लेकर सभी प्रकार के असुर बौने सिद्ध हो गए हैं।  इनके साथ ही राक्षसियों से भी आगे निकल गई हैं अपनी असुरानियां।

उन असुरों का अहंकार और लक्ष्य किसी एकाध बात के इर्द-गिर्द भ्रमण करता रहता था लेकिन आज के राक्षसों और राक्षसियों का कोई एक लक्ष्य नहीं है। उन्हें वह सब कुछ चाहिए जो उन्हें मानसिक और दैहिक आनंद की उपलब्धि करा सके, धन-दौलत का संग्रहण हो सके और हर संभव पापकर्म करने के बावजूद पुण्यात्मा के रूप में पहचान कायम रह सके, प्रभुत्व और बहुआयामी वर्चस्व में कहीं कोई कमी न आने पाए।

यानि की हर मामले में डुप्लीकेट भी बने रहें और दुनिया को भ्रमित भी करते रहें। आज के असुर और असुरियां जहाँ कुछ मिलने वाला हो वहाँ मुँह निकाल कर गिद्धों की तरह झपट पड़ते हैं, कुत्तों और कुतियाओं की तरह लपक लेते हैं।

इनके जीवन का एक ही धर्म रह गया है और वह है हर मौके का फायदा उठाओ चाहे इसके लिए किसी के भी पाँव क्यों न पकड़ने पड़ें, किसी को भी अपना माई-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी या और भी कुछ क्यों न बना लेना पड़े, और किसी के सामने समर्पित होकर चाहे कितना ही क्यों न पसर जाना पड़े।  इसमें शर्म किस बात की।

यों भी स्वार्थ और उच्चाकांक्षाओं-लुच्चाकांक्षाओं के इन तटों पर आकर हर कोई नंगा और बदहवास होकर नाचने लगता है। जब सारे ही भूखे-प्यासे और आतुर लोग नंगे हो जाएं तो फिर किसे शर्म आए।

जिन बुद्धिजीवियों को शर्म आती है उन्होंने अपने आप को बुद्धिबेचकों के रूप में बदल लिया है। चाहे जो आए ले जाए खरीद कर, हम सदैव तैयार बैठे हैं। एक बार बिकने को ही जिन्दगी मान लिया है तो फिर लाज किस बात की। इस मण्डी में सारे वे ही जमा हैं जो लज्जाहीन हैं।

जमाने को दिखाने भर के लिए इन निर्वीर्य और कायर बुद्धिजीवियों ने गांधारी धर्म अपना लिया है लेकिन आँखों पर बंधी पट्टी घनी न होकर पारदर्शी भी है ताकि नंगे-भूखों, कामान्ध, मोहान्ध और मुद्रान्ध लोगों की बदहवासी भरे उन्मुक्त और बेशर्म नाच-गान को जी भर कर देख सकें और आनंद पाकर अपनी तृप्ति कर सकें। और देखने वाले इस भ्रम में रहें कि बेचारों की आँखों पर पट्टी बंधी या बाँध दी गई है, इसलिए इनका कोई दोष नहीं है।

दो ही रास्ते बचे हैं। इन आतुरी और आसुरी भाव वालों के कुकर्मों, अपराधों, अन्याय, अत्याचार और शोषण को चुपचाप देखते-सुनते रहो, प्रतिक्रिया या विरोध न करो। खाने दो और खाओ-खिलाओ, मारो और मरने दो या फिर हमेशा तैयार रहो मानवजन्य आसुरी आपदाओं के लिए। क्योंकि अब असुरों की नई-नई संकर किस्में फल-फूल रही हैं।

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