बाबागिरि जिन्दाबाद, अंधभक्त अमर रहें

ऋषि-मुनियों से लेकर संत-महात्माओं, योगियों, सिद्धों, तपस्वियों आदि सभी ने लोगों को ईश्वर का मार्ग दिखाया। अपने पूर्ण जीवन के हर अवसर का उपयोग उन्होंने ईश्वर को पाने का रास्ता दिखाने में लगाया, ईश्वर का गुणगान करते हुए लोगों को भगवदीय धाराओं और सदाचार को अपनाने की शिक्षा देते हुए दिव्य जीवन की ओर मोड़ा।

तपस्वियों और सिद्धों, संत-महात्माओं और योगियों की इस पुरातन परंपरा ने लोगों को केवल कर्मकाण्ड और पूजा पद्धतियों के परिपालन तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि धर्म के मर्म को समझाया, अंधविश्वासों का खण्डन किया,  यथार्थ का बोध कराया, मर्यादित जीवन दृष्टि,  सदाचारों, मानवीय संवेदनाओं, आदर्शों आदि के बारे में बताया और इनका पूरा-पूरा पालन करने पर जोर दिया।

इन पुरातन मनीषियों ने केवल ईश्वर के स्तुतिगान को ही धर्म नहीं माना बल्कि निष्काम सेवा और परोपकार के साथ नर सेवा को नारायण सेवा निरूपित किया, धर्म के सभी लक्षणों को आत्मसात करने के बारे में बताया और यह स्पष्ट किया कि धर्म केवल कर्मकाण्ड या पूजा-पाठ का पर्याय नहीं है बल्कि धर्म का अर्थ दिव्य और मर्यादित जीवनचर्या के साथ जीवन निर्वाह करते हुए ईश्वर की प्राप्ति करना है और यह जीवन अपने ही अपने लिए नहीं बल्कि सृष्टि के कल्याण का पर्याय होना चाहिए।

धर्म साधना के मामले में आजकल दो तरह की धाराएँ चल रही हैं। धर्म को समझने और जानने वाले लोग पुरातन वैदिक, पौराणिक परंपराओं अथवा अपने-अपने कुल के धार्मिक रीति-रिवाजों और प्रथाओं के अनुसार परंपराओं का निर्वाह कर रहे हैं।

इन लोगों के लिए ईश्वर ही सर्वोपरि है और ईश्वर को पाने के लिए ये लोग पीढ़ियों से निर्धारित उपासना पद्धतियों तथा सभी कसौटियों पर खरी उतरी परंपराओं का निर्वाह कर रहे हैं। यह लोग भगवान के प्रति अनन्य श्रद्धा और भक्ति भाव से भरे हुए हैं और इनके लिए ईश्वर तथा ईश्वरीय मार्ग से ऊपर कुछ भी नहीं होता।

गुरुओं, संत-महात्माओं और धर्माधिकारियों का मूल कर्म ही यह है कि अपने समकालीन लोगों को धर्म के बारे में परिचय कराएं, धर्माचरण की शिक्षा दें ताकि लोकमंगल और विश्व कल्याण की भावना से परिपूरित समुदाय अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन करते हुए दुनिया के लिए कुछ कर सकें और करके जा सकें।

इन सभी गुरुओं और बाबाओं का यही एकमात्र धर्म है कि लोगों को धर्म, सत्य और न्याय की शिक्षा दें और ईश्वर को पाने का मार्ग दिखाएं। पर आजकल के बाबा आम लोगों को भगवान से भटकाने में लगे हुए हैं। जो संत-महात्मा, बाबा, योगी आदि ईश्वर और जीव के बीच संबंध स्थापित कराने वाले सेतु हुआ करते थे वे स्वयं लक्ष्य हो गए हैं और सेतु की बजाय उपास्यदेव के रूप में अपने को स्थापित करने लगे हैं। इन बाबाओं के कारण से धर्म-अध्यात्म में ईश्वर गौण होता जा रहा है, बाबा लोग प्राथमिक आराध्य के रूप में प्रतिष्ठित होते जा रहे हैं।

ये बाबा भगवान की बजाय स्वयं को भगवान मानने और मनवाने के लिए जो कुछ कर रहे हैं वह हमारे पूरे के पूरे धार्मिक इतिहास को कलंकित करने वाला है। असली साधक और सिद्ध संत-महात्मा हाशिये पर हैं और नकली बाबाओं की जितनी जमातें इस कलिकाल में हर तरफ पसरी हुई दिखने लगी हैं वह अपने आप में सामाजिक अभिशाप से कम नहीं है।

