स्मृति शेष – दिव्य गायत्री साधक बण्डू महाराज का महाप्रयाण

शैव, शाक्त और वैष्णव उपासना धाराओं के साथ ही वैदिक परम्पराओं और प्राच्यविद्याओं का गढ़ रहा राजस्थान का दक्षिणांचलीय जिला बांसवाड़ा धर्म-कर्म के क्षेत्र में पूरे भारतवर्ष में अनूठा स्थान रखता है। पुरातन काल में ऋषि-मुनियों और सिद्ध संतों की तपस्या से अनुप्राणित इस अंचल में प्राचीन काल से संत-महात्माओं और महन्तों की लम्बी श्रृंखला विद्यमान रही है।

      हिन्दुस्तान का यह इलाका तंत्र-मंत्र, ज्योतिष और साधनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। यहां विभिन्न पद्धतियों के एक से बढ़कर एक साधक हुए हैं जिनकी तपस्या की बदौलत इस अंचल को धर्म धाम ‘लोढ़ी काशी’ के रूप में मान्यता मिली हुई है।

शाक्त उपासना में अग्रणी रहा है माही प्रदेश

माही मैया की स्नेह धारा से घिरे यहां के साधना जगत में कई ऎसी हस्तियां हुई हैं जिन्होंने कठोर तप और एकनिष्ठ उपासना के बूते ईश्वरीय कृपा का साक्षात्कार किया है। यही परम्परा न्यूनाधिक रूप में आज भी चली आ रही है।

      गायत्री साधना में अग्रणी वागड़

      वागड़ प्रदेश के नाम से प्रसिद्ध बांसवाड़ा क्षेत्र अर्वाचीन काल से गायत्री साधना में भी अग्रणी रहा है। अनेक पुरश्चरण करने वाले गायत्री साधकों की बांसवाड़ा में कोई कमी नहीं रही। आस्था और पुण्य संचय परम्परा की इसी कड़ी में एक प्रसिद्ध नाम है – पं. विजय कुमार त्रिवेदी, जिन्होंने दृढ़ संकल्प लिया और बांसवाड़ा शहर के पूर्वी छोर पर अवस्थित प्राचीन आस्था स्थल वनेश्वर शिवालय परिसर स्थित गायत्री मन्दिर में वर्षों तक अनवरत् तपस्या लीन रह कर कई  करोड़ गायत्री जप पुरश्चरण का अनूठा संकल्प पूरा किया।

फक्कड़ी साधक होने के कारण 80 वर्षीय ‘बण्डू महाराज’ के नाम से मशहूर पं. विजयकुमार त्रिवेदी का महाप्रयाण आज 15 जून, शनिवार को उनके निवास स्थान पर हो गया। वे पिछले कुछ समय से बीमार थे। उनके महाप्रयाण से बांसवाड़ा जिले मेें धर्म-अध्यात्म और समाज जीवन में शोक व्याप्त हो गया। 

      मालवा से निकला रत्न

      पं. विजयकुमार त्रिवेदी का जन्म संस्कारित ब्राह्मण परिवार में श्री मधुसूदन त्रिवेदी के घर माता चन्द्रकान्ता देवी की कोख से पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के बांसवाड़ा से सटे झाबुआ जिलान्तर्गत रम्भापुर में ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा परम द्वितीया 21 मई 1939 को हुआ।

गायत्री साधना ही जीवन का ध्येय

      शैशव के ब्राह्मण संस्कारों की वजह से संध्या और गायत्री साधना का नियम पाले हुए पं. विजय कुमार त्रिवेदी पर ईष्ट देवी की इतनी कृपा हुई कि उन्होंने ताज़िन्दगी गायत्री साधना का अखण्ड व्रत ले लिया। धुन के पक्के पं. त्रिवेदी ने अहर्निश गायत्री उपासना को ही अपने समग्र जीवन का सर्वोपरि ध्येय बना लिया है। सन् 1956 से उन्होंने रोजाना ग्यारह माला गायत्री जप शुरू किया जो वर्षों तक अखण्ड रूप से बना रहा।

