हो गए हैं हम किंकर्तव्यविमूढ़ मूकद्रष्टा

हम सभी लोग हर दिन बहुत कुछ कर डालने की सोचते रहे हैं लेकिन कर नहीं पा रहे। ये हालात हमारे समझदार होने से लेकर पूरी जिन्दगी बने रहते हैं। सोचना कोई भी कर सकता है, इसमें न कोई रोक-टोक है, न कोई खर्च या परिश्रम। लेकिन करना अपने आप में कठिन है।

कई बार दृढ़ संकल्पित होकर कदम उठाते भी हैं तो परिवेशीय परिस्थितियां और कई सारे लोग ऎसे सामने आ धमकते हैं कि जो बाधाएं बनकर बीच राह अड़ जाते हैं। ऎसे में हमें रास्ता बदलने को विवश होना पड़ता है अथवा इन अवरोधों से संघर्ष करने में अपनी शक्ति खर्च करनी पड़ जाती है।

ये दोनों ही स्थितियां ऎसी हैं कि हम अपने लक्ष्य से काफी दूर होते चले जाते हैं और जिन्दगी का काफी कुछ समय व्यर्थ की बहसबाजी, लड़ाई-झगड़ों और संघर्षों, आरोप-प्रत्यारोपों, आलोचना और निन्दा आदि में जाया होने लगता है। समाज के निकम्मे और दुष्ट लोग यही तो चाहते हैं कि हम ऎसा कुछ न कर पाएं जैसा कि उल्लेखनीय हो।

इसका एक मूल कारण यह भी है कि जिस तरह की खेप आ रही है उसमें जीने का माद्दा ही नहीं दिखता, केवल अपने लिए जीने की हरचन्द कोशिश होने लगी है और वह भी दुनिया के उन सारे उपायों का उपयोग करते हुए जिन्हें षड़यंत्रों और कुटिलताओं के साथ धोखेबाजी में भी शामिल किया हुआ है।

परिवेशीय संवेदनहीन हालातों में हम सबकी स्थिति ही कुछ ऎसी हो गई है कि बहुत कुछ करने की इच्छा होने के बावजूद कुछ कर नहीं पाने का मलाल शैशव से लेकर वृद्धावस्था तक छाया रहता है और हम भीतर ही भीतर दुःखी होते रहते हैं।

कुछ अच्छा करने की कोशिश भी करें तो दूसरे लोग सहयोग नहीं करते। वे भले ही दिन-रात फालतू और आवाराओं की तरह इधर-उधर डोलते और मुँह मारते फिरेंगे, लेकिन जब काम की कोई बात आएगी, सहयोग की आवश्यकता पड़े तो मुँह फेरकर पिछवाड़ा दिखाते हुए चुपचाप खिसक लेंगे।

हालात सभी कामों और रचनात्मक प्रवृत्तियों में तकरीबन इसी प्रकार के हो चले हैं जहाँ अधिकांश लोग समाज और अपने क्षेत्र के लिए कुछ भी करना नहीं चाहते। इन लोगों के लिए जन्मभूमि और कर्मभूमि का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इनकी किसी भी प्रकार की आत्मीयता या आसक्ति नहीं होती चाहे जन्म या कर्म स्थान हो।

इनकी रुचि दोहन से भी आगे बढ़कर शोषण की रहा करती है और इसलिए इनकी निगाह में स्वार्थ ही भरा होता है। इससे इतर न सोच सकते हैं न कुछ कर सकते हैं। अक्सर देखा गया है कि किसी भी अच्छे काम की शुरूआत में रचनात्मक कर्मकर्ताओं का संगठन बनता है, समूह के रूप में सभी आगे आते हैं किन्तु जब थोड़ी की सफलता सामने आ जाती है तब इन लोगों में कुछ को छोड़कर शेष सभी को लोकेषणा का मोह जग जाता है और वे अपनी  ढपली अपना राग शुरू कर दिया करते हैं।

इन लोगों के लिए निष्काम सेवा व परोपकार के मूल्यों से कोई मतलब नहीं होता। फिर आजकल समाज-जीवन में एक नई महामारी आ गई है। काम कोई सा हो, सेवा का कोई सा क्षेत्र हो, हर कोई पहली ही बार में पूछ लेता है कि इससे क्या मिलेगा। मतलब मिलेगा तो आदमी हिलेगा, अन्यथा अधमरा पड़ा रहेगा, आवारा मवेशियों की तरह इधर-उधर मुँह मारता हुआ चक्कर काटता रहेगा, पर रचनात्मक सहयोग कुछ नहीं करेगा।

