बेकार है ये सारी धन-दौलत

दीपावली चली गई, और इसके साथ जुड़े दूसरे त्योहार भी जाने लगे हैं। खूब जतन किए हमने, लक्ष्मी मैया को अपने घर-द्वार के बाड़ों से बाँधे रखने, खुश करने के।

क्या-क्या नहीं किया हमने, अंसख्यों दीप जलाए, आँखों को चुँधिया देने वाली रोशनी का समन्दर उमड़ा दिया, रात भर जग-जग कर पूजा-पाठ और ढेराें जतन किए, पर लक्ष्मी मैया है कि न आई, न रुकी। आखिर लक्ष्मी जो चंचल ठहरी।

लक्ष्मी मंदिरों में नगाड़े-ढ़ोल बजाते हुए भजन किए, आरतियों पर झूमे और जोर-जोर से ’’जय लक्ष्मी मैया ’’ के गगनभेदी उद्घोष लगाए, खूब स्तुति गान किया, माईक, डीजे और स्पीकरों पर जमकर भजनों का आनंद लिया।

खुद भी किया लक्ष्मीपूजन और पण्डितों से भी करवाया। मंत्र पढ़े, मूर्तियों का मनोहारी श्रृंगार किया और इसी तरह दो-चार दिन लक्ष्मी पूजा की खूब धूम मचाते हुए क्या कुछ नहीं किया।

पता नहीं लक्ष्मी मैया हम पर रीझी या नहीं, पर इतना जरूर है कि हमने कोई कसर बाकी नहीं रखी। और कोई तिथि-पर्व, तीज-त्योहार होते तो हम इतना गंभीर कभी नहीं रहते। यह तो धन सम्पत्ति का मामला है और इसमें हम दूसरे सारे काम एक तरफ छोड़ कर पूरे मन से जुटते हैंं क्योंकि हम सभी लोग पैसों के दास हैं और हो भी क्यों नहीं।

आजकल पैसों के सिवाय और किसी कोई पूछ नहीं है। अधिकांश लोग पैसों के दीवाने हैं और पैसे पाने के लिए इनकी दीवानगी हर हद को पार कर जाती है। पैसों पर ही सारी दुनिया टिकी है और पैसे न हों तो जिन्दगी क्या, हम सभी का यह मानना हो गया है। और पैसों के लिए हम कभी भी, कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। हम खुद  उल्लू बनकर भी लक्ष्मी को पाने और अपने यहाँ कैद करने के लिए सदैव बेताब रहा करते हैं।

यों देखा जाएं तो लक्ष्मी मैया की पूजा केवल दीवाली के दिनों में ही नहीं बल्कि हम लोग रोजाना ही करते हैं। हमारे जेहन में हमेशा अकूत धन सम्पदा पाने की चाहत बनी रहती है और इसके लिए पाक-नापाक रास्ते अपनाते रहते हैं। बावजूद इसके हम अभी उतने तृप्त नहीं हो पाए हैं।

असल में हम हर बार लक्ष्मी उपासना के ढेरों जतन करते रहते हैं, लेकिन इनका हमें अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं हो पा रहा है। इसका मूल कारण यही है कि हम जिसे लक्ष्मी मान रहे हैं वह लक्ष्मी न होकर अलक्ष्मी ही है, जिसे पाने के लिए दिन-रात जतन कर रहे हैं और उपासना में जुटे हुए रहते हैं।

लक्ष्मी और अलक्ष्मी में जमीन-आसमान के फर्क  को समझना जरूरी है। हो यह रहा है कि हमारा अभीष्ट अलक्ष्मी हो गई है और उसे ही हम लक्ष्मी मान बैठे हैं। इस वजह से वास्तविक लक्ष्मी से हम दूर जा रहे हैं और लक्ष्मी के बहाने अलक्ष्मी पाने की ऎषणा पाले बैठे हुए हैं।

इन हालातों में लक्ष्मी कहाँ ठहरने वाली है। उसे पता है कि लोग आराधना तो उसकी कर रहे हैं, लेकिन उनके जेहन में वह सब कुछ है जो अलक्ष्मी की श्रेणी में आता है। लक्ष्मी को हम लोग बहुत ही संकीर्ण अर्थ में लेते रहे हैं।  लक्ष्मी का अर्थ हमने रुपए-पैसों, सोने-चाँदी आदि में सिमटा कर रख दिया है।

जबकि लक्ष्मी का अर्थ इंसान के लिए वह हर भोग विलास और ऎश्वर्य है जो जीवन के लक्ष्यों को पूरा करता है, जिन्दगी को आसान और आशातीत सफलता देता है और इनसे चरम स्तर की वह तृप्ति प्राप्त होती है जिसके बाद इंसान को कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। अलक्ष्मी को अपनी बनाए रखने और चोर-डकैतों, भ्रष्ट और रिश्वतखोरों, बिना मेहनत की कमाई करने वालों से बचाए रखने के लिए हमें खूब सारे जतन करने पड़ते हैं। अलक्ष्मी को अपने नाम किए रखने तथा अपने भण्डार में चोरी-छिपे कैद रखने के लिए चौकीदारी की जरूरपत पड़ती है, हर क्षण छीने या चोरी हो जाने का भय सताता रहता है और दिन का चैन, रातों की नींद हराम रहती है।

जबकि लक्ष्मी की कृपा जिन पर होती है, उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं होता। न तो लक्ष्मी चोरी हो सकती है, और न ही नष्ट हो सकती है। न ही इसे अपने पास बनाए रखने के लिए इन्स्पेक्टरी ऑक्टोपसों और गिद्धों से किसी भी प्रकार के अवैध समझौते और हीन समीकरण बिठाने की जरूरत पडती है। यह लक्ष्मीवान हमेशा निर्भय, मुदित और निरपेक्ष भावों से भरा रहता है।

अलक्ष्मीवान लोग अकूत धन-सम्पदा होने के बावजूद और अधिक प्राप्ति के लिए अपने जीवन आनंद को खोकर भिखारियों की तरह इधर-चक्कर चक्कर काटते और मिन्नते करते या कि अपने से बड़े वाले भिखारियों और चोर-डकैतों के आगे हाथ पसारते हुए, मिमियाते रहते हैं।

जबकि लक्ष्मीवान लोग इन सारे प्रपंचों, स्टन्टों और मक्कारी से दूर रहकर आत्म आनंद में निमग्न रहते हैं। और यही कारण है कि इन पुरुषार्थी और सच्चरित्रवान लोगों के पास लक्ष्मी प्रसन्नतापूर्वक रहती है।

यह लक्ष्मी ही है जो कि समाज के जरूरतमन्दों के लिए काम आती है, समाज और देश के लिए उपयोग में आती है और सुपात्रों को दान-पुण्य करने में उपयोगी सिद्ध होती है। जबकि अलक्ष्मी के दास न कभी दान कर सकते हैं, न पुण्य, और न कभी सत्कर्म में हिस्सेदारी।

असल में शुचिता और पुरुषार्थ से कमायी धन-सम्पदा ही व्यक्ति को पुण्य दे सकती है और समाज व राष्ट्र को वैभवशाली बनाने में भागीदारी निभा सकती है। यदि कोई समृद्ध और धनी-मानी इंसान समाज और देश के लिए धन का दान नहीं कर सकता, तो निश्चित मानना चाहिए कि उसका धन पुरुषार्थहीनता से भरा या लूटा-खसोटा हुआ अथवा हराम का ही है।

जिस पर लक्ष्मी मेहरबान होती है, वह सभी प्रकार से इतना ऎश्वर्यशाली होता है कि उसका मुकाबला दूसरा नहीं कर सकता। लक्ष्मीवान इंसान हर दृष्टि से संपन्न होता है। उसमें उदारता, संवेदनशीलता, परदुःखकातरता, सेवाव्रत और परोपकारी स्वभाव आदि सब कुछ दैवीय गुण आ जाते हैं। 

जिसमें यह दैवीय गुणों का अस्तित्व हो, वे ही लोग हैं जिन पर लक्ष्मी प्रसन्न होती है। अन्यथा जिनके पास अपार धन-संपदा, जमीन-जायदाद है, और इनके पास संतोष, प्रसन्नता, सदाचार, उदारता और सेवा भावना नहीं है, जो लोग सामान्य इंसान की तरह भी नहीं रह सकते, दवाइयों और दूआओं पर जिन्दा हैं, औरों की मेहरबानी, अनुकम्पात्मक करुणा और दया पर जीवन बसर कर रहे हैं, तन, मन और मस्तिष्क से मलीन हैं, जिनके चेहरों पर मलीनता, गुस्सा और जासूसों की तरह छिद्रान्वेषण वाली घातक अवतलता है, वे सारे लोग अलक्ष्मी वाले हैं जिनका धन ये अपने पर कभी खर्च नहीं कर पाएंगे, इनका धन या तो दूसरे लोग खा जाते हैं, चोरी चला जाने वाला है अथवा नष्ट हो जाने वाला।

आज ये लोग आज अपने आपको चाहे कितने अहंकारी और संप्रभु समझें, इनका जो हश्र होने वाला है उसकी कल्पना हम नहीं कर सकते।

बात सेहत की हो, जमीन जायदाद या प्रतिष्ठा की हो अथवा राजसी वैभव की, लक्ष्मीवान व्यक्ति हर मामले में समृद्ध, स्वस्थ्य, सुन्दर, आकर्षक और प्रभावशाली होता हैं। दौलतमंद होने का यह मतलब नहीं है कि हम करोड़ाें के स्वामी है और दो रोटी भी नहीं खा सकते, रात को नींद नहीं आती, बीमारियों के कारण परेशान हैं।

लोगों की निगाह में जो लोग भ्रष्ट, चोर-उचक्के, कमीशनखोर, हरामखोर, कामचोर, रिश्वतखोर हैं वे सारे अलक्ष्मीवान हैं। इन्हें प्राप्त प्रतिष्ठा और लोकप्रियता कालजयी न होकर कुछ समय के लिए होती है। चार दिन की यह चाँदनी कभी भी कलंकित कर घर बिठा देती है।

इनमें से बहुत सारे लोग हैं जिन्हें कोई पसंद नहीं करता। ये ही वे लोग हैं  जो  प्रतिष्ठाहीन हैं, अपनी संपदा के उपभोग से वंचित हैं और सिर्फ चौकीदारी और कबाड़ जमा करने तक ही सीमित रह गए हैं।

 लक्ष्मीवान होने का अर्थ है हर दृष्टि से स्वस्थ और मस्त होना, चित्त की निर्मलता और आभा मण्डल की शुभ्रता। असल में लक्ष्मी मैया को पाना चाहें तो अपने आप को शुद्ध-बुद्ध और पावन बनाएँ। लक्ष्मी वहीं रहती है जहाँ नारायण हों, इसलिए दरिद्र नारायण की सेवा करें तो लक्ष्मी अपने आप अपने पास आ ही जाएगी।

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