सकारात्मक चिन्तन अपनाएं, छवि सकारात्मक बनाएं

आजकल जीवन निर्वाह के तमाम क्षेत्रों में सभी लोग उपदेशक की तरह व्यवहार करने लगे हैं जैसे कि वे राजा हरीशचन्द्र जैसे ईमानदार, कर्ण की तरह दानी और पौराणिक पात्रों की तरह कर्मयोगी हों। कोई शिकायत सुनना नहीं चाहता, समस्या सुनना नहीं चाहता, सच को सुनना भी नहीं चाहता।  ऎसे सारे तटस्थ और उदासीन लोग अपने संपर्क में आने वालों को सकारात्मक विचार अपनाने, चुप रहने और शालीनता बरतने की नसीहत देते रहते हैं। जो लोग किसी के काम नहीं आ सकते, अपनी छवि को सकारात्मक और पूजनीय बनाए रखने की चिन्ता में लगे रहते हैं, किसी का काम करना नहीं चाहते, वे अपने आपको ऎसे धीर-गंभीर, शालीन, ज्ञानी-ध्यानी और महान बनाए रखने की हरचन्द कोशिशों में जुटे रहते हैं जैसे कि बहुरूपिये और स्वाँगिये ही हों।  बातें ऎसी करेंगे जैसे कि उनका ही सिक्का चलता हो, उनके बिना पत्ता भी नहीं हिलता हो। लेकिन किसी के काम नहीं आ सकते ये खुदगर्ज लोग। चापलुसी और चमचागिरी का सहारा लेकर पूरी की पूरी जिन्दगी निकाल दिया करते हैं ये लोग। ऎसे लोगों के कारण ही समाज दुरावस्था का शिकार होता जा रहा है।

हर क्षण सकारात्मक चिन्तन करें जैसा कि हमारे अग्रज और पुरखे करते आये हैं। चाहे कैसी भी समस्याएं हों, अकेले में भले रो लें, सार्वजनिक रूप से कहने का मौका आए तो यही कहें कि दुनिया भर में हम से सुखी जीव कोई और हो ही नहीं सकता। सकारात्मक चिन्तन का चौगा अपने आप में इतना अधिक पॉवरफुल है कि इसकी आड़ में कई सारी पीड़ाएं, तनाव, दुःख और विषमताएं छिप जाती हैं। हमें जो रोटी देता है, जो हमारा पालन-पोषण करता है वह चाहे कितना ही शोषण करता रहे, इधर से उधर करता रहे, हमारे लिए पूजनीय है, उसका गुणगान करना हमारा प्राथमिक धर्म है। हमारे जो साथी असमय हमारे बीच से चले गए, उन्होंने भी इसी सिद्धान्त को अपना रखा था।  केवल उन्हीं के नक्शेकदम पर चलते हुए गुणगान करते रहो जिन्होंने कभी दुःख देखे ही नहीं, आसनसिद्ध होने की वजह से यायावरी के संत्रासों से कभी रूबरू हो नहीं पाए, वरना संसार बहुत बड़ा है जो जानने-समझने और उपभोग करने लायक है। हमारी सारी पीड़ाएं, समस्याएं, दुःख और तनावों भरा संसार अपनी जगह है, इससे उन लोगों को क्या सरोकार जिन्होंने हमेशा वसंत ही वसंत देखें हों, सूरज और चन्द्रमा का सान्निध्य पाया है, संवेदनाओं के किन्हीं दूसरे मानदण्डों को ही जिया है। सबकी अपनी व्यथा-कथाएं हैं, लेकिन सब कुछ छोड़ कर कुल न बोलें, क्योंकि इससे हमारी सकारात्मक छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, इसलिए इस तरह रहें जैसे कि कहीं कुछ हुआ ही न हो, हम परम मस्त और तृप्त हैं। इसी भाव को लेकर जो जीता है वह भीतर से भले ज्वालामुखियों का अनुभव करता है मगर बाहर उसकी छवि सर्वमान्य, सर्वस्पर्शी और पूजनीय हो ही जाती है। इसलिए सकारात्मक छवि को हर कीमत पर बनाए रखे।