भौंकते रहेंगे भौंकने वाले

आजकल कोई दूसरी वाणी सुनाई दे या नहीं, लेकिन भौंकने की आवाज हर जगह आसानी से सुनी जा सकती है।  गली-मोहल्लों, चौराहों, सर्कलों, जनपथों से लेकर राजपथों, झोपड़ियों से लेकर महलों तक, बाड़ों, बंगलों काम-धंधों और फुरसतिया स्थलों से लेकर हर जगह भौंकने वालों की पावन मौजूदगी दर्शनीय है।

पहले जमाने में काम करने वाले लोग हुआ करते थे और भौंकने वालों की संख्या कम हुआ करती थी। आज काम करने वालों की कमी होती जा रही है और उनकी अपेक्षा भौंकने वालों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। पहले भौंकने की अदाएं कम हुआ करती थी लेकिन अब भौंकने वालों की स्टाईल जुदा-जुदा होती जा रही है।

भौंकना भी अब जैसे प्रतिशोध का जबर्दस्त संकेत हो गया है। सामने वालों को देखकर अपनायी जाती है भौंकने की स्टाईल। भौंकने-भौंकने की भी अलग-अलग अदाएँ हैं और उनका मौका देखकर प्रयोग करना भी कला है। और इन तमाम कलाओं में वे लोग माहिर हैं जो भौंकने में दक्ष हैं और बरसों का अनुभव रखते हैं।

आदमियों की जात में कई-कई किस्में हैं। दुनिया में आदमी की जितनी प्रजातियाँ हैं उतनी किसी की नहीं। कुछ आदमी अपनी आदमियत से जाने-पहचाने जाते है जबकि बहुतेरे अपनी अजीबोगरीब हरकतों की वजह से। हम गौर करें तो पाएंगे की अपने आस-पास आदमियों की कई रोचक किस्में विद्यमान हैं। इनमें बहुसंख्य तो ऎसे हैं जिनका केवल  जिस्म ही आदमी का हैं। रूह से लेकर मुखाकृति तक सब कुछ जैसे पराया ही लगता है।

बहुत कम आदमी ऎसे होते हैं जिन्हें आदमियत का भान होता हैं। ये लोग अपने ही कर्मयोग में रमे रहते हैं। खुद तो प्रसन्न रहते ही हैं, अपने सम्पर्क में आने वाले हर शख्स को प्रसन्न कर देने का माद्दा रखते हैं।

बड़ी संख्या में ऎसे -ऎसे लोग हमारे सम्पर्क में आ जाते हैं या दिख जाते हैं जिन्हें न मानवीय मूल्यों या संवेदनाओं का भान हैं न आदमियत के बुनियादी तत्वों का, और न ही समाज या संसार के प्रति दायित्वों का। ऎसे लोग अपने ही स्वप्नों का भ्रमों से भरा संसार सजा लेते हैं और निकल पड़ते हैं खुदगर्जी के जंगलों में सब कुछ अपने ही अपने लिए बटोरने। और इस पूरी यात्रा में ये छीना-झपटी, लूट-खसोट व धींगामस्ती में इस कदर रमे रहते हैं कि इन्हें पता ही नहीं चलता कि ये अपने आनंद के लिए जी रहे हैं या कि औरों को दुःखी करने।

ऎसे ही लोगों में एक जात होती हैं -भौंकने वाले आदमियों की। इनका एकमात्र काम होता है जहाँ मौका मिले वहां भौंकना। ऎसे लोगों के लिए यह कहने की जरूरत नहीं हैं कि भौंकने का काम किस प्रजाति का है।  भौंकने वाले ऎसे लोगों के पास न दिमाग होता है, न  कोई हुनर, बल्कि भौंकने मात्र की महारथ के बूते ये चमड़े के सिक्के चला लेते हैं। इनके ज्यादातर काम भौंकने की कला से ही हो जाते हैं।

शान्तिपसन्द लोगों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे निरापद और प्रवाही जिन्दगी चाहते हैं और हर कीमत पर इसे बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। भौंकने वालों को इनकी यह कमजोरी अपने लिए फायदा देने वाली सिद्ध होती है और इसका वे भरपूर लाभ उठाते हैं।  भौंकने वालों की दृष्टि और सूँघने की शक्ति बहुत ज्यादा पैनी और तेज होती है इसलिए वे भौंकते हुए उधर ही लपकते रहते हैं जहाँ इनके उल्लू सीधे होते हों।

इन्हें पता है कि लोगों को भौंकने की आवाज से नफरत होती है इसलिए मुँह बन्द करने का जतन होगा ही होगा। हर भौंकने वाला इस बात से तो निश्चिन्त होता है कि जो भौंकता है उसे कुछ न कुछ मिलता ही है, चाहे उच्छिष्ट की प्राप्ति हो या फिर अतिरिक्त की।

