भौंकू तो भौंकेगे ही

अभिव्यक्ति के लिए सबके पास अलग-अलग विधाएं हैं और इन्हें सारी प्रजातियां आपस में अच्छी तरह समझ जाया करती हैं। जलचर, थलचर, नभचर और उभयचर वर्ग का कोई सा जीव हो, अपनी तरह के दूसरे सारे जीवों की वाणी समझ जाते हैं। इन्हें कभी कोई परेशानी महसूस नहीं होती।

केवल इंसान ही ऎसा है जिसके पास कई तरह की वाणियां दी हैं, भावों और मुद्राओं के साथ मुखौटे दिए हैं और यह भी विलक्षणता दी है कि कब क्या बोल जाए, सुना जाए, तो पता ही नहीं चलता कि क्या कह रहा है और इसका संदर्भ किससे है।

कभी सीधी-सपाट और बेबाक बयानी करता है और कभी घुमावदार, लच्छेदार और मलाईदार तो कभी क्रूर और खौफनाक वाणी का इस्तेमाल कर डालता है। इस इंसान के बारे में कोई कयास नहीं लगा सकता कि वह जो कुछ बोल रहा है उसमें सत्य और यथार्थ कितना है, विनय और श्रद्धायुक्त कितना है और क्रोधावेश से भरा हुआ किस सीमा तक। कब वह कटाक्ष की भाषा का इस्तेमाल कर डालेगा और कब व्यंग्य बाणों से आहत कर डालेगा।

यह सब कुछ परिस्थिति और प्रलोभन से लेकर प्राप्ति और परिग्रह पर निर्भर करता है। कुछ मिलने की उम्मीद हो या मिल जाए तो खुश-खुश रहेगा। और कोई संभावना न हो या वंचित रह जाए, अथवा उसके भाग का दूसरे ले उड़ें तो इतना अधिक शोकमग्न और दुःखी हो जाएगा कि जैसे उसके  माँ-बाप और भाई-बहन सारे एक साथ मर ही गए हों।

औरत हो या पुरुष, आदमियों की जात में कई-कई किस्में हैं। दुनिया में आदमी की जितनी प्रजातियॉं हैं उतनी किसी की नहीं। कुछ आदमी अपनी आदमियत से जाने-पहचाने जाते है जबकि बहुतेरे अपनी अजीबोगरीब हरकतों की वजह से।

हम तसल्ली से गौर करें तो पाएंगे की अपने आस-पास की आदमियों की कई रोचक किस्में विद्यमान हैं। इनमें बहुसंख्य तो ऎसे हैं जिनका केवल जिस्म ही आदमी का हैं। रुह से लेकर मुखाकृति तक सब कुछ जैसे पराया ही लगता है।

बहुत कम आदमी ऎसे होते हैं जिन्हें आदमियत का भान होता हैं। ये लोग अपने ही कर्मयोग में रमे रहते हैं। खुद तो प्रसन्न रहते ही हैं, अपने सम्पर्क में आने वाले हर शख्स को प्रसन्न कर देने का माद्दा रखते हैं।

बड़ी संख्या में ऎसे -ऎसे लोग हमारे सम्पर्क में आ जाते हैं या दिख जाते हैं जिन्हें न मानवीय मूल्यों या संवेदनाओं का भान हैं न आदमियत के बुनियादी तत्वों का, और न ही समाज या संसार के प्रति दायित्वों का। ऎसे लोग अपने ही स्वप्नों का भ्रमों भरा  इन्द्रधनुष बना लेते हैं और निकल पड़ते हैं औरों को दुःखी करने।

ऎसे ही लोगों में एक जात होती हैं -भौंकने वाले आदमियों की। इनका एकमात्र काम होता है जहॉं मौका मिले वहां भौंकना और भौंकते रहना। ऎसे लोगों के लिए यह कहने की जरुरत नहीं हैं कि भौंकने का काम किस प्रजाति का हैं। भौंकने वाली प्रजाति में दोनों लिंगों का योगदान है। पुरुष भौंकने वाले भी हैं, और इनसे भी अधिक विशेषाधिकार रखने वालियां भी।

भौंकने वाले ऎसे लोगों के पास न दिमाग होता है, न  कोई हुनर। बल्कि भौंकने मात्र की महारत के बूते ये चमड़े के सिक्के चला लेते हैं। इनके ज्यादातर काम भौंकने की कला मात्र से ही हो जाते हैं।

