सदैव रहें आत्मस्थिति में

हर इंसान का अपना एक निर्धारित कवच होता है जो उसके दायरों को भी तय करता है तथा सदैव अपनी आत्म स्थिति में रखता है। आत्मस्थिति वह अवस्था है जिसमें हम पूर्ण रूप से मौलिक हुआ करते हैं और इस अवस्था में कोई सा बाहरी सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव किसी तरह का कोई असर नहीं दिखा सकता।

इंसान अपने इंसानी और आत्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण कवच से संरक्षित और दमकित होता है। इस अवस्था में परिवेशीय घटनाओं-दुर्घटनाओं से वह प्रभावित नहीं होता।

इसका यह आशय कदापि नहीं है कि वह संवेदनशील नहीं होता। इस अवस्था में तमाम प्रकार के उद्विग्नों, द्वन्द्वों और अन्यमनस्क अवस्थाओं से परे होने के बावजूद ज्ञान-बुद्धि और विवेक से इतना अधिक भरा-पूरा रहता है कि आवश्यकता पड़ने पर वह द्रष्टा के साथ ही कर्ता और स्रष्टा सभी प्रकार की भूमिकाओं को बखूबी निभा सकता है।

बाहरी उद्दीपनों और उत्प्रेरकों से अप्रभावित रहकर अपने कर्मयोग में रमे रहने की कला कुछ दशकों पहले तक इंसानी स्वभाव का मौलिक अंग इुआ करती थी।

उस जमाने के लोगों पर उन व्यक्तियों, व्यवहार या हवाओं का कभी कोई असर नहीं हुआ करता था जो उनके आत्म आनंद और कर्मयोग पर किसी तरह का घातक प्रभाव छोड़ सकते थे।

इन सभी बाहरी हलचलों से अप्रभावित रहकर अपने व्यक्तित्व और कर्मधाराओं की सुगंध के निरन्तर प्रसार में वे सिद्ध थे। लेकिन अब ऎसा नहीं रहा। जब से हम सभी ने अपने मन और आत्मा की बजाय बाहरी लोगों और जमाने को ही आईना मान लिया है तभी से हम सभी का भीतरी आनंद और आत्मा की चमक-दमक एवं शाश्वत शांति का अनुभव होना बंद हो चला है।

और हाल के वर्षों में तो हमारी सहिष्णुता, सहनशीलता, धीर-गंभीरता और माधुर्य का इतना अधिक ह्रास हो चला है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। बहुत थोड़े लोग बचे होंगे जो कि अपनी मौलिक अवस्था में जीने का आनंद पाते होंगे अन्यथा अधिकांश की हालत ऎसी हो गई है कि जैसे हवाएं बिजूकों को इधर-उधर डोलाती रहती हैं।

जमाने की हवाओें को ही अपने मूल्यांकन का आधार मानने की भूल के मारे हम सभी शर्मनाक हालातों में दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं। घर-गृहस्थी की झंझटों, मामूली विवादों, तुच्छ ऎषणाओं, लाभ-हानि के समीकरणों से लेकर चन्द व्यक्तियों से प्राप्त अच्छे-बुरे व्यवहार से प्रभावित हो जाते हैं और  इसका सीधा असर पड़ता है हमारी अपनी जीवनशैली पर।

अक्सर देखा जाता है कि बाहरी उद्दीपनों के कारण हम सर्वाधिक प्रभावित होकर अपनी मौलिक अवस्था का परित्याग कर दिया करते हैं और इसका असर ये होता है कि हमारा आत्म आनंद छिन्न-भिन्न हो जाता है और शांति का ताना-बाना बिखर उठता है।

हर इंसान की अपनी एक मौलिक आत्मस्थिति होती है और इसे कोई भी बाहरी कारक प्रभावित नहीं कर सकता। यदि इंसान अपनी इस आत्मस्थिति में हमेशा बने रहने का अभ्यास अपना ले तो फिर उसे जमाने  की कोई सी बात कभी भी प्रभावित नहीं कर सकती, चाहे कितनी ही अच्छी हो अथवा खराब। लाभकारी हो या घातक। क्योंकि उस अवस्था में इंसान का सीधा संबंध आत्मा के स्तर से जुड़ा होता है।

जो इंसान सदैव अपनी मौलिक आत्मस्थिति में रहने की आदत को अपना लेता है उसके लिए न कोई शत्रु होता है, न कोई मित्र। ऎसे लोग हमेशा अपने विशिष्ट और अनकहे, अवर्णनीय आत्म आनंद में निमग्न रहते हैं और इनकी सेहत पर किसी भी तरह का बाहरी प्रभाव नहीं पड़ता। चाहे वह किसी के बुरे बोल हों, उन्मादी व्यवहार हो या फिर परोक्ष-अपरोक्ष पागलपन अथवा अहंकारजनित विक्षिप्त अवस्था।

हमारे आस-पास और साथ तथा सम्पर्क में आने वाले बहुत से लोग हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके बोल हमेशा बिगड़े, काक भाषी रहा करते हैं और इसलिए आये दिन लोगों पर किसी न किसी बहाने बरसते रहते हैं।

इसी प्रकार बहुत सारे बड़े-बड़े कहे जाने वाले लोग महान और लोकप्रिय होते हैं लेकिन इनमें व्यवहार माधुर्य का अभाव रहता है, धींगामस्ती और धौंस जमाने के आदी हो जाते हैं तथा हर दिन किसी न किसी पर बरसने को ही जिन्दगी मान बैठे हैं।

इनमें भी खूब सारे भ्रष्ट, बेईमान और चोर-कामचोर होते हैं लेकिन दूसरों पर रौब जमाने के लिए ये कुछ न कुछ ऎसी हरकतें करते रहते हैं कि सामने वाले हैरान-परेशान हो उठते हैं।

इन विपरीत और विषम अवस्थाओं में सामान्य लोग बेचारे प्रभावित होकर दुःखी हो जाते हैं लेकिन जो लोग आत्मस्थिति में रहने का अभ्यास बना लेते हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि जो लोग गिद्धों, भेड़ियों और कुत्तों की तरह औरों पर टूट पड़ने को ही आदत बना चुके हैं वे भी कोई दूध के धुले हुए नहीं हैं और इसलिए उन लोगाें की कभी कोई परवाह नहीं करनी चाहिए जो किे नंगे-भूखे और लुटेरे हैं।

अपने आप को जानें, अपनी आत्मा को जानें तथा हमेशा मौलिक आत्म आनंद की प्राप्ति करने के लिए आत्मस्थिति में रहें।

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