Monthly Archives: August 2017

जहाँ पैसा,  वहाँ पाखण्ड

काम-धंधों, नौकरियों, कारोबार आदि में व्यापारिक मानसिकता और लाभ-हानि का गणित होता है क्योंकि इनका उद्देश्य धन कमाना ही है जबकि सेवा, धर्म और दैवीय प्रकल्पों और गतिविधियों से जुड़े हुए क्षेत्रों में पैसा उगाहने, मांगने और संग्रह करने की प्रवृत्ति विशुद्ध रूप से अधर्म ही है और जहाँ इन क्षेत्रों में पैसों और पूंजीपतियों को महत्व दिया जाता है ... Read More »

विनम्र सुझाव – कितना अच्छा हो यदि ऎसा हो जाए तो

हर सरकारी पत्र/आदेश के हीडर में कार्यालय का फोन नम्बर, ईमेल एड्रेस अनिवार्य रूप से अंकित हो। इस पर जिस अधिकारी के हस्ताक्षर हों, उसके पद नाम या मोहर के नीचे उसका व्हाट्सअप युक्त मोबाइल नम्बर अंकित हो। इससे राज-काज की गति तीव्र होगी तथा किसी भी व्यक्ति को टेलीफोन डायरेक्टरी खंगालने या पीए-पीएस से फोन/मोबाइल नम्बर पूछने की आवश्यकता ... Read More »

मोबाइल टूट जाए तो सुकून मानें

अक्सर लोगों के मोबाइल किसी न किसी समय नीचे गिरकर या और किसी कारण से अचानक टूट जाया करते हैं। और कुछ नहीं तो स्क्रीन का काँच ही टूट जाएगा या और कोई क्षति हो जाएगी।  इस स्थिति में लोग घबरा जाते हैं। मोबाइल टूटने पर घबराहट स्वाभाविक है क्योंकि महंगे मोबाइल का यों ही टूट जाना सभी का अखरता ... Read More »

आज की बात

चाण्डाल चौकड़ी – किसी को भी ठिकाने लगाने के लिए चार ही काफी हैं। आग की हाण्डी पकड़ने वाले तो किराये के भी मिल जाते हैं। दुष्टाें से न प्रेम करें, न उन पर भरोसा। क्योंकि ये धोखेबाज दगाबाजी के लिए ही पैदा होते हैं।  बिल्ली यदि आकर्षित हो तो चूहों को नहीं मानना चाहिए प्यार का भ्रम। क्योंकि बिल्लियाँ ... Read More »

राष्ट्रघाती हैं व्यक्तिपूजा करने वाले

जब तक समाज और राष्ट्र का सार्वभौमिक कल्याण सभी के केन्द्र में होता है तब तक समाज तरक्की करता रहता है और राष्ट्र सुरक्षित।  वैयक्तिक जीवन, लोकजीवन और परिवेश में जो भी कर्म हों, वह यदि समाज के बहुविध कल्याण के लिए हों, इनमेंं देशभक्ति का पुट हो, धर्म, सत्य,न्याय और लोक मंगलकारी दृष्टि हो, सत्यासत्य का विवेक समाहित हो, ... Read More »

बेमौत मरते हैं ये लोग …

जड़-चेतन पिण्ड से लेकर समूचा ब्रह्माण्ड पंच तत्वों की माया से ही रचित है और इन्हीं का संयोग-वियोग और मिश्रण पदार्थ भाव, गुणों और अस्तित्व को आकार देता है। फिर चाहे वह प्रकृति हो या पुरुष। सृष्टि सृजन के मूल मेंं पंचतत्वों की ही माया है। पृथ्वी, जल, आकाश, वायु और अग्नि को निकाल दिया जाए तो सृष्टि की कल्पना ... Read More »

झकझोर डालें सूक्ष्म जगत को

आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि कोई कुछ बोलना या करना नहीं चाहता। सारे के सारे मूक-दर्शक होकर चुप्पी साधे हुए देखने-सुनने के आदी हो गए हैं या फिर तमाशबीन। जो तमाशबीन हैं वे तमाशा पैदा करने के लिए दिन-रात कुछ न कुछ षड़यंत्र, खुराफात और धमाल रचने के ताने-बाने बुनते रहते हैं और दूर रहकर तमाशा देखने ... Read More »

कुत्ते भी शरमाते हैं इन्हें देखकर

अभिव्यक्ति और संवाद हर प्राणी चाहता है क्योंकि यह उसका जन्मजात नैसर्गिक गुण है। संवाद और अभिव्यक्ति के प्रकार और माध्यम कई तरह के हो सकते हैं किन्तु बिना अभिव्यक्ति के कोई रह नहीं पाता। इसी तरह जिनसे हमारा किसी न किसी रूप में संबंध जुड़ा होता है उनसे सीधा संवाद कायम करना और पारस्परिक ज्ञान एवं अनुभवों का आदान-प्रदान ... Read More »

क्षमा नहीं, संहार करें

क्षमा करने का समय अब नहीं रहा। क्षमा का उपयोग उसी जमाने के लिए ही उपयुक्त था जब लोग नीति-धर्म और सत्य पर चला करते थे और सच्चे और अच्छे लोग बहुतायत में हुआ करते थे। उन दिनों दण्ड का प्रावधान आज की अपेक्षा सौ गुना अधिक था इसलिए दुष्टों और पापियों पर प्रभावी अंकुश था। फिर भी दयावान और ... Read More »

गायब हो रहा है निष्काम सेवा भाव

सेवा का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। भगवान की सेवा-पूजा करना हर जीवात्मा को आनंद देता है। धर्म-अध्यात्म में कई मत-सम्प्रदाय हैं जिनमें विभिन्न प्रकार की सेवा और नवधा भक्ति का अवलम्बन होता है। सेवा के मामले में आजकल इन्सानों को कई सारे खेमों में बाँटकर देखा जा सकता है।  जहाँ सेवा शब्द आ जाता है वहाँ सब कुछ अपेक्षाओं से ... Read More »