श्री अपनाएं

श्री अपनाएं

लोग धन-सम्पदा और संसार भर का पूरा का पूरा ऎश्वर्य पाने को तो उतावले रहते हैं लेकिन इसे पाने के लिए जिन रास्तों से होकर चलना चाहिए, उन्हें भुला दिया करते हैं। प्राचीनकाल से श्री प्राप्ति के द्वार खोलने वाला पासवर्ड रहा है श्री।  लेकिन अपनी संस्कृति और गौरवशाली परंपराओं के प्रति आत्महीनता रखने वाले मूर्खों, पाश्चात्यों के तलवे चाटने वाले और विदेशियों से इंसानियत का प्रमाण पत्र और प्रशस्ति पत्र पाकर खुश होने वाले लोगों ने अपनी पुरातन परंपराओं को भुला दिया है।

कुछ दशक पहले तक ही श्री का प्रयोग सभी प्रकार की बहियों, पोथियों और दस्तावेजों में सबसे पहले श्री का अंकन किया जाता था।  व्यवसायिक काम-काज में कई सारे दस्तावेज ऎसे होते थे जिन पर एकाधिक बार श्री लिखा जाता था।

श्री का दर्शन, श्रवण, लेखन और जप आदि सब कुछ कल्याणकारी होता है। श्री अपने आप में ऎश्वर्य, लक्ष्मी और वैभव आदि विलक्षणताओं का प्रतीक है। कुछ बरस से हम लोगाें ने विदेशियों की दासता स्वीकारते हुए हमारी सारी श्रेष्ठ परंपराओं को भुला दिया है। और इसमें यह श्री भी शामिल हो गया है।  हम सभी लोग काम-धंधे में समृद्धि की कामना करते हैं लेकिन समृद्धि पाने के बुनियीदी सिद्धान्तों को भुला दिया है। एक जमाना था जब लोग-बाग काले-गहने नीले वस्त्रों से परहेज रखा करते थे और श्वेत वस्त्र धारण किया करते थे ।

उस समय सफेद परिधानों को पसन्द करने वाले लोग कितने वैभवशाली, समृद्धिवान और आनंदमय हुआ करते थे। श्वेत वस्त्र चन्द्रमा, सूर्य और शुक्र तीनों ग्रहों का प्रभावी असर दर्शाता था आज वह सफेद परिधान बहुत कम देखने को मिलते हैं और उसी अनुपात में दैन्य स्वभाव, आलस्य और प्रमाद हम सभी पर छाने लगा है। इसी प्रकार श्री का महत्व हम भुला बैठे हैं जबकि श्री का जितना अधिक प्रयोग बोलने, लिखने , सुनने और देखने में आता है उतना ही इस एकाक्षर का प्रभाव बहुगुणित होता रहता है।

आजकल हमने कई लोगों के नामों, भवनों, संस्थाओं और प्रतिष्ठानों के आगे से श्री को दरकिनार कर दिया है। एक तरफ हम श्री की उपेक्षा भी कर रहे हैं और दूसरी तरफ श्री को पाने के लिए नाना प्रकार के जायज-नाजायज जतन भी करते रहते हैं। दुनिया के दूसरे जरूरी कर्म और फर्ज से भी अधिक हमने लक्ष्मी को मान लिया है लेकिन लक्ष्मी पाने के लिए जरूरी कारक तत्वों को हमने भुला दिया है। और इसी का नतीजा है कि हम लोग श्री हीन होते जा रहे हैं।  श्री से हीन होने के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं।  श्री अपने आप में लक्ष्मी का दूसरा नाम है और यदि श्री पर बिन्दी लगा दी जाए तो श्रीं हो जाता है जो कि भगवती लक्ष्मी मैया का बीज मंत्र ही बन जाता है।

इस बीज मंत्र को ही हम श्रद्धापूर्वक जपते रहें तो हमारी जिन्दगी मेंं धन की कमी के दूर होने के अनायास अवसर उपस्थित हो जाते हैं और इसका फायदा हमें मिलता ही है। जीवन में जहाँ कहीं श्री का प्रयोग होता है वहाँ भगवान की कृपा का आभास होने लगता है और प्रत्यक्ष अनुभव होता है। श्री का केवल प्रयोग ही नहीं होना चाहिए बल्कि श्री के मूल मर्म को आत्मसात करते हुए श्री का अधिकाधिक प्रयोग किया जाए तो जीवन में सफलता के मार्म अपने आप खुलते चले जाते हैं।

मंत्र शास्त्र के अनुसार माना जाता है कि किसी भी मंत्र को सिद्ध करना हो तो उस मंत्र में जितने अक्षर हैं उतने लाख जप  तथा दशांश क्रम में हवन, तर्पण, मार्जन, भोज आदि की आवश्यकता होती है। यदि इतना सब न भी कर सकें तो इसके अनुपात में थोड़े जप और कर लिए जाने पर मंत्र सिद्ध होता है और उसके बाद ही उसका जागरण होता है, मंत्र अपना प्रभाव उसके बाद ही दिखाना आरंभ करता है।

लोग लक्ष्मी प्राप्ति के लिए बड़े-बड़े मंत्र, अनुष्ठान, स्तेात्र आदि करते रहते हैं, उन्हें यह सब करना भी चाहिए लेकिन लक्ष्मी प्राप्ति का यह छोटा सा बीज मंत्र श्रीं एक-डेढ़ लाख जप में ही सिद्ध हो जाता है और अचूक प्रभाव छोड़ता है। इस एकाक्षरी मंत्र का प्रयोग बहुत कम समय में पूर्ण  हो जाता है। इसलिए जिन लोगों को श्री चाहिए, लक्ष्मी, प्रतिष्ठा और यश चाहिए उन लोगों को श्री का आदर-सम्मान व उपयोग करना चाहिए। इससे भी सिद्धि प्राप्ति की संभावनाओं को आकार प्राप्त हो सकता हैं।