भूगोल के विशेषज्ञ

      विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से सन् 1963 में दर्शन शास्त्र, राजनीति एवं भूगोल  ग्रेजुएशन करने वाले पं. विजयकुमार त्रिवेदी देश-दुनिया के भूगोल के बारे में विशेषज्ञ थे। साहित्य और समाजसेवा के विविध आयामों में उनकी गहरी रुचि रही।  दिल्ली में एलेम्बिक केमिकल तथा जनरल इंश्योरेन्स में नौकरी करने के दौरान् व्यस्तताओं के बावजूद उनकी गायत्री साधना बरकरार रही। कड़ी मेहनत के हामी रहे बण्डू महाराज अस्सी के दशक में बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ व पूरे जनजाति क्षेत्र को साईकिल से नाप चुके हैं जब संजीवनी खाद की पब्लिसिटी का दायित्व उनके पास था।

      वनेश्वर बना साधना और सेवा केन्द्र

      गायत्री साधना के लिए उन्होंने वनेश्वर शिवालय के गायत्री मन्दिर को साधना केन्द्र बनाया। इसके साथ ही उन्होंने लोक सेवा का दामन थामा। इसी लोक सेवी व्यक्तित्व को देखते हुए उन्हें वनेश्वर शिवालय परिसर मेें संचालित मानस भवन के व्यवस्थापक का दायित्व सौंपा गया। अपनी साधना के साथ ही वे मानस भवन को भी वर्षों तक अपनी सेवाएं देते रहे हैं।

गायत्री माता के अनन्य उपासक

      गायत्री मन्दिर के गर्भ गृह में गायत्री मैया की मूर्ति के सान्निध्य में उन्होंने 24 लाख गायत्री जप का पुरश्चरण सन् 2002 में शुरू किया। इसके बाद वर्षों की साधना को मिलाकर उन्होंने अपने जीवन में लगभग ढाई करोड़ से अधिक  गायत्री जप का लक्ष्य पूर्ण किया।  किसी गृहस्थ साधक के लिए यह कीर्तिमान से कम नहीं है। अपनी तरह के अनूठे साधक पं. विजय कुमार त्रिवेदी ने अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए रोजाना दस घण्टे तक गायत्री जप की साधना का नियम अपनाया और इस प्रकार लगातार अनुष्ठान करते हुए महान लक्ष्य हासिल किया।  संतुलित आहार-विहार और सादगी की प्रतिमूर्ति प. विजयकुमार त्रिवेदी साधनाकाल में पूरी तरह स्वपाकी रहे।  उनका साधना क्रम साल भर पहले तक अच्छी तरह जारी रहा।

      पाक कला में बेमिसाल

      देवी अन्नपूर्णा की उन पर इतनी जबर्दस्त मेहरबानी थी कि उनके हाथ से जो भी कुछ भोज्य सामग्री बनती वह इतनी स्वादिष्ट होती थी कि हर कोई आश्चर्य ही जताता रहता। पहले के सारे अनुष्ठानों में उन्होंने अन्न का पूरी तरह त्याग कर दिया था और शरीर चलाने के लिए वे रात में मामूली फलाहार व दूध जरूर लेते रहे। पर बाद के वर्षों में वे मामूली भोजन पर ही आ गए थे और वह भी खुद के हाथों का बना ही।

मनोविनोद का दरिया

बण्डू महाराज के करीब रहने वाले लोगों का मानना है कि वे स्वस्थ मनोरंजन और मनोविनोद में रमे हुए होने के कारण सर्वस्पर्शी और लोकप्रिय थे। मस्ती और फक्कड़ी का स्वभाव इतना अधिक हिलोरें मारता था कि जब कभी वे गुस्सा भी करते तो सामने वाले समझते कोई मजाक कर रहे थे।  उनका गुस्सा चन्द सैकण्ड से अधिक टिक नहीं पाता।

