बहुरूपिये बाहुबलियों का पूरा संसार रहता है हमारे इर्द-गिर्द

बहुरूपिये बाहुबलियों का पूरा संसार रहता है हमारे इर्द-गिर्द

रोजाना इतने सारे बाहुबलियों की भीड़ से रूबरू होते रहे हैं कि बाहुबली देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती।  हमारे आस-पास के बाहुबलियों में इतनी अधिक ताकत है कि वे अपने बाहुओं का कमाल दिखाते हुए इंसानियत, सिद्धान्तों, आदर्शों, मूल्यों और सज्जनों तक की बलि चढ़ा देने से पीछे नहीं रहते।  मुद्राबली, कामबली, मूर्खताबली, पदबली, प्रतिष्ठाबली, मक्कारबली, धूर्तबली आदि का बाहुल्य ही इतना है कि बाहुबली इसके आगे फीकी है। कोई किसी का हाथ (बाहु) कहा जाता है, कोई किसी और का। और तो और ये बली खुद भी पूरे के पूरे किसी और के आदमी कहे जाते हैं। अब बताओ कि कहां जरूरत है बाहुबली देखने की।