संतुलन और साम्य जरूरी है शरीर और प्रकृति के बीच

संतुलन और साम्य जरूरी है शरीर और प्रकृति के बीच

पिण्ड और ब्रह्माण्ड, शरीर और प्रकृति के बीच गहरा और सीधा रिश्ता है जो हर अंग-प्रत्यंग और परिवेशीय-खगोलीय एवं भौगोलिक घटनाओं को प्रभावित करता है। सीधी और सरल गणित यही है कि जिन तत्वों से जीव बना है उन्हीं तत्वों के विराट स्वरूप में प्रकृति भी अवस्थित है।

इसलिए जो परिवर्तन प्रकृति में विराट स्वरूप में चरम व्यापकता के साथ होते हैं उसी प्रकार के परिवर्तन जीवात्मा पर सूक्ष्म रूप में प्रभाव दिखाते हैं। प्रकृति और पुरुष के बीच का संबंध हो या परिवेश और शरीर का संबंध, हर पल दोनों में परस्पर होने वाले परिवर्तनों का दौर निरन्तर चलता रहता है।

इसे कभी महसूस किया जा सकता है और कभी नहीं। जो परिवर्तन सूक्ष्म होते हैं उन्हें जानने और समझने के लिए सूक्ष्म चेतना की आवश्यकता होती है। जो इंसान ध्यान और समाधि, ईष्ट बल तथा दिव्य ऊर्जा का संधान करते रहते हैं उनके लिए इनकी प्राप्ति और संकेतों को समझ पाने की क्षमता सहज होती है किन्तु स्थूल और मोटी बुद्धि के, पापी, व्यभिचारी, प्रदूषित व नकारात्मक मानसिकता वाले लोगों के लिए ब्रह्माण्ड और पिण्ड के मध्य तरंगायित संकेतों को समझना मुश्किल होता है।

यही कारण है कि ये स्थूल बुद्धि वाले लोग अपने पिण्ड को केवल हाड़-माँस का लोथड़ा मानकर चलते हैं और जिन्दगी भर इस भ्रम मेंं जीते रहते हैं कि यह शरीर ही सब कुछ है, शरीर से ऊपर और कुछ नहीं, इसलिए इसे जितना अधिक आनंद, सुख और भोग-विलास देते रहो, उतना यह हमें मजे देता रहेगा।

दैहिक स्तर पर प्राप्त होने वाला सभी प्रकार का आनंद केवल देह के धरातल पर ही रह जाता है वह मन-मस्तिष्क और आत्मा के धरातल को छू नहीं पाता। यही वजह है कि दैहिक उन्मुक्त भोग चाहने वालों को मरते दम तक भोग की अभिलाषा हर क्षण बनी रहती है और वे इसे पाने के लिए हरसंभव जतन करते रहते हैं चाहे इसके लिए किसी भी स्तर तक नीचे गिरना क्यों न पड़े अथवा कितना भी घृणित पाप ही क्यों न करना पड़े।

दैहिक सुख और भोग-विलास को सर्वस्व मान लेने वाले लोग देह को चाहे कितना अपने नियंत्रण में रखें लेकिन वह रह नहीं पाती। इसका मूल कारण यह है कि हम लोग जब तक प्रकृति के पंचतत्वों का मौलिक रूप में पुनर्भरण करते रहते हैं तभी तक देह की मौलिकता और परिपुष्टि बनी रहती है और इन सबके लिए प्रकृति के करीब रहने की अनिवार्यता स्वयंसिद्ध है।

जो इंसान प्रकृति से जितना अधिक करीब बना रहता है उसमें पंचतत्वों से लेकर सभी प्रकार के मानसिक और शारीरिक तत्वों की भरपूर आपूर्ति बिना किसी अवरोध के होती रहती है। और इससे हर जीव मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ एवं मस्त बना रहता है। प्रकृति और परिवेश से दूर रहने या जाने पर ही सभी प्रकार की समस्याएं सामने आती हैं।

हम सभी लोगों की इच्छा रहती है कि काया को कष्ट न हो, आरामतलबी और मस्ती में बाधा न आए, इसलिए हम प्रकृति में तभी तक स्वेच्छा से भ्रमण करते रहते हैं जब तक कि प्रकृति का माहौल हमारे अनुकूल अर्थात हमारे शरीर को सुहाना लगकर सुकून देने वाला हो।

