कामवाली बाइयों का कमाल, तरोताजा रखती हैं मालकिनों को

ये कामवाली बाइयां न होती तो जाने कितनी गृह स्वामिनियां बीमारी से ग्रस्त रहती। अक्सर जब भी काम वाली बाई काम करने के लिए घर में आती है, गृह स्वामिनियां चाहे कुछ भी कर रही हों, खाना खा रही हों या विश्राम कर रही हों, पूजा-पाठ में व्यस्त हों, आराम फरमा रही हों अथवा और कोई सा कितना ही जरूरी काम कर रही हों, सब कुछ छोड़-छाड़ के आ ही जाएंगी वहाँ, और वहीं खड़ी-खड़ी बातें करती रहेंगी । यह वह क्षण होता है जिसमें बतरस का ऎसा समन्दर बह निकलता है जिसकी किसी दूसरे आनंद से कोई तुलना नहीं की जा सकती। काम वाली बाइयों के श्रीमुख से दुनिया जहान की सारी बातें सुनने की उत्सुकता, जिज्ञासा और आनंद का यह ज्वार ही ऎसा है कि इसके आगे दुनिया कुछ भी नहीं है। फिर अपने घर की बीते 24 घण्टों की सारी बातें और भड़ास निकालने का इससे अच्छा स्वर्णिम अवसर और कोई होता ही नहीं। काम वाली बाई अपने आपको परम सौभाग्यशाली मानती हैं कि मेम साहब या बाईजी उसे कितना प्यार देती हैं, कितना गहरे से अपना समझती हैं, तभी तो सारी बातें शेयर कर लिया करती हैं। उधर मेम साहब या बाईजी भी खुश, एक तो घर बैठे सारी दुनिया की बातें उनकी मुट्ठी में आ जाती हैं और अपने घर की सारी भडास भी पूरे आनंद के साथ परोस दी जाती है। यह वह क्षण होता है जिसमें परमात्मा या घर का कोई सदस्य भी कुछ कहे या बुलाए तो सुनाई नहीं देता। इसे ही कहा जाता है – परस्परोपग्रहोपजीवानाम् ……। कुछ घरों में देखा गया है जो काम वाली बाई काम करती है, वो कम सुनती है। इसके बावजूद वह बिना बात के बोले जाती है। उसे यह लगता है कि और लोग भी उसकी तरह बहरे हैं इसलिए जोर-जोर से बोलती है पर यह परस्पर संवाद श्रृंखला कायम नहीं कर पाती। वह बोलती कुछ और है, सुनाई कुछ और देता है। जब तक जवाब दो तब तक विषयान्तर हो जाता है। कई मामलों में मैम साहब या बाईजी भी कम सुनने वाली होती है।  जहां दोनों ही कम सुनने वाले आपस में बतिया रहे हों, तब तो सारा मोहल्ला ही चर्चा में शामिल हो जाता है।