प्राच्य परंपराओं की रक्षा के नाम पर फल-फूल रहे धर्म के ठेकेदार और समूह भी कभी राज्याश्रय और कभी मुद्राश्रय पाने के लोभ में स्वयंभू भगवान बन बैठे  बाबाओं की अनुचरी में लगे हुए हैं। इन लोगों को धर्म या उसके मर्म से कुछ लेना-देना नहीं है, तत्कालीन लाभ के लिए ये लोग कुछ भी करने-कराने, दिखने-दिखाने को आमादा रहने लगे हैं।

लोभ-लालच और किसी न किसी काम के करने-करवाने या कि छिपने-छिपाने के लिए आजकल धर्म के नाम पर जो कुछ हो रहा है वह किसी से छिपा हुआ नहीं है।  इन बाबाओं ने धर्मभीरू लोगों को ईश्वर के रास्ते से भटका कर अपने-अपने संकीर्ण बाड़ों में कैद कर रखा है जहाँ धर्म से लेकर जीवन तक की सारी व्याख्याएं अपने आप में विचित्र, वीभत्स और विस्मयकारी सब कुछ है।

लगता है कि धर्म के नाम पर सब तरफ अपनी-अपनी कंपनियां, अपने-अपने धंधे और गोरखधंधें फल-फूल रहे हैं। ऎसा हो भी क्यों नहीं, भारतीय जनमानस में श्रद्धा और विश्वास की जड़ें गहरे तक वि़द्यमान हैं और इसका ही फायदा ये धंधेबाज, भोग-विलासी और आरामतलबी बाबा लोग जमकर उठा रहे हैं।

जनता को भ्रमित करने, असत्य को प्रतिष्ठित करने और अपनी चवन्नियां चलाने में इन बाबाओं को मैनजमेंट गुरुओं का पितामह ही कहा जा सकता है। वेद, पुराण, उपनिषद, धर्मग्रंथ, संस्कृति, परंपराओं और सभी प्रकार की मर्यादाओं से दूर अब अपने देश में बाबाओं के रूप में इतने सारे भगवानों का अवतरण हो चुका है कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

असंख्य अवतार हमारे बीच में हैं जो अपने आपको भगवान सिद्ध करते हुए पूरे देश की धार्मिक जनता को भ्रमित किए हुए हैं। जिस किसी बाबा को देखा जाए वह अपने आपकी ही प्रशस्ति गाने और करवाने में मस्त है, ईश्वर से उसे कोई सरोकार नहीं है। और प्रचार का व्यामोह भी इतना ही सब कुछ हाईटेक होता चला जा रहा है।

भक्तों की स्थिति भी भ्रमजाल से घिरी हुई है, न धर्म का पता है, न परंपराओं का। भेड़चाल के मामले में हम लोग यों भी प्रसिद्ध हैं। असल में हमारे शत्रु ये ही लोग हैं जो कि भगवान से भटका कर हम सभी को पेण्डुलम बनाए  रखना चाहते हैं, हममें से बहुत सारे लोग न घर के रहे हैं, न घाट के।

हम सभी लोग अपने छोटे-छोटे स्वार्थों, लोभ-लालच और बिना मेहनत किए सब कुछ पा जाने के फेर में इन बाबाओं के चक्कर में भटकने लगे हैं। बाबा लोग भी हमारी कमजोरियाें का फायदा उठाकर हमारा जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं।

हम जैसे लोग और कहाँ मिलेंगे जो धर्म के नाम  पर हर बात को हाँ-जी, हाँ जी कर स्वीकार भी करते हैं और श्रद्धा भक्ति के साथ नत मस्तक होते हुए सारी लाज-शरम छोड़कर हर प्रकार से समर्पित भी हो जाते हैं। धर्म के मामले में केन्द्र से न भटकें, ईश्वर का मार्ग अपनाएं ताकि बाबाओं के नरक मार्ग से छुटकारा मिल सके।

संसार त्याग वैरागी होकर भी सारा संसार अपने पास कैद रखने की ऎषणा रखने वाले, खुद को पूजवाने वाले, पैसे जमा करने-करवाने वाले और आश्रमों के नाम पर आलीशान आवास बना कर भोग-विलास के सारे संसाधनों और लोगों का उन्मुक्त आनंद लेने वाले काहे के बाबा।

बचें-बचाएं बाबाओं से, और परमात्मा की शरण प्राप्त करें ताकि न बार-बार बाबा बदलने पड़ें, न दुःखी और निराश होना पड़े। पुरुषार्थ में विश्वास रखें, निष्काम भाव से सेवा और परोपकार करें और जगत के कल्याण का कोई न कोई मार्ग अपना लें। 

यह निश्चित मान कर कर चलें कि ब्रह्माण्ड भर में कोई ऎसा बाबा नहीं है जो बिना मेहनत किए धनवान बना डालें, रूप-सौन्दर्य का स्वामी बना सके, पद-प्रतिष्ठा और वैभव दिला सके। परमात्मा की कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं है। बाबा लोग भ्रमित करते हुए टाईमपास करते-कराते हैं और अपने उल्लू सीधे करते रहते हैं। कुछ पाने के लिए मेहनत और त्याग हमें ही करना होगा।