इसी गारंटी के बूते ही तो भौंकने वाले बिना परिश्रम के सब कुछ पाते रहे हैं। वरना इनमें कौन सी अक्ल है कि कमा खा सकें, जिन्दा रहने के लिए अपने प्रयासों से कुछ प्रबन्ध कर सकें। केवल भौंकने मात्र में पारंगत होने की कला ही तो है जो इनकी पूरी जिन्दगी निकाल देती है और वह भी ऎशो आराम से। समझदार लोगों को हर दिन इसी बात पर आश्चर्य होता है कि आखिर ये लोग खुद का गुजारा कैसे करते होंगे, अपने घर-परिवार को कैसे चलाते होंगे … आदि-आदि।

इन्हें कोई पसंद न भी करे तो क्या, इनके पास भौंकने का ब्रहमास्त्र तो है। वैसे भी हमारे यहॉं भौंकने वालों के मुँह जल्दी बंद करने के लिए हड्डी, रोटी का टुकड़ा, ब्रेड और जलेबी से लेकर बहुत कुछ उनके सामने उछाल देने की परम्परा युगों से रही हैं। अब भौंकने वालों की भूख के पैमाने बदल गए है। उन्हें मुद्राओं से लेकर वह सब पसंद आता है जो आवारा आदमी को गहरे तक भाता है।

बस्तियों, चौराहों, शव-आसन-पर-शासन और घसियारों के गलियारों से लेकर हर कहीं बढ़ती जा रही हैं भौंकने वालों की तादाद। इनकी एक्शन भी अलग-अलग हुआ करती हैं। कोई नाक रगड़ते हुए भौंकता हैं, तो कोई बाल नोंचते हुए। कोई नाक का बाल खिंचते हुए तो कोई हाथ ऊँचे कर। भौंकना भी होता है तो जात-जात की भाव-भंगिमाओं के साथ।

भौंकने वालों के लिए न कोई समय सीमा का बँधन हैं न देश-काल-परिस्थितियों का। इनके लिए विषयों की भी कोई मर्यादा नहीं। इनका पूरी जिन्दगी गुजर जाती है फिर भी सुधरने का नाम नहीं लेते। लें  भी कैसे ? भौंकने वाली मूल प्रजाति की पूँछ मरने के बाद भी सीधी होती नहीं देखी गई।

अच्छे-सच्चे और समझदार लोग अनचाहे ही, कलह का माहौल समाप्त कर शांति का सुकून पाने इनके मुँह बंद करने को झुक जाते हैं। यहीं से शुरू हो जाती है भौंकने वालों की अहंकारी वृत्तियाँ। इनमें लोकप्रियता का यह भरम मरते दम तक पुष्पित-पल्लवित होता रहता है। मिथ्या प्रतिष्ठा के अहंकार जगत के बादशाह बन बैठे ये लोग भौंकने मात्र की कला के बूते क्या-क्या नहीं कर गुजरते।

इन भौंकने वालों के साथ इनके समान धर्म लोगों की जमात भी लगी रहती हैं जो झूुठन का चस्का पाने के फेर में इनकी भूंकन शुरू होते ही भौंकने में साथ देने लगते हैं। भौंकने वालों को पता होता है कि मिलजुलकर भौंकेंगे तो इसका अधिक असर पड़ता है।

भौंकने वालों ने जब से ‘संघे शक्ति कलौयुगे’ का मूल मंत्र सुन लिया है तभी से समूहों में भौंकने लगे हैं। देश का कोई कोना ऎसा नहीं बचा है जहाँ भौंकने वालों का अस्तित्व न हो। भौंकने मात्र से अपनी हर आवश्यकता की पूर्ति हो जाए, तो भला कौन ऎसा होगा जो भौंकने की कला को न आजमाये। इसमें न कोई पूंजी लगानी पड़ती है, न ही ज्ञान, हुनर और अनुभव का कोई सवाल। हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा का चोखा।

भौंकने वालों को कोसना छोड़ें, ये बेचारे भौंकने के लिए ही तो पैदा हुए हैं, न भौंकें तो जिन्दा कैसे रहेंगे, और तब इनकी असामयिक मृत्यु भी हो गई तो हत्या का पाप हमारे ही सर आना है। इन्हें जी भर कर भौंकने दें और अपने कामों में लगे रहें। जिनका पूरा जिस्म ही झूठन से भरा हो, उनका भौंकना तब तक जारी रहेगा जब तक कि इनका टिकट न कट जाए। भौंकने वालों की तासीर ही यही है कि ये हमें लक्ष्य से भटकाने के  लिए भौंकते रहेंगे जी भर कर। इसलिए हमें चाहिए कि अपने कामों में लगे रहें और आनदं के साथ लक्ष्य प्राप्त करें।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *