लिया ही लिया है या कुछ दिया भी है

लिया ही लिया है या कुछ दिया भी है

हम क्या हैं, क्या कर रहे हैं? इसके बारे में सब जानते हैं। हमें यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि हमारे करम किस तरह के रहे हैं या हम कैसे हैं। इसे वे सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं जो हमारे आस-पास रहते हैं या हमें जानते हैं।

इन लोगों के सामने हमें आँकने के बहुत सारे सटीक पैमाने हैं जिनके आधार पर ये हमारी गहराई, औकात और समाज को हमारी देन के बारे में खरा-खरा मूल्यांकन करते रहते हैं।

हालांकि अधिकांश लोग अपने आपको सकारात्मक, सर्वहितैषी और मधुरभाषी जताने के फेर में कभी भी इस सत्य का उद्घाटन हमारे सामने नहीं करते कि वे हमारे बारे में क्या सोच रखते हैं। फिर इन लोगों में सत्य को कह पाने का साहस भी नहीं होता।

कुछ फीसदी ही नैष्ठिक खरे और साहसी लोग अब बचे रह गए हैं जो किसी के भी बारे में खरा-खरा बोल देने के आदी हैं और उसके बाद भूल जाते हैं। इन्हें सामने वाला जैसा दिखता और अनुभव होता है, उसे साफ-साफ कह डालते हैं और दिमाग से निकाल देकर हमेशा के लिए मुक्त हो जाते हैं।

इन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि कोई उनके नग्न सत्य के प्रकटीकरण से नाराज हो जाएगा अथवा खुश। इनका किसी से न कोई लेना होता है, न देना। हर तरह से निरपेक्ष और निर्भय इन्सान ही सत्य बोल पाते हैं अन्यथा झूठे, झूठन पर पलने वाले, औरों के तलवे चाटने वाले और अपने भविष्य को लेकर सदैव आशंकित रहने वाले लोग अपनी पूरी जिन्दगी में एक भी सत्य अभिव्यक्त नहीं कर पाते।

कारण भी साफ है। जो सत्य और धर्म का परिपालन नहीं करता, वह न सत्य बोल सकता है, न ही सत्य में आस्था रखने वालों के साथ रह पाता है। हर झूठा आदमी सत्यवान का धुर विरोधी रहेगा ही रहेगा। यह स्वाभाविक मानवी लक्षण है।

इसी तरह सत्यवान और सती सावित्री का भी गहरा संबंध है। यह केवल कथा ही नहीं है बल्कि दोनों ही पात्रों का संबंध ही ऎसा है कि जो सत्यवान होगा उसी के साथ सती सावित्री होगी जो यमराज के पाश से भी जीवात्मा को निकाल ले आती है।

सत्य की ताकत से बेखबर और असत्याचरण में रमे हुए लोगों के लिए सत्य शब्द पराया या अनसुना ही रहता है और जिन्दगी भर ये लोग झूठ का आश्रय पाते हुए झूठों के कुनबों और कबीलों में धींगामस्ती करते रहते हैं।

जो सत्याश्रयी होते हैं वे जगत के कल्याण का मार्ग अपनाते हैं क्योंकि इन्हें पता होता है कि लोकमंगल और जग उत्थान का कार्य भगवदीय परंपरा का है और इसी के लिए उन्होंने पृथ्वी पर मनुष्य की योनि प्राप्त की है।

हम सभी लोगों को अपने आप पर कई तरह का अहंकार, उन्माद और मद होता है। धन-वैभव और सम्पदा, पद-प्रतिष्ठा-प्रभाव, आयातित और परायी शक्तियों का घमण्ड,  तरह-तरह का सुरसाई अहंकार और इतना सब कुछ होता है कि हम अपने आपको महान, अद्वितीय और अन्यतम मानते हुए आत्ममुग्ध होकर इस प्रकार जीने लगते हैं कि हमारे सामने दूसरे  लोग और दुनिया बौनी नज़र आती है।

हम किसी को न कुछ समझते हैं, न मानते। हम ही हम सभी जगह दिखने-दिखाने, छाने और हर तरह का लाभ पाने सभी जगह नज़र आने लगते हैं और अपनी ही अपनी मान-बड़ाई और पूछ करवाने के लिए ताजिन्दगी भिड़े रहते हैं।

आत्मप्रचार और स्वकीर्ति की कामनाओं के पाश से बंधे होकर हम पूरी जिन्दगी जाने कितने जायज-नाजायज संबंधों, समझौतों और समीकरणों के आधार पर अपने जीवन की गणित का सोचा-समझा हुआ संतुलन बिठाने के फेर में रमे रहते हैं लेकिन कभी यह प्रयास नहीं करते कि हमारे पास जो ज्ञान, प्रतिभा, हुनर, अनुभव और विलक्षण गुणधर्म हैं उन्हें पात्र व्यक्तियों तक पहुंचा कर उन्हें योग्य बनाएं ताकि वे हमारे जीवित रहते हुए सहयोगी के रूप में साथ दें और हमारे राम नाम सत्य हो जाने के बाद समाज के काम आएं।

हमारे मन में यदि यह भावना हो कि हम ही हम रहें, और कोई न दिखे, न टिके। तो यह मान लेना चाहिए कि हम अव्वल दर्जे के खुदगर्ज हैं और समाज व राष्ट्र के लिए घातक हैं।

जो इंसान समाज और देश के लिए नहीं जीता, अपने ज्ञान, हुनर और अनुभवों का आने वाली पीढ़ियों तक संवहित करने के प्रयास नहीं करता, सारा ज्ञान, अनुभव, धन आदि अपने पास ही रोक रखता है वह समाज का भी अपराधी है और मातृभूमि का भी।

हमारी महानता खुद को हमेशा महान बनाए रखने, असंख्य पुरस्कार, सम्मान, अभिनंदन पाने, बेहिसाब सम्पत्ति और संसाधन जमा करने में नहीं है बल्कि इसमें है कि समाज और देश को हमारी देन क्या है। हमने क्या दिया है और क्या देकर जा रहे हैं?

बहुत से लोग हमारी ही तरह खुदगर्ज, स्वार्थी और स्वयंभू थे लेकिन समाज और देश को कुछ नहीं दे गए। उन्हें कोई याद नहीं करता। बल्कि उनके घर-परिवार वालों तक को उनकी जन्मतिथि, पुण्यतिथि, श्राद्ध तिथि आदि कुछ भी याद नहीं है।

हम भी इसी श्रेणी में शुमार होंगे यदि हमने अपनी खुदगर्जी और मक्कारी नहीं छोड़ी।  हम जिस क्षेत्र में हैं वहाँ हमारे बाद शून्य, विराम या शिथिलता आ जाए तो यह समझ लेना चाहिए कि हमारा पूरा जीवन बेकार है और जो कुछ जिया है वह केवल अपने ही लिए जिया है, समाज और देश के लिए नहीं।

ज्ञान, हुनर और अनुभवों का संचरण आगे से आगे आने वाली पीढ़ियों में नहीं हो पाने से न हमारी गति-मुक्ति हो सकती है, न अच्छी योनि प्राप्त। जो लोग अपने ही अपने लिए जीते हैं उनके लिए भगवान ने भूत-प्रेतों, वंत्रियों को छूट दे रखी है कि वे हमें अपने कुनबे में शामिल कर अपनी संख्या बढ़ाते रहें।

हमारे जीवन की सफलता इसी में है कि हम अपनी तरह के योग्य लोगों को तैयार करें और उन्हें समाज व देश की सेवा में समर्पित करें। सच्ची समाजसेवा यही है और इसी कर्म से मातृभूमि का ऋण उतारा जा सकता है।

समाज और धरती का ऋण चुकाए बगैर हमारा कहीं ठिकाना नहीं है। इस बात को मनुष्य रहते हुए मान लें तो ठीक है अन्यथा भूत-पलीतों को हमसे खूब आशाएं हैं, जो कुछ साल बाद तो पूरी होंगी ही।