प्रतिस्पर्धामुक्त रहने ध्रुवीकरण से बचें

अजातशत्रु, सर्वस्पर्शी, हृदयसम्राट, लोकप्रिय, लोकनायक, लोकमान्य, पूजनीय आदि शब्द इतने अधिक भारी-भरकम हैं कि हर कोई इसे संभाल कर रख नहीं सकता और जिन लोगों के लिए बोले जाते हैं वे भी इसके काबिल नहीं होते क्योंकि इंसानों की पूरी की पूरी प्रजाति कभी पूर्ण दैवीय या पूर्ण आसुरी नहीं हो सकती।

यह अनुपात कभी कम-ज्यादा हो  सकता है किन्तु सम्पूर्णता में नहीं आ पाता। कारण कि इंसान ही ऎसा सामाजिक प्राणी है जिसके सारी हदें पार कर असामाजिक होने की पूरी की पूरी संभावनाएं हर पल बनी रहती हैंं।

अपने स्वार्थ और ऎषणाओं की पूर्ति में कब किसका आसुरी भाव जग जाए, कब कोई चुपचाप किसी तरह की खुराफात कर डाले, कोई सा षड़यंत्र रच डाले, यह कहा नहीं जा सकता। कारण यह कि इंसान के पास वो सारी शक्तियाँ हैं जिन्हें वह हरदम आजमाता रहता है और अपने उल्लू सीधे करता रहता है।

 

कोई इंसान अपने स्वभाव, मनोवृत्ति और मौलिक रूप में कितना ही उच्चस्तर का वैश्विक चिन्तन और उदारवाद से भरा क्यों न हो, निचले दर्जे की सोच रखने वाले संकीर्ण और पशुबुद्धि लोग केवल चरना ही जानते हैं।

उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि वे जो चर रहे हैं, वह कहीं चोरी की श्रेणी में है और कहीं डकैती या लूट-खसोट की। इन्हें चरने के लिए आक्षितिज पसरा हुआ चारागाह चाहिए। आदमी की क्षमताओं का ही कमाल है कि वह जहाँ-जहाँ गया है वहाँ-वहाँ सत्यानाश करता भी आया है और सत्यानाशी के बीज भी बोता चला आया है।

हमारी किसी से कोई आसक्ति न हो, किसी से राग-द्वेष न हो, स्वार्थ या विरोध न हो, बावजूद इसके यदि हम किसी एक ध्रुव से बंध जाएं या कोई हमें अपने पाले में शामिल दिखा दे अथवा हमारे बारे में यह प्रचारित हो जाए कि किसी एक ध्रुव के करीब हो गए हैं तब स्वाभाविक रूप से दूसरे सभी ध्रुव हमसे सायास दूरी बना लेते हैं।

बात किसी व्यक्ति की हो अथवा कोई सी संस्था की, यह शाश्वत सत्य है कि पेण्डुलम का कोई सा एक छोर कसकर पकड़ लेने या कि हमारी कोई सी एक पहचान ब

न जाने के बाद दूसरी सारी पहचानें समाप्त हो जाती हैं।

हम चाहे कितने अनासक्त, परम उदार, निरपेक्ष-तटस्थ, सर्वजन सुखाय – सर्वजन हिताय से लेकर आत्मवत् सर्वभूतेषु या तत्वमसि तक की बातों को पूर्ण आत्मसात ही क्यों न किए हों, सच यही है कि किसी एक व्यक्ति या संस्था, समूह, गिरोह आदि का किसी भी प्रकार का सामीप्य और सान्निध्य पा लेने के बाद हमारी सार्वजनीन औदार्य तथा सबके लिए जीने वाली पहचान समाप्त हो जाती है।

यह वह अवस्था है जब हमारा ध्रुवीकरण हो जाता है। कुछ लोग जो हमारी विचारधाराओं वाले होते हैं वे ऊपर से प्रसन्न जरूर हो जाते हैं उनके खेमे में हमें पाकर। लेकिन बहुसंख्य दूसरे  लोग भी हैं, दूसरी संस्थाएं भी हैं जो हमसे केवल इसीलिए दूरी बना लेती हैं कि हम किसी एक ध्रुव से चिपक गए हैं या लोगों ने यह मान लिया है कि हम किसी न किसी एक पाले के होकर रह गए हैं।