इन्हें कोई पसंद न भी करे तो क्या, इनके पास भौंकने का ब्रह्मास्त्र और जन्मसिद्ध अधिकार तो है ही। वैसे भी हमारे यहाँ भौंकने वालों के मुँह जल्दी बंद करने के लिए हड्डी, रोटी का टुकड़ा, ब्रेड और जलेबी से लेकर बहुत कुछ उनके सामने उछाल देने की परम्परा युगों से रही हैं।

लोग अब अच्छी तरह से यह भी समझ गए हैं कि ये आखिरकार भौंकते ही क्यों हैं। पहले भौंकने वालों की संख्या कम हुआ करती थी पर जब से सब तरफ टुकड़े बँटने और उपलब्ध होने शुरू हो गए हैं तभी से भौंकने वालों की संख्या में निरन्तर बढ़ोतरी होती जा रही है।

जब से भौंकने वालों का बाहुल्य होने लगा है तभी से सारे के सारे भौंकू लोग निर्लज्ज होकर भौंकने लगे हैं। इनके भौंकने के अर्थ भी अलग-अलग हैं। जानकार लोग इनके भौंकने के अन्दाज, ध्वनि के उतार-चढ़ाव और अन्तराल से ही भाँप लेते हैं कि कोई आखिर क्यों भौंक रहा है और उसकी मांग क्या है। अब भौंकने वालों की भूख के पैमाने बदल गए है। उन्हें मुद्राओं से लेकर वह सब पसंद आता है जो आवारा आदमी को गहरे तक भाता है।

बस्तियों, चौराहों, डेरों और घसियारों के गलियारों से लेकर हर कहीं बढ़ती जा रही हैं भौंकने वालों की तादाद। इनकी एक्शन भी अलग-अलग हुआ करती हैं। कोई नाक रगड़ते हुए भौंकता हैं, तो कोई बाल नोचते हुए। कोई नाक का बाल खिंचते हुए तो कोई हाथ ऊँचे कर। भौंकने वालों में कहीं कोई भेद नहीं है। नीचे वाले भी भौंकने के आदी हैं और ऊपर वाले भी। और इनसे सीख-सीख कर वे भी भौंकना सीख गए हैं जिन्हें बीच वाला माना जाता रहा है।

भौंकने वालों के लिए न कोई समय सीमा का बंधन हैं न देश-काल-परिस्थितियों का। इनके लिए विषयों की भी कोई मर्यादा नहीं।       इनकी पूरी जिन्दगी गुजर जाती है फिर भी सुधरने का नाम नहीं लेते। लें भी कैसे ? भौंकने वाली मूल प्रजाति की पूँछ ही ऎसी है कि कभी नहीं हो पाती सीधी। जब तक पूरे दबाव के साथ भूंगली में रहती है तभी तक सीधी रहा करती है, निकलने के बाद फिर वहीं टेढ़ी ही टेढ़ी, चाहे कितने ही बरस से भूंगली से दबी क्यों न रहे।

लोग अनचाहे ही, कलह का माहौल समाप्त कर शांति का सुकून पाने इनके मुँह बंद करने के लिए हमेशा त्याग कर दिया करते हैं। अपने स्वाभिमान को एक तरफ रखकर हमेशा झुक जाते हैं। यहीं से शुरू हो जाता है भौंकने वालों में लोकप्रियता का भरम, जो कि मरते दम तक पुष्पित-पल्लवित होता रहता है। मिथ्या प्रतिष्ठा के अहंकार जगत के बादशाह बन बैठे ये लोग भौंकने मात्र की कला के बूते वह सब कुछ कर गुजरते हैं जो कि शालीन, धीर-गंभीर और विनम्र लोग जिन्दगी भर नहीं कर पाते। चाहे कितनी ही सहनशीलता, सहिष्णुता और नम्रता क्यों न अंगीकार करते रहें।

इन भौंकने वालों के साथ इनके  समान धर्मा लोगों की जमात भी लगी रहती हैं जो झूठन का चस्का पाने के फेर में इनकी भूकन शुरु होते ही भोंकने में साथ देने लगते हैं। दो ही रास्ते हैं इन भौंकने वालों को सीधा लाने के। या तो खुद लूट रहे हैं उनमें से कुछ हिस्सा इनके लिए भी रखें या फिर डण्डादेव का अनुष्ठान करते हुए भौंकने वालों को जहाँ मिलें वहाँ पूरा जोर लगाकर डण्डादेव का आशीर्वाद देते रहें।

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