वे युग नहीं रहे जब हमारा लक्ष्य मुक्ति या ईश्वर प्राप्ति हुआ करता था और भगवान को पाने के लिए हम सांसारिक कामनाओं, वासनाओं और ऎषणाओं से ऊपर उठकर संसार में रहते हुए भी जल कमलवत रहा करते थे और श्रद्धा-भक्ति एवं साधना का मार्ग अपना कर आत्म कल्याण भी करते रहे हैं और जगत का कल्याण भी।

अब धूर्त, पाखण्डी, लोभी-लालची बाबाओं ने धर्म, अध्यात्म, संस्कृति और समाज के साथ-साथ देश का कबाड़ा करके रख दिया है। कुछ निष्ठावान और निस्पृह, विरक्त और सच्चे संतों को छोड़ दिया जाए तो सारे के सारे बाबाओं की जमात को आलीशान आश्रम, एयरकण्डीशण्ड आवास और वाहन चाहिएं, अकूत सम्पदा का स्वामी होने का  गौरव चाहिए, चेले-चेलियों की लम्बी फौज चाहिए और वह सब चाहिए जो एक गृहस्थ से भी आगे बढ़कर भोगियों और विलासियों को चाहिए।

इस मामले में संसार को त्याग कर वैराग्य पा चुके बाबाओं ने गृहस्थियों और ऎय्याशों तक को पीछे छोड़ दिया है। अधिकांश बाबाओं के लिए मन्दिर और आश्रम निर्माण, विकास एवं विस्तार, पदार्थों के प्रति आसक्ति रखते हुए जड़ तत्वों की संरचना और इन्हीं में रमण करने का आनन्द भाव प्रबल हो रहा है। उपासना, भक्ति या साधना के नाम पर ये बाबा लोग जीरो हैं किन्तु विलासिता के मामले में बड़े-बड़े धन्ना सेठों और वैभवशालियों को भी पीछे छोड़ देते लगते हैं।

एक समय था जब राज दरबारी बाबाओं के चक्कर काटते थे और आशीर्वाद पाते थे। एक समय आज का है जब बाबा लोग अपनी प्रतिष्ठा, पैसों और शिष्य-शिष्याओं की भीड़ जमा करने के लिए नेताओं के पीछे भागते और उनके साथ रहते नज़र आते हैं। इन बाबाओं को क्या कहा जाए। और तो और ये बाबा लोग ऎसे-ऎसे लोगों को आशीर्वाद देते नज़र आते हैं जिन लोगों को समझदार, ईमानदार और शुचितापूर्ण व्यक्तित्व वाले लोग हेय दृष्टि से देखते हैं।

अब न कहीं विरक्ति के भाव दिखते हैं, न वैराग्य के। सब कुछ गुड़-गोबर हो चला है। धर्मान्ध मूर्खों और धर्म के नाम पर पैसा लुटाने वाले उल्लुओं की पीठ पर सवार होकर ये बाबा लोग धर्म को कहाँ ले जा रहे हैं किसी को पता नहीं। 

इस मामले में देवरहा बाबा, स्वामी रामसुखदास जी महाराज और दूसरे सारे संतों की परंपरा करीब-करीब खत्म होती ही दिखती है। संत के बारे में स्पष्ट कहा गया है कि जिनमें पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा किंचित मात्र भी न हो, वे ही असली संत हैं। इन असली संतों को न पैसा या आश्रम चाहिए और न पब्लिसिटी। संतों के लिए परमात्मा ही सर्वोपरि होता है, दूसरे कोई सांसारिक कभी नहीं।

पीड़ित मानवता की सेवा, समाज के जरूरतमन्द गरीबों की आवश्यकताओं की पूर्ति, अभावों से परेशान लोगों को दुःख-दर्द और पीड़ाओं से मुक्ति दिलाने, स्थानीय स्तर पर स्थायी सेवा प्रकल्पों के संचालन, गौवंश के संरक्षण और विकास जैसी सारी बातें इन बाबाओं के लिए बेमानी हैं।

इन्हें चाहिए केवल भोग-विलास, भगवान के नाम पर प्रतिष्ठा और धर्म के मर्म से नावाकिफ लोगों को उल्लू बनाकर अकूत धन-सम्पदा जमा करना। सच कहा जाए तो इन बाबाओं ने समाज, देश, धर्म-अध्यात्म और संस्कृति का कबाड़ा करके रख दिया है और इसमें भागीदारी निभा रहे हैं वे पण्डे और पण्डित, अंधानुचर और कारोबारी, जिनकी दुकानें इन बाबाओं के कारण चल निकली हैं और पीढ़ियों तक के लिए हो चुका है जमीन-जायदाद और सम्पदा का भरपूर इंतजाम।

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