स्वप्नादेश से साधना

सन् 2016 में उन्हें देवी का स्वप्नादेश मिला। तभी उन्होेंने पुरश्चरण का फैसला ले लिया  और रामनवमी से उन्होंने  गायत्री मन्दिर में ही देवी के सम्मुख 24 लाख गायत्री जप का छठा पुरश्चरण आरंभ कर दिया है। रोजाना इक्यावन मालाएं जपना उनका नियम बन गया था।

      गायत्री साधना की लम्बी यात्रा में उन्हें कई बार दिव्य शक्ति और दिव्य दर्शन का अनुभव हुआ। ख़ास बात यह है कि साधना से उनका शरीर आरोग्यवान बना होने के साथ ही तपस्या का ब्रह्म तेज उनके चेहरे से साफ झलकता था। इस सबको वे भगवती गायत्री की कृपा ही मानते थे।

      माता-पिता से मिली प्रेरणा

      पं. विजय कुमार त्रिवेदी को गायत्री साधना की प्रेरणा अपने पिताश्री मधुसूदन त्रिवेदी व माताश्री चन्द्रकान्ता से मिली। वे साधना कक्ष में अपने पिता और माता की तस्वीर भी साथ रखते थे। उनका मानना है कि इससे उन्हें प्रेरणा और आशीर्वाद का अनुभव होता है। वे कहते थे कि पृथ्वी के सबसे समीप पितर लोक है और जब तक पितरों की कृपा नहीं होती तब तक ऊपर के लोकों की निर्बाध यात्रा का सफर पूरा नहीं हो सकता।

      स्वप्न ने दृढ़ किया संकल्प

      अपने जीवन में वैराग्य भाव की दृढ़ता और गायत्री साधना के प्रति अगाध आस्था भाव रखने के पीछे उनके जीवन का एक स्वप्न मददगार साबित हुआ।

वे बताते थे कि एक बार स्वप्न में उन्हें किसी भयंकर पैशाचिक कृत्या के दर्शन हुए जो भयानक स्वरूप के साथ उन्हें खाने के लिए सामने आयी लेकिन स्वप्न में उन्होंने पांच बार गायत्री मंत्र का उच्चारण किया इससे वह कृत्या भस्मीभूत हो गई। सवेरे उठने पर उन्हें यह स्वप्न याद रहा।

उसी दिन से उन्होंने महसूस किया कि स्वप्न में गायत्री जप से ऎसा चमत्कार हो सकता है तब गायत्री साधना को और अधिक बढ़ाया जाए तो भगवती की अपार कृपा पायी जा सकती है। तभी से उनका चित्त साधना में दृढ़ होता चला गया और उन्हें बड़े-बड़े पुरश्चरण करने में कामयाबी मिली। कभी कोई अड़चन सामने नहीं आयी। मन्दिर के गर्भ गृह में गर्मी, बरसात और सर्दी की परवाह किए बगैर कई अनुष्ठान पूर्ण करने वाले वे अपनी तरह के विलक्षण साधक थे। सवा करोड़ गायत्री जप के महान पुरश्चरण की पूर्णाहुति उन्होंने सवा लक्ष गायत्री पंचकुण्डी महायज्ञ के साथ 7 व 8 नवम्बर 2009 को वनेश्वर महादेव के परिसर में गायत्री मन्दिर के सम्मुख की। इसी  महायज्ञ समारोह में संतों, पण्डितों और श्रद्धालुओं के समागम ने उन्हें स्वामी विजयानंद महाराज नाम दिया।