जैसे ही प्रकृति शीत, गर्म या विपरीत अनुभव होती है हम अपने-अपने कृत्रिम दड़बों का सहारा लेकर भीतर घुस जाते हैं और शरीर के सुख को सर्वोपरि मान लिया करते हैं। चाहे सर्दी में हीटर हो या गर्मी में एयरकण्डीशण्ड।

हम अपने शरीर को सुख देने के लिए प्रकृति और हमारे बीच कुचालक तत्वों का परदा लगा देते हैं। जब तक हम इस कुचालक आवरण के भीतर बने रहते हैं तब तक हमारा दैहिक सुख बना रहता है लेकिन हर पल यह संभव नहीं है क्योंकि हर किसी के लिए बाहर निकलना और खुले में विचरण करना जरूरी है।

सामाजिक प्राणी मनुष्य के लिए गर्मी में सभी जगह एयरकण्डीशन कल्चर और सर्दी में हीटर एटमोस्फियर प्राप्त होना संभव नहीं है। और बिना बाहर निकले इंसान की जिन्दगी अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकती।

ऎसे में बहुत से लोग हैं जिनका प्रकृति से सीधा रिश्ता टूट सा जाता है और परिवेशीय हलचलों में वे ज्यादा समय तक ठहर नहीं पाते। एयरकण्डीशण्ड में थोड़ी देर बाहर निकलने की स्थिति सामने आने पर गर्मी-गर्मी का जप करते हुए पसीने से तरबतर हो जाते हैं, घबराहट बढ़ जाती है और हाँफने लगते हैं।

इन लोगों को लगता है कि जैसे दूसरी दुनिया में ही आ गए हों। यही स्थिति सर्दियों के दिनों में देखी जाती है। कुल मिलाकर बात यह कि जो लोग प्रकृति व परिवेश और अपने बीच किसी भी प्रकार के कृत्रिम कुचालक स्तर का निर्माण कर लिया करते हैं और अपने ही आवरण में जीने की कोशिश करते हैं उनके लिए परिवेश  भयावह समस्या बनकर उभर जाता है जहाँ वे आसानी से सामान्य जिन्दगी भी नहीं जी सकते।

इसका प्रतिकूल असर उनके शरीर पर यह पड़ता है कि सर्दी-गर्मी और हवाओं से बचाकर रखा जाने वाला शरीर किसी पैकिंग या बोरे की तरह होकर रह जाता है जिसे घर के कोनों में तो अच्छा लगता है लेकिन बाहर निकलते ही हर प्रकार की समस्या आरंभ हो जाती है।

इस किस्म के लोगों को हर बार अपने-अपने एसी दड़बों में घुसे रहना या एसी वाहनों मेंं ही दुबके रहना ही अच्छा लगता है। प्रकृति और परिवेश को ये लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते। और इस वजह से उनके शरीर की फीजिक्स और केमिस्ट्री से लेकर हर तरह की गणित डाँवाडोल होकर रह जाती है।

एक तरफ प्रकृति और परिवेश से पंचतत्वों का समय पर पुनर्भरण नहीं हो पाता, दूसरी ओर प्रकृति से बचे रहने की जुगत में शरीर भीतर ही भीतर खोखला भी होता जाता है और शारीरिक संरचनाओं का ऎसा बुरा घालमेल हो जाता है कि लगता है कि जैसे शरीर का कोई उपयोग ही नहीं है, केवल बोझ की ही तरह है और इसमें सुखद परिवर्तन आना चाहिए।

जब तक हमारा प्रकृति से सीधा रिश्ता नहीं जुड़ेगा, हमारे पिण्ड और ब्रह्माण्ड के बीच कोई समन्वय, सातत्य, संतुलन और साम्य नहीं होगा, तब तक देह को परिवेश में दुःखी होना ही है चाहे इसके लिए हम कितना ही कुछ कर लें। जीवन का आनंद चाहें तो प्रकृति के बीच रमण करना और प्रकृति का सान्निध्य पाने का प्रयास करें।