नशाखोर नहीं होते भरोसे लायक
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नशाखोर नहीं होते भरोसे लायक

यों तो आजकल आदमी पर भरोसा खत्म होता जा रहा है। किसी पागल, आधे पागल या जानवर पर एक हद तक भरोसा किया भी जा सकता है लेकिन आदमी अब भरोसेलायक रहा ही नहीं।

कुल जमा विस्फोटक भीड़ में बहुत से आज भी ऎसे हैं जिन पर आँख मूँद कर भरोसा किया जा सकता है लेकिन इनकी संख्या नगण्य है। और आदमी अगर नशाखोर हो तो उस पर कभी भरोसा नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि जो इंसान अपने आप पर भरोसा खो देते हैं, जिनका आत्मबल शून्य से भी नीचे गिर कर आत्महीनता की स्थिति पा लेता है, जिन्हें जीवन और जगत का कोई मूल्य ही पता नहीं है, उन पर भरोसा कैसे किया जा सकता है।

असल में दुनिया के सारे नशेड़ी वे ही लोग होते हैं जो या तो संसार में किसी मनोरंजन और दैहिक आनंद की उपज होते हैं अथवा गलती से मनुष्य का शरीर पा लिया होता है या फिर भगवान ऎसे लोगों को अशांति फैलाने, लोगों को तंग करने, शान्ति भंग करते हुए उन्मुक्त स्वेच्छाचारी व्यवहार से जगत का मनोरंजन करने के लिए आसुरी शक्तियों को सौंप देता है।

जो लोग किसी न किसी तरह के मनोरंजन की उपज होते हैं वे जिन्दगी भर जमाने भर के लिए मनोरंजन का पर्याय होकर रह जाते हैं और लोग इनका तब तक तमाशा देखते रहते हैं जब तक कि ये खटिया न पकड़ लें अथवा राम नाम सत्य न हो जाए।

बात भंगेड़ियों की हो, दारूड़ियों की, चरस, स्मैक, अफीम, सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकू, गुटकों, नस्वार आदि लेने वालों की हो या फिर तरह-तरह के उन पदार्थों और द्रव्यों से नींद और उत्तेजना पाने वालों की, नशा हमेशा कमजोर आदमी ही करता है।

जिसे अपने आप पर भरोसा नहीं होता, वही इंसान नशा करते हुए नशेड़ियों की जमात में शामिल हो जाता है।  नशेड़ियों में भी दो किस्में हैं। एक में वे लोग आते हैं जो गाढ़ी कमाई से घर-परिवार और खुद को पालने की बजाय मुँह, गले और अंतड़ियों को ही सब कुछ समझते हैं और ज्यादा से ज्यादा पैसा नशे में उड़ाकर ही इन्हें तसल्ली मिलती है और आनंद मिलने का अहसास होता है।

जब तक नशे की खुमारी रहेगी, तब तक ये दुनिया को अपनी गुलाम समझते हुए ऎसी-ऎसी हरकतें करते रहेंगे जैसे कि भगवान ने दुनिया के सारे पागलखाने खोल दिए हों।

इनकी लत इनकी अधिक तीव्रतर हो जाती है कि ये लोग हमेशा नशे ही नशे में रहने को जी चाहता है। यही वजह है कि खूब सारे लोगों के बारे में कहा जाता है कि इनकी खुमारी कभी नहीं उतरती।

मरने पर ही इनकी यह लत छूट पाएगी। और अक्सर होता यह है कि ऎसे आदतन नशेड़ी लोग नालियों में गिरते-पड़ते चलते हुए धड़ाम से गिर जाते हैं, वाहन चलाते या सड़क पर अथड़ाते चलते हुए दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।

और कुछ नहीं तो लीवर बिगड़ जाने से असाध्य बीमारी भोगते हुए राम नाम सत्य हो जाते हैं और बेचारे पीछे वालों पर ईलाज का खर्च छोड़ जाते हैं।  ऎसे सैकड़ों लोग होंगे जिनके बारे में घर वाले ही कहते रहते हैं कि मुआ मरता भी नहीं।

इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि नशेड़ियों की पारिवारिक स्थिति कैसी दयनीय है। समाज में इन नशेड़ियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। कोई भंगेड़ी और कोई दारूड़ियां कहकर संबोधित करता है।

यह दीगर बात है कि समाज में जो लोग प्रभावशाली और पूंजीपति समझे जाते हैं उनके सामने लोग कुछ न कहें मगर पीठ पीछे इन्हें कोसते रहते हैं। नशेड़ियों की खूब सारी प्रजतियां हैं। कुछ लोग एक समय में एक ही तरह का नशा करते रहते हैं लेकिन दूसरे नशों से भी इन्हें कोई परहेज नहीं होता बल्कि ये कभी-कभार सहर्ष स्वीकार कर लिया करते हैं।

काफी सारे नशाखोर ऎसे भी हैं जिन्हें दुनिया का सभी प्रकार का वह सब कुछ प्रेमपूर्वक चढ़ता है जो नशे की श्रेणी में आता है। चाहे नशा देशी हो या विदेशी, इनके लिए पूरी दुनिया एक समान है। नशाखोरों में चतुर-चालाक और कृपण भी हैं और उदारमना भी ।

कुछ खुद खर्च करते हैं और खुद भी आनंद का अनुभव करते हैं और अपनी ही तरह के दूसरे संगी-साथियों को भी आनंद में हिस्सेदार बनाते हैं। लेकिन कंजूस और मक्खीचूस नशेड़ियों की प्रजाति वाले लोग नशे के आदी तो होते हं किन्तु वे तभी खाते-पीते हैं जब कोई दूसरा खर्च करे।

अपनी जेब से एक पैसा भी बाहर निकालना ये अधर्म और महापाप समझते हैं। इस किस्म के मुफ्तखोरों और हरामखोरों को हर दिन किसी न किसी मुर्गे की तलाश बनी रहती है। और जब तक पीने-पिलाने वाला और खाने-खिलाने वाला नहीं मिल जाए, तब तक इन्हें चैन नहीं पड़ती।

लगातार हरामखोरी में रमे और अपने लिए गुर्गों, मुर्खों और मुर्गों की तलाश करते हुए इतने अधिक सिद्ध हो जाते हैं कि इन्हें अपने लायक मुर्गे आसानी से मिल भी जाते हैं। ये लोग कोई दूसरा खिलाये-पिलाये तो जो खिलाओ वह खा भी लेंगे और जिस किस्म का पिलाओ, वह पी भी लेंगे, इन्हें कोई लाज-शरम नहीं आती।

इनकी इसी मनोवृत्ति का परिपाक तब सामने आता है जब इनमें और सामान्य भिखारियों की हाथ पसारकर पूरी बेशर्मी से की जाने मांग में कहीं कोई अन्तर नहीं रह जाता। जो इनके सामने आता है उससे पूरी नंगई पर उतर कर कुछ न कुछ खिलाने-पिलाने की मांग कर ही डालेंगे।

इसे इनका भिखारीपन या दुस्साहस कुछ भी कह दें, मगर आजकल बहुत सारे बाड़ों-बरामदों और गलियारों-परिसरों में ऎसे मंगतों की भारी भीड़ नज़र आने लगी है। ये औरों से इस तरह अधिकारपूर्वक मांगते नज़र आते हैं जैेसे कि इन परम संस्कारी और कुलगौरवों के लिए उनके बाप-दादा और परदादा वसीयत में लिख कर गए हों।

आदमी में न दम-खम रहा है, न प्रतिभा या हुनर, न आदमी होने का कोई लक्षण। आजकल न कहीं पूर्ण पुरुष नज़र आते हैं न पूर्ण स्ति्रयाँ। अधिकांश आधे-अधूरे और आत्महीन दिखते हैं जिनके लिए मनुष्य होना न होना बराबर है।

इन नशेड़ियों की जिन्दगी का निष्कर्ष सामने रखते हुए यह अच्छी तरह कहा जा सकता है कि जो इंसान नशा करता है, उस पर किसी भी तरह का भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। ऎसा इंसान तभी तक उत्तेजित रहता है जब तक नशे का जोर रहता है।

इसके बाद यह किसी काम का नहीं।  आजकल आदमी पर ही भरोसे का संकट मण्डरा रहा है जिस पर नशेड़ियों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है जिन पर तो भरोसा किया ही नहीं जा सकता।

इन्हीं नशेड़ियों के कारण से हर तरफ लोग हैरान-परेशान हैं और समाज तथा देश पिछड़ेपन से उबर नहीं पा रहा है और अब नशा भी स्टेटस सिम्बोल बनता जा रहा है। देश की कार्यक्षमता का ह्रास भी हो रहा है।

नशेड़ियों का आतंक सब जगह है। हर तरह के अपराधों से लेकर दुर्घटनाओं के कारण यही हैं लेकिन नशा इनके लिए तब सुरक्षा कवच का काम करता है जब नशे में होने की वजह से इन्हें सजा से मुक्त कर दिए जाने की घटनाएं सामने आयी हैं। सार यही कि जो इंसान नशा करता है उस पर कभी भरोसा नहीं करें। भरोसे की भैंसे और नशेड़ी डूबोने वाले ही होते हैं।