पं. महादेव शुक्ल के पक्के शिष्य

पं. विजय त्रिवेदी अपनी साधना की सफलता में गायत्री मण्डल के संस्थापक व संरक्षक रहे प्राच्यविद्यामर्मज्ञ देवर्षि स्व. पं. महादेव शुक्ल को साधना-गुरु मानते थे और कहते थे कि साधना मार्ग पर सफलता का राज और सामने आने वाली बाधाओं पर विजय प्राप्ति के नुस्खे उन्हें पं. शुक्लजी से मिले और इसी का परिणाम है कि वे साधना पथ पर अडिग रहते हुए वर्षों तक निरन्तर रमे रहे।

साल भर पूर्व तक वे स्वस्थ थे हैं तथा निरन्तर गायत्री साधना के साथ विभिन्न अनुष्ठानों के कई चरण पूरे करने का आनंद प्राप्त करते रहे।  उन्होंने पहला प्रयोग गायत्री मन्दिर के गर्भ गृह में आसन जमाकर 13 रामायण पाठ का पूर्ण किया है। इसके बाद वर्षों तक मानस मण्डल की ओर से संचालित अखण्ड रामायण पारायण में उन्होंने श्रद्धापूर्वक हिस्सा लिया। इसके साथ ही अपना पूरा जीवन लोक कल्याण और सेवा में समर्पित किए हुए रहे।

गायत्री उपनाम से सम्मानित

      दक्षिणांचल में गायत्री साधना के लिए दशकों से प्रयासरत संस्था गायत्री मण्डल ने उनकी गायत्री साधना की उपलब्धियों को देखकर ‘‘गायत्री’’ उपनाम व अलंकरण से सम्मानित किया। वहीं अनेक बार विद्वानों और धार्मिक संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। बण्डू महाराज का समग्र जीवन व गायत्री उपासना एक दूसरे के पर्याय ही हो गए थे।

देशाटन में गहरी रुचि

      यायावरी उनके व्यक्तित्व की ख़ासियत है। एक पुरश्चरण पूरा होने के बाद तीर्थाटन करने की उनकी आदत 78 वर्ष की आयु तक भी कायम रही। फक्कड़ी आनंद के धनी बण्डू महाराज अपने गृहस्थ जीवन में भी घुमक्कड़ स्वभाव के रहे हैं। पूर्वाश्रम में नई दिल्ली, अहमदाबाद, भुज, राणापुर, उज्जैन, थाँदला, झाबुआ, रंभापुर, मेघनगर, सौराष्ट्र सहित देश के विभिन्न हिस्सों में उनकी कारोबारी का क्रम अर्से तक बना हुआ रहा।

      परिवारजनों की यह उदारता ही है कि उनकी बदौलत बण्डू महाराज ने भरा-पूरा गृहस्थ धर्म निभाते हुए भी अपना अधिकांश समय त्याग-तपस्या के लिए समर्पित कर दिया और जीवन के अंतिम समय तक मौन साधक के रूप में जुटे रहे।

मेरा उनका वर्षों से गहरा संबंध रहा। मुझे और पं. श्री नरहरि भट्ट जी को उनका विशेष स्नेह प्राप्त रहा और वर्षों तक उनके साथ घण्टों चर्चाओं का अवसर मिला।

गायत्री के अनन्य साधक पं. विजयकुमार त्रिवेदी की अंतिम समय तक दिली इच्छा रही कि बांसवाड़ा में वेद व पौरोहित्य शिक्षा का महाविद्यालय स्थापित हो। उनकी अनवरत् गायत्री साधना और निष्काम अनुष्ठानों की श्रृंखला नई पीढ़ी के साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनी हुई है।

जन-जन में बण्डू महाराज के नाम से लोकप्रिय बण्डू महाराज का निधन अपूरणीय क्षति है। उन्होंने कठोर तपस्या और त्याग का मार्ग अपनाया, वह सभी साधकों के लिए मार्गदर्शी  प्रेरणा स्रोत है।

बण्डू महाराज के प्रति हार्दिक श्रद्धान्जलि और कोटिशः नमन।

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