एकतरफा सोच त्यागें

हर संबंध की बुनियाद दो तरफा धाराओं का मिश्रण है। दो ध्रुवों के बीच निरन्तर संवाद सातत्य और एक-दूसरे की दिली भावनाओं को समझकर ही संबंधों में माधुर्य रस को निरन्तर गाढ़ा रखते हुए बरकरार रखा जा सकता है।

संबंध चाहे कैसा भी हो, संबंधी और संबंध दोनों के बीच पारदर्शिता और खुलापन होना जरूरी है। ऎसा नहीं होने पर संबंधों के वजूद को लम्बे समय तक बरकरार नहीं रखा जा सकता है।

संबंध चाहे कैसे भी हों, किससे भी हों, घरेलू हों या व्यवसायिक या फिर और किसी किस्म के, सभी संबंधों के बारे में एक बात तो यह तय है ही कि हर संबंध को किसी न किसी की नज़र लगती ही है। क्योंकि इस जमाने में किसी को बर्दाश्त नहीं होता कि कोई किसी के साथ रहे, बातचीत करे और साथ दे।

लोगों की क्रूर निगाह संबंधों पर सबसे पहले होती है और यही कारण है कि विघ्नसंतोषी लोगों की नज़र हर उस संबंध पर पड़ती है जो जमाने भर के लिए प्रेरणा या आकर्षण जगाने वाले होते हैं।

संबंध होना या बनाना अपने आप में बड़ी बात है क्योंकि जमाने भर में लाखों-करोड़ों लोगों के बीच अपनापन तलाश लेना बड़ा ही मुश्किल काम है और इसके पीछे कई बार भाग्य का फल साथ होता है, कई मर्तबा ईश्वरीय वरदान भी।

जिन्दगी भर में कुछ ही लोग ऎसे हुआ करते हैं जिनके साथ इंसान आत्मीय संबंध बना पाता है या कि बन पाते हैं। लेकिन संबंधों का बनना ही काफी नहीं है, इससे अधिक चुनौतियां भरा है संबंधों को लम्बे समय तक बनाए रखना, इसमें मौलिकता का पुट होना और माधुर्य के साथ संबंधों की मजबूती का ग्राफ बढ़ाते रहना।

संबंधों के मामले में एक बात साफ तौर पर सभी को स्वीकार कर लेनी चाहिए कि संबंध जिन प़क्षों में बनते हैं वे दोनों पक्षों के गुणावगुणों के साथ बनते हैं। इसलिए एक-दूसरे के गुणों और अवगुणों को सहज स्वीकार करते हुए गुणों की अभिवृद्धि तथा अवगुणों के उन्मूलन के साझा प्रयासों से ही परिमार्जन संभव है।

हर संबंध तलवार की धार से भी अधिक पैना होता है बशर्ते कि उसमें ईमानदारी और निष्कपटता हो, निभाने का पक्का वादा हो और संबंधों के प्रति पूर्ण निष्ठा का समोवश हो। आजकल सबसे ज्यादा खराब स्थिति संबंधों को लेकर है।

हर प्रकार के संबंधों में मिठास ही मिठास होनी चाहिए लेकिन इसमें खटास आने लगती है और यह खटास किसी भी संबंध के लिए आत्मघाती हो सकती है, होती भी है। और इन्हीं कारणों से संबंधों की बुनियाद हिल भी जाती है, धराशायी भी हो जाती है।

वैयक्तिक और सामुदायिक संबंधों की बात हो या और किसी भी प्रकार के संबंध की। हर संबंध  त्याग, सेवा और परोपकार चाहता है।  जिस संबंध में जितना अधिक त्याग होगा, अपने से कहीं ज्यादा सामने वाले के लिए करने का माद्दा होगा, उतना संबंध मजबूती पाता जाएगा।

 आजकल संबंधों के तमाम पहलुओं में प्रदूषण का प्रकोप है, हर तरफ संबंधों का माधुर्य खत्म होता जा रहा है। संबंध अब सिर्फ निभाने भर की रस्में होकर रह गए हैं जहाँ हर संबंध सिर्फ इसलिए निभाया जा रहा है ताकि कोई हमारे बारे में गलत धारणा न बना लें और हमारी छवि हमेशा साफ-सुथरी बनी रहे।

वर्तमान युग के संबंधों का सबसे भयानक सच यह है कि इसमें एकतरफा सोच बनने लगी है और इससे एकतरफा शंकाओं, आशंकाओं और भ्रमों का ऎसा आभामण्डल हमारे चारों तरफ बनने लगा है कि जिसमें बाहर की ताजी हवाओं का आना बंद हो जाता है और भीतर की प्रदूषित हवाएं रह-रहकर दम घुटने जैसा माहौल हमेशा बनाए रखती हैं।

जबकि एकतरफा हम जो सोचते हैं उसका कोई आधार नहीं होता। हम परीक्षण के तौर पर ही सही, कभी कभार अपनी एकतरफा सोच पर मंथन करें तो पाएंगे कि हमारी सारी शंकाएं कोरे भ्रम से अधिक कुछ नहीं हुआ करती।

आजकल यही सब तो हो रहा है सब तरफ। अधिकांश संबंध इन्हीं भ्रमों और शंकाओं के पेण्डुलम हो गए हैं। जहां कहीं कोई सा संबंध हो, इसकी शाश्वत अनुभूति तभी संभव है जब हम संबंध बनाते ही यह दृढ़ निश्चय कर लें कि संबंधों के बारे में किसी भी प्रकार की शंका, भ्रम या आशंका नहीं पालेंगे और इनसे सर्वथा बच कर रहेंगे।

ऎसा संकल्प ही संबंधों की बुनियाद को शाश्वत बनाते हुए मजबूती के साथ टिकाए रख सकता है। संबंध को भाग्य या ईश्वर प्रदत्त देन मानें और जहां कहीं संबंध बने हुए हैं, रहे हैं, उन्हें पूरी निष्ठा, ईमानदारी, निःस्वार्थ और निष्कपट भाव से अपनाएं।

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