खासकर राजनैतिक क्षेत्रों में इस प्रकार की धारणाओं का न कोई अंत है, न पार। व्यक्ति, समुदाय और क्षेत्र सभी में मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना वाली स्थिति है। समझदारों का अकाल होता जा रहा है और दो कौड़ी के टुच्चे, लुच्चे, लफंगे और उठाईगिरे बढ़ते जा रहे हैं जिन्हें न कुछ समझ आता है, न समझना चाहते हैं।

सिर्फ अपनी दुकानदारी चलाना, दलाली और कमीशनखोरी के साथ तरह-तरह के कामों को करवाने का ठेका चलाते रहना ही इनकी जिन्दगी हो गया है।

मूर्खों और भौंदुओं के साथ ही चापलुसों की जमातों का जमघट है जो अपने आकाओं के इशारों पर वो हर हरकत कर गुजरते हैं जो नचैयों और पालतु या जंगली जानवरों के लक्षणों में गिनी जाती है या फिर मदारियों, जमूरों और तमाशबीनों की श्रेणी में।

इन लोगों के लिए किसी को समझ पाना इतना ही मुश्किल है जितना इन्हें अपने आपको समझ पाना। यही कारण है कि ये लोग हमेशा किसी न किसी के पीछे पड़े रहकर उसकी नि

न्दा करते रहते हैं, उसका बुरा करने के ताने-बाने बुनते रहते हैं और हर क्षण यही कोशिश करते रहते हैं कि किस तरह किसी का नुकसान कर खुशी प्राप्त की जाए। इनको खुशी औरों का बिगाड़ा करने पर ही प्राप्त होती है। फिर कचरे की तरह एक कचरा कहीं दिख जाता है तो दूसरे सारे कचरों को आमंत्रित करता हुआ उस स्थल को कचरा पात्र ही बना डालता है। आकल सब जगह ऎसे कचरापात्रों और कचराछाप टाईमपास लोगों की भरमार है।

जिस समाज और क्षेत्र में इस तरह की नकारात्मक और विध्वंसक मनोवृत्ति वाले वज्रमूर्खों, पुरुषार्थहीनों और विघ्नसंतोषियों की भरमार हो, वहाँ कोई भी आदमी कितना ही अच्छा, सच्चा और मंगलकारी क्यों न हो, उसे समझने वाले लोगों का अकाल ही बना रहता है।

इन परिवेशीय विषम हालातों में सर्वाधिक आवश्यकता इस बात की है कि हम किसी वाद, विचारधारा, व्यक्ति या संस्था से बंधकर ऎसी कोई पहचान कायम न करें जिससे कि हमारा ध्रुवीकरण हो जाए और कुछ लोगों के समूह या गिरोह से जुड़ने की पहचान बन जाए, शेष लोग हमसे अपने आप दूर हो जाएं।

ध्रुवीकरण होते ही दूसरे सभी लोगों में उन्मुक्त टांगखिंचाई वाली घृणित प्रतिस्पर्धा के भाव जग जाते हैं। यहां तक कि अपने गिरोह या समूह के लोग भी भीतर ही भीतर प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं। इस तरह अन्दर-बाहर की प्रतिस्पर्धाओं के खेल इतने अधिक षड़यंत्रों से भर जाते हैं कि अन्ततोगत्वा वार्धक्यावस्था में पहुंचने के बाद हमें लगता है कि इससे तो अकेले ही ठीक थे। पर तब तक  इस परम सत्य को समझने में बहुत देर हो चुकी होती है।

अपने वैयक्तिक श्रेष्ठ एवं अन्यतम वजूद को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि ध्रुवीकरण और प्रतिस्पर्धा के मायावी माहौल से बचें और तटस्थ रहकर अपने कर्तव्य कर्मों का पूरी ईमानदारी के साथ निर्वहन करते रहें।

वास्तव में देखा जाए तो एकान्तिक साधना के इसी मार्ग को अपना कर हम समाज और दुनिया को कुछ ऎसी ठोस उपलब्धि दे सकने की स्थिति में आ सकते हैं कि यह अविस्मरणीय यादगार  बनी रहे। मायावी प्रपंचों और तात्कालिक आत्ममुग्धता भरे सुकून से परे होकर जीने का आनंद वे ही लोग जान सकते हैं जो जीवन और जगत का मर्म समझ चुके हैं।