जो भौंकेगा वही भोगेगा

आदमियों की जात में कई किस्में हैं। दुनिया में आदमी की जितनी प्रजातियाँ हैं उतनी किसी और की नहीं। कुछ आदमी अपनी आदमियत से जाने-पहचाने जाते हैं जबकि बहुतरे अपनी अजीबोगरीब हरकतों की वजह से।

आप गौर करें तो पाएंगे की अपने आस-पास की आदमियों की कई-कई रोचक किस्में विद्यमान हैं। इनमें बहुसंख्य तो ऎसे हैं जिनका केवल जिस्म ही आदमी का है। रूह से लेकर मुखाकृति तक सब कुछ जैसे पराया ही लगता है।  बहुत कम आदमी ऎसे होते हैं जिन्हें आदमियत का भान होता है। ये लोग सदैव अपने ही कर्मयोग में रमे रहते हैं। खुद तो प्रसन्न रहते ही हैं, अपने सम्पर्क में आने वाले हर शख्स को प्रसन्न कर देने का माद्दा रखते हैं।

बड़ी संख्या में ऎसे-ऎसे लोग हमारे सम्पर्क में आते रहते हैं जिन्हें न मानवीय मूल्यों या संवेदनाओं का भान है, न आदमियत के बुनियादी तत्वों का, और न ही समाज या संसार के प्रति दायित्वों का। ऎसे लोग अपने ही स्वप्नों का भ्रम-इन्द्रधनुष बना लेते हैं और निकल पड़ते हैं औरों को दुःखी करने।

ऎसे ही लोगों में एक जात होती हैं -भौंकने वाले आदमियों की। इनका एकमात्र काम होता है जहाँ मौका मिले वहाँ गला फाड़-फाड़ कर भौंकना। ऎसे लोगों के लिए यह कहने की जरूरत नहीं हैं कि भौंकने का काम किस प्रजाति का है। इन भौंकने वालों के पास न दिमाग होता है, न  हुनर।  भौंकने मात्र की कला के बूते ये चमड़े के सिक्के जरूर चला लेते हैं। इनके ज्यादातर काम भौंकने की अदाओं से ही हो जाते हैं।

इन्हें कोई पसंद न भी करे तो क्या, इनके पास भौंकने का ब्रह्मास्त्र तो है ही। वैसे भी हमारे यहाँ भौंकने वालों के मुँह जल्दी बंद करने के लिए हड्डी, रोटी का टुकड़ा, ब्रेड़ और जलेबी से लेकर बहुत कुछ उनके सामने उछाल देने की परम्परा युगों से रही है। अब भौंकने वालों की भूख के पैमाने बदल गए हैं। उन्हें मुद्राओं से लेकर वह सब पसंद आता है जो आवारा आदमी को गहरे तक भाता है।

बस्तियों, चौराहों, शासन-प्रशासन और कलम-घसियारों के गलियारों से लेकर हर कहीं बढ़ती जा रही है भौंकने वालों की तादाद। इनकी एक्शन भी अलग-अलग हुआ करती है। कोई नाक रगड़ते हुए भौंकता हैं, तो कोई बाल नोचते हुए। कोई नाक का बाल खिंचते हुए, तो कोई हाथ ऊँचे कर।

भौंकने वालों के लिए न कोई समय सीमा का बंधन है, न देश-काल-परिस्थितियों का। इनके लिए विषयों की भी कोई मर्यादा नहीं। इनकी पूरी जिन्दगी गुज़र जाती है फिर भी सुधरने का नाम नहीं लेते। लें भी कैसे ?  भौंकने वाली मूल प्रजाति की पूँछ भी हो पायी है कभी सीधी।   लोग अनचाहे ही, कलह का माहौल समाप्त कर शांति का सुकून पाने इनके मुँह बंद करने के मक़सद से झुक जाते हैं। यहीं से शुरू हो जाती है भौंकने वालों की विजय यात्रा। भौंकने वालों में लोकप्रियता का यह भरम मरते दम तक पुष्पित-पल्लवित होता रहता है। मिथ्या प्रतिष्ठा के अहंकार जगत के बादशाह बन बैठे ये लोग भौंकने मात्र की कला के बूते क्या-क्या नहीं कर गुजरते।

इन भौंकने वालों के साथ इनके  समान-धर्मा लोगों की जमात भी लगी रहती है, जो मुफ्त झूुठन का चस्का पाने के फेर में इनकी भूकन शुरू होते ही भौंकने में नॉन-स्टॉप साथ देने लगती है। आदमियोें की इस भौंकने वाली जात का तो स्लोगन ही है- जो भौंकेगा, वो भोगेगा।  कुछ की तो पूरी जिन्दगी ही गुजर जाती है भौंकने में। भौंकना इनके रोजमर्रा के काम-काज और रोजगार से ऎसा जुड़ा रहता है जैसे सूअर और गंदगी का। ऎसे भौंकने वाले आदमियों के प्रति घृणा की बजाय दया का भाव होना जरूरी है। यह मानकर चलिए कि भगवान ने इन्हें आदमी की बजाय चार पैरों वाला जिस्म ही दिया होता तो बस्तियों में दिन-रात भौंकने का ऎसा ताण्डव फैल जाता, जहाँ कोई भी न सुरक्षित रहता, न किसी को चैन मिलता।

जो भौंकने वाले अब हमारे बीच नहीं रहे, उन्हें पहचानें,  वे आज भी हमारे आस-पास उनके मूल रूप में विचरण कर रहे हैं, जो अपने आस-पास अब भी हैं उन्हें हमारी आने वाली पीढ़ियाँ देखेंगी दूसरे रूपाकारों में गली-कूचों में उच्छिष्ट सूंघते हुए, भौं-भौं करते हुए।