और जहाँ उसे भनक पड़ जाए कि कुछ न कुछ मिलेगा, वहाँ टूट पड़ेगा सारे हथकण्डों का इस्तेमाल करता हुआ। जिन लोगों के पास खूब सम्पदा है, अपार धन वैभव है, पद-प्रतिष्ठा है वे भी भिखारियों की तरह सोचते हैं कि क्या मिलेगा। इंसान के लिए इससे बड़ी शर्मनाक और दुर्भाग्यशाली सोच और क्या होगी कि जिसमें उसकी नींद तभी खुलेगी जब खाने-पीने और मौज उड़ाने के लिए कोई प्रबन्ध हों, हर कदम पर भरपूर पैसा हो तथा अतिथियों की तरह व्यवहार मिलता रहे। इस मामले में हमने कुंभकण को भी पछाड़ दिया है।

समाज में आज भी निष्काम सेवा वाले कर्मयोगियों की कोई कमी नहीं है लेकिन उन लोगों के सामने चुनौतियां खड़ी करने वाले बिकाऊ और दलालों की भी कमी नहीं। इस सामाजिक विषमता के कारण कोई रचनात्मक अच्छा कार्य धरातल पर कर दिखाना बड़ा ही मुश्किल प्रतीत होता है। हालांकि यह असंभव नहीं है किन्तु सम सामयिक हालात ही ऎसे हैं कि हमेशा कोई न कोई बाधा चुनौती देती हुई सामने लड़ती-भिड़ती रहती है।

बौद्धिक संपदा से भरे पूरे लोगों के लिए यह स्थिति आत्म पलायन की ओर रूख कर लिया करती है और जिसका खामियाजा समाज और देश को भुगतना पड़ता है। इस दृष्टि से सामाजिक और परिवेशीय रचनात्मकता का नीर-क्षीर अन्वेषण करें तो स्पष्ट रूप से यह बात निकलकर आएगी कि हमारी स्थिति किंकर्तव्यविमूढ़ उस आदमी की तरह हो गई है जिसके लिए मूकद्रष्टा होकर जीना ही निरापद है। वह अपने लिए थोड़ा-बहुत भले कर ले, किन्तु समाज और अपने क्षेत्र तथा देश के लिए करने की भावना से दूर ही रहना चाहता है।

उसका यह आत्म पलायन उसकी कमजोरी नहीं है बल्कि सामाजिक परिवेशीय विषमता और खुदगर्जी जन्य स्वार्थ संसार है। हम सभी अपनी आत्मा से यह प्रश्न पूछें कि हमारी स्थिति कुछ न कर पाने वाले इंसान की तरह क्यों हो गई है जहाँ हम सभी अच्छा और महत्वाकांक्षी सोचते हैं, संकल्प और प्रतिज्ञाएं भी लेते रहे हैं, फिर भी सब कुछ ठहरा-ठहरा सा क्यों है।

हमारी जिजीविषा की किश्तों-किश्तों में मृत्यु के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है। जब हम किसी के काम नहीं आ सकते, तो हमारे जीने का अर्थ ही क्या है। तहेदिल से स्वीकारना होगा कि हम मरे हुए लोग हैं जिनसे किसी को कोई आशा या अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। बिजूके और कठपुतलियाँ केवल देखने और मनोरंजन करने भर के लिए  हैं इससे ज्यादा उनका न कोई वजूद रहा है, न सम्मानजनक अस्तित्व।

1 thought on “हो गए हैं हम किंकर्तव्यविमूढ़ मूकद्रष्टा

  1. इस सच को स्वीकारें कि हम हो चुके हैं नाकारा और विवश …
    हम इतने अधिक विवश, पराधीन और पराश्रित होते जा रहे हैं कि औरों के लिए कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। चुपचाप सब कुछ देखते रहने की विवशता पता नहीं हमें कहाँ ले जाएगी। इस स्थिति में अपने सम्पर्कितों, परिचितों और नाते-रिश्तेदारों को किसी मुगालते में रखने की बजाय साफ-साफ यह कह दें कि हम तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाएंगे। इस परम सत्य को सार्वजनीन रूप से स्वीकार करने में ही हमारी और जगत की भलाई है। सच को दबाये रखकर हमारी गति-मुक्ति संभव है ही नहीं। – Dr.Deepak Acharya

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