त्याग-तपस्या अपनाएँ

संग्रह दुःखों की ओर ले जाता है और अपरिग्रह आत्म आनंद, सुख और सुकून की ओर। जो जितना अधिक ऎशो-आराम में रहता है, जितनी अधिक सुख-सुविधाओं से शरीर को भोगी बनाता है, वह उतना ही अधिक सुविधाभोगी हो जाता है और अन्ततः उसे किसी न किसी मोड़ पर आकर दुःख, वियोग, शोक और संतापों से रूबरू होना ही पड़ता है।

संयोग और वियोग के सिद्धान्त के अनुसार दोनों का अस्तित्व कालसापेक्ष अवश्यंभावी है और यह नियति का शाश्वत नियम है।

मन-मस्तिष्क और शरीर तभी तक दुरस्त रहा करते हैं जब तक कि वह प्राकृतिक अवस्था में हों, मौलिकता कूट-कूट कर भरी हो। ऎसा नहीं होने पर इनका लम्बे समय तक टिकना और ठीक-ठाक बने रहना मुश्किल है।

पांचभौतिक देह तभी तक पुष्ट रहती है जब तक कि वह प्रकृति के करीब हो और उसमें नैसर्गिकता का समावेश हो।  ऎसा नहीं होने पर न तो पंच तत्वों का पुनर्भरण सही ढंग से हो सकता है, न मस्तिष्क तरोताजा रह सकता है, और न ही मन मलीनताओं से मुक्त रह सकता है।

प्रकृति के पास रहने का अपना अलग ही मौलिक और शाश्वत आनंद है जिसे हर कोई नहीं पा सकता। इसके लिए भी भाग्य प्रबल होना जरूरी है।

आजकल हम सभी लोग प्रकृति से दूर होकर आभासी प्राकृतिकता के बीच जीने के आदी हो गए हैं जहाँ सब कुछ नकली, आभासी और कृत्रिम ही है। और यही कारण है कि हमारा सब कुछ प्रदूषित होता जा रहा है। न सादगी रही, न शुद्धता और स्वच्छता ही।

हर तरफ सडांध भरी पड़ी है मन-मस्तिष्क से लेकर शारीरिक सँरचनाओं तक में। यही वजह है कि हमें स्वस्थ और मस्त इंसान के रूप में अपने आपको दर्शाने के लिए कॉस्मेटिक्स, क्रीम, पावडर, डाई, खिजाब  और रसायनों का इस्तेमाल कर अपने आपको जमाने की नज़रों में इंसान दिखाने लायक रखने के लाख जतन करने पड़ रहे हैं। 

मानसिक और शारीरिक सौन्दर्य पाने का सबसे श्रेष्ठ उपाय है मन को खाली रखना, मस्तिष्क को त्याग, औदार्य और परोपकारी विचारों से भरे रखना तथा शरीर को तपस्या के माध्यम से तपाकर निखारना।

इससे मानसिक और शरीरी कोष में जमा विजातीय विचार और द्रव्य बाहर निकलने लगते हैं। ये विजातीय द्रव्य और विचार जिस अनुपात में हमारे भीतर से बाहर निकलने लगते है। उस अनुपात में मन-मस्तिष्क और शरीर प्रदूषण मुक्त होकर पावन होने लगता है और यह शुचिता चेहरे से लेकर शरीर के अंग-प्रत्यंग तक में सुनहरा निखार लाती है।

यह ठीक वैसे ही है जैसे कि सोने को तपा-तपा कर शुद्ध किया जाता है और वह निखरने लगता है। शरीर को भी सोने की तरह तपाकर सभी प्रकार की कसौटियों पर खरा उतारने का हर जतन इंसान के लिए कल्याणकारी ही होता है।

इसके लिए सादगी और संयम सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक हैं और इनका उपयोग करके ही इंसान अपने आपमें निखार ला सकता है। आज भोगवादी संसाधनों, भोग के लिए प्रेरित, उद्वेलित और उत्तेजित करने वाले लोगों, तड़क-भड़क, मसालेदार खान-पान और श्रव्य-दृश्य में अत्याधुनिक पारदर्शी नवाचारों ने हमारी मानसिकता प्रदूषित कर डाली है वहीं शरीर को भी बीमारियों और मलीनताओं का घर बना डाला है।

ब्यूटी पॉर्लरों में घण्टों गुजारकर सौंदर्य की चाहत रखने वाले, एयरकण्डीशण्ड वाहनों और घरों में अपने आपको सुरक्षित और सुखी समझ कर दिन-रात जमा रहने वालों और कई-कई बार फास्ट फूड़ खा-खाकर, अपेय पी-पी कर जो लोग सुकून और सेहत चाहते हैं उनके लिए असली सुकून अस्पतालों में जाकर ही मिल पाता है। 

आज हमारे भीतर न त्याग रहा है, न तप या कोई संयम। प्यास लगे और दस-पन्द्रह मिनट पीने को पानी न मिले तो ऎसे करने लग जाते हैं जैसे कि भूकंप ही आ गया हो। एकाध घण्टा मनचाहा खाना या पीना न मिले तो इसकी उठने वाली तलब  ज्वालामुखी उमड़ा देती है।

मामूली और परिहार्य इच्छाओं का भी हम दमन नहीं कर पाते हैं। हमारे भीतर धैर्य धारण करने की  क्षमता भी नहीं बची है। हर काम में उतावले, उद्विग्न और आतुर ऎसे हो जाते हैं जैसे कि नहीं मिलने पर मर ही जाएंगे। 

बुजुर्गों में आज भी धैर्य और संयम देखने को मिल जाता है लेकिन युवाओं में अब ऎसा देखना संभव ही नहीं है। धैर्यहीनता बाल हठ, स्त्री हठ और राज हठ तीनों का दिग्दर्शन कराने लगी है।

आजकल कोई भी आदमी थोड़ी देर भी रूकना नहीं चाहता। बात किसी आवागमन की हो, खान-पान, रहन-सहन, प्रतीक्षा या कहीं कुछ पाने की हो, हर तरफ यही सब चल रहा है।

अधीरता और आवेग ने संवेदनाओं, नैतिकताओं और मूल्यों को लील लिया है और यही कारण है कि हम सारे के सारे अधीर लोग किश्तों-किश्तों में मौत की ओर धकियाते जा रहे हैं।

आज हमें इस बात का भान नहीं है लेकिन वह समय भी दूर नहीं है जब हकीकत सामने आ ही जाने वाली है। लेकिन तब कोई कुछ नहीं कर पाएगा। पछतावा तो होगा लेकिन प्रायश्चित के लिए समय तक नहीं मिलने वाला। इस स्थिति से बचने के लिए जीवन में त्याग और तपस्या को अपनाएं। इसी से आत्मकल्याण और जगत का कल्याण